Saturday, 7 January 2017

परमात्मा परम प्रेम के स्वरुप है

--> जय श्रीकृष्ण <--
परमात्मा परम प्रेम के
स्वरुप हैँ । सामान्य प्रेम
और परम प्रेम मेँ अन्तर है,
पुत्र , माता-
पिता आदि के साथ
जो प्रेम है , वह सामान्य
है । जगत् के सभी पदार्थ
और जीवोँ के
प्रति जो निःस्वार्थ
प्रेम होता है वह है परम
प्रेम ........ ....... जीव
बडा अयोग्य है , अपात्र
है । वह मन मेँ , आँखो से
हमेशा पाप
ही करता रहता है । फिर
भी ईश्वर तो उससे प्रेम
ही करते हैँ, ईश्वर जीव से
प्रेम करते है , उस पर प्रेम
बरसाते है और उससे प्रेम
की अपेक्षा करते है ।वे
प्रेम से ही वश मे हो सकते
है । वे धन से वश मेँ
नही हो सकते क्योँकि वे
स्वयं लक्ष्मीपति हैँ ........
.....,.. जब शारीरिक बल ,
द्रव्यबल , ज्ञानबल ,
आदि सब हार जाते हैँ , तब
प्रेमबल ही जीतता है ।
प्रेमबल सर्वश्रेष्ठ है ।
प्रेमबल परमात्मा को बस
मे करने का साधन है ।
.... सबसे ऊँची प्रेम सगाई ....
यदि परमात्मा के नाम
का बार - बार स्मरण
किया जाय तो प्रभुजी से
प्रेम हो जायेगा ..
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण
कृष्ण हरे हरे ..

सभी के प्रति समभाव

--> सभी के प्रति समभाव , समता रखे वही ज्ञानी है । सभी मेँ ईश्वर है , ऐसा ज्ञान होना ही सच्चा ज्ञान है । ईश्वर स्वरुप के ज्ञान के बिना न तो भक्ति होती है और न ही भक्ति दृढ होती है । अतः भक्ति मेँ ज्ञान भी आवश्यक है ।
.., विषय के प्रति जब तक वैराग्य नही उत्पन्न होता तब तक भक्ति नहीँ हो सकती ।भक्ति के पहले ज्ञान और वैराग्य आते हैँ । जहाँ  भक्ति है , वहाँ ज्ञान द्वारा रक्षा होती है । भक्ति सिद्ध होते ही सभी शास्त्रो का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । राम की महिमा भी बहुत बडी है --
" नाम लिया उन्होँने जान लिया सकल शास्त्र का भेद ।
बिना नाम नरक मेँ गया पढ-पढ चारोँ वेद ।।"

कृष्ण सूर्यप्रकाश के तुल्य है

कृष्ण सूर्यप्रकाश के तुल्य
है और जहाँ भी कृष्ण रहते
है वहाँ अंधकार
रुपी माया नहीँ रह
सकती । जब कृष्ण
को वसुदेव ले जा रहे थे , तब
रात्रि का अंधकार दूर
हो गया । कारागार के
बंधन स्वयमेव खुल गये ।
जब वसुदेव ने कृष्ण
को मस्तक पर
पधराया तो सारे बंधन
टूट गये ।
किन्तु जब गोकुल से
कन्या यानी माया को ले
आये तो पुनः बन्धनयुक्त
हो गये ..
अतः माया रुपी बंधन से
बचने हेतु भगवान श्रीकृष्ण
के चरणो को अपने मस्तक
पर धारण करना चाहिए

Friday, 6 January 2017

प्रेम के विषय कृष्ण

Jai shree krishna
✅ प्रेम के विषय - श्री कृष्ण ✅

▶ दो बात हैं : एक है विषय, दूसरा है आश्रय
▶ प्रेम के एकमात्र विषय हैं - श्री कृष्ण, दूसरा कोई है ही नहीं

▶ अर्थात प्रेम यदि हो सकता है, तो कृष्ण से ही हो सकता है. = विषय
▶और जो प्रेम करता है, वह है आश्रय = राधाजी , आप, हम, अनेक संत, भक्त.

▶ कृष्ण के अतिरिक्त यदि हम किसी से प्रेम करते हैं तो शास्त्र कहता है कि
▶वह प्रेम है ही नहीं, हो भी नहीं सकता, क्योंकि प्रेम के एकमात्र आश्रय कृष्ण ही हैं
▶ ठीक वैसे जैसे मिटटी के बिना 'मिटटी का बर्तन' बन ही नहीं सकता,
▶ मिटटी के बिना बनेगा तो वह 'मिटटी का बर्तन' नहीं होगा.

▶ तो फिर हम माता-पिता , भाई - बहिन या पति - पत्नी या
▶ लड़का - लड़की से जो प्रेम करते हैं, वह क्या है ?

▶ वह प्रेम नहीं ; 'काम' या कामना है, इसीलिये ऊपर लिखे ये समस्त प्रेम टूट जाते हैं, और
▶ कृष्ण से यदि प्रेम हो जाय तो आज तक किसी का न टूटा है, न टूटेगा

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚

Tuesday, 3 January 2017

कमल और कीचड़ , तृषित

कमल और कीचड़ में भेद समझ आता है न हमें ।
वही रस और काम में है ।
सौन्दर्य सौरभ और उचिष्ट दुर्गंध में ...
युगल रस कमल वत है ।
हमारी बुद्धि में कीचड़ को अर्थात काम प्रेम समझ लिया है ।
कीचड़ में कमल का सौदर्य निहित परन्तु वह गाढ़ता और सूर्य के ज्ञान रूपी प्रकाश से सम्भव ।
रस का अधोगमन काम है , हमने रस को को अधोगमित कर उसे काम समझ लिया है ।
योग में रस हृदय से नाभि फिर मस्तिष्क तक जाता है । मस्तिष्क में शीतल तरलता रहती है ।
रस में हृदय पर रहता है हृदय द्रवीभूत तरल होता है ।
काम में रस च्युत हो होता ,अर्थात व्यर्थ ।
भगवान अच्युत है , प्रकृति पुरुष के अप्राकृत एकत्व में प्राकृत जगत विसर्गित होते । यह प्राकृत जगत और ब्रह्मांड है उन्हीं अप्राकृत दिव्य रसिक वर नित्य रसानन्दित पूर्ण ब्रह्म की पिपासा से रसमयता में विसर्गित रोम कूपों से स्वेद बिंदु भर । पसीने के कण भर । अब ये ब्रह्मांड जिसका स्वेद अणु हो उसमें एक परमाणु मात्र हम क्या रस समझेंगे । विसर्ग सृष्टियाँ भी
पूर्ण तत्व के मिलन में उसमें समा जाती है । जिसे हम प्रलय कहते है ।  सृष्टि की प्रलय का पता नहीँ कब हो ... स्व को प्रलय करना होगा ... पूर्ण की लय में ।
--- तृषित ---

विभिन्नांश जीव तत्व

विभिन्नांश जीवतत्त्व
चित्-शक्तिके अति सूक्ष्म खण्डांशसमूह विभिन्नांशरूपमें जीव होते हैं। इसको तटस्थाशक्ति कहते हैं। चित्-शक्ति और मायाशक्तिके मध्यस्थित तत्त्व ही तटस्थाशक्ति है। इसमें मायाशक्तिकी कोई क्रिया या उसका अंश नहीं है। फिर भी अत्यन्त क्षुद्र होनेके कारण मायावश होने योग्य है। कृष्णकी निरकुंश इच्छा ही इसका मूल कारण है। विभिन्नांश जीवसमूह कर्मफल भोग करने योग्य होते हैं। वे जब तक अपनी स्वतन्त्र इच्छासे कृष्णसेवामें लगे रहते हैं, तब तक वे माया या कर्मके अधीन नहीं होते, परन्तु जिस समय वे अपनी स्वतन्त्र इच्छाका दुरुपयोगकर स्वयं भोक्ता बननेकी इच्छा करते हैं-कृष्णसेवा-धर्मको विस्मृत हो जाते हैं, तभी वे मायामोहित होकर कर्मके अधीन हो जाते हैं। परन्तु संसारमें भ्रमण करते-करते सौभाग्यवश यदि साधुसंग मिल जाता है, तब साधुकी कृपासे उनको यह स्मरण हो आता है कि कृष्णसेवा ही उनका स्वरूप धर्म है। ऐसा स्मरण होनेपर तत्क्षण मुक्ति उनके निकट उपस्थित होकर कर्मबन्धन और माया-यन्त्रणासे उनका उद्धार करती है। जड़जगतमें आनेसे पूूर्व ही उनका बन्धन होनेके कारण उनके बन्धनको अनादि कहा गया है। इसीलिए उनको नित्यबद्ध कहा जाता है। जो जीव ऐसे बद्ध नहीं हुए, वे नित्यमुक्त कहलाते हैं और जो बद्ध हो गए हैं, वे नित्यबद्ध हैं।

Thursday, 29 December 2016

धर्म रक्षक ‘श्रीराम’

धर्म रक्षक ‘श्रीराम’

उन्होंने भक्तों के हृदय में अपना पाद-पंकज स्थापति किया-

स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः।
'स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः।।[2]

(तदनन्तर अपना स्मरण करने वाले भक्तों के हृदय में अपने चरण कमल, स्थापित करके, जो दण्डकवन के काँटों से बिंध गये थे, अपने स्वप्रकाश परमज्योतिर्मय धाम में चले गये।)

क्यों भाई, शुकाचार्य ने दण्डकवन के काँटे जिन चरणों में बिंधे हुए हैं, ऐसे चरण-पंकज को भक्तों के हृदय में क्यों विरजवाया है? सीता भगवती की मंगलमयी शय्या पर समासीन, कौशल्यात्सगं लालित या चक्रवर्ति-नरेन्द्र के उत्संग में लालित रामचन्द्र राघवेन्द्र भगवान् के पदारविन्द भक्तों के हृदय में विरजवाते? नहीं, नहीं विद्धं दण्डक कण्टकैः, भगवान् के चरण-कमलों में काँटे चुभे हुए हैं’ पूर्वजों की मान मर्यादा के लिये, संस्कृति की रक्षा के लिये,धर्म की रक्षा के लिये; ऐसा ध्यान भक्तों को बना रहे इसलिये शुक्राचार्य ने काँटे चुभे चरण-कमल को भक्तों के हृदय में पधराया। राम नंगे पावों वन-वन विहरे, तब उनके पाँवों में काँटे चुभे। गौरक्षा के लिये धर्म की रक्षा के लिए, हमारे देवता भगवान् राम के मंगलमय पादों में काँटे चुभे। कितना सुकोमल है उनका चरण! पंकज का पराग की उसमें चुभता है। फिर कमल की कोमल पँखुड़ी चुभे यह तो बात गौण हो गयी। ऐसे चरणाविन्द में दण्डकवन के काँटे चुभे। हम भी धर्म की रक्षा के लिये, संस्कृति की रक्षा के लिये, पूर्वजों की मान-मर्यादा की रक्षा के लिये सिर को हथेली में रखकर, प्राणों को खतरे में डालकर आनन्द से जूझना सीखें, इस बात को बताने के लिये शुक्राचार्य ने कहा- ‘विद्धं दण्डक कण्टकैः’।