Tuesday, 3 May 2016

आमिर खुसरो के दोहे

अमीर खुसरो के दोहे ~~~~~~~

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पिया को, दोऊं भए इक रंग।।

खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

खुसरो मौला के रूठते, पीर के सरने जाय।
कह खुसरो पीर के रूठते, मौला नहीं होत सहाय।

उज्ज्वल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान।
देखन में तो साध है, पर निपट पाप की खान।।

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डाले केस।
चल खुसरो घर आपने, सांझ भई चहूँ देस।।

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जलाय।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय।।

श्याम सेत गोरी लिए, जनमत भई अनीत।
इक पल में फिर जात हैं, जोगी काके मीत।।

अंगना तो परबत भया, देहरी भई बिदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

साजन ये मति जानियो, तोहे बिछड़त मोको चैन।
दिया जलत है रात में, और जिया जलत दिन रैन।।

पंखा हो कर मैं डुली, साती तेरा चाव।
मुझ जलती का जनम गयो, तेरे लेखन भाव।

रैन बिना जग दुखी है, और दुखी चन्द्र बिन रैन।
तुम बिन साजन मैं दुखी, और दुखी दरस बिन नैन।।

नदी किनारे मैं खड़ा, सो पानी झिलमिल होय।
पी गोरो मैं सांवरी, अब किस विध मिलना होय।।

संतों की निंदा करे, रखे पर नारी से हेत।
वे नर ऐसे जाएंगे, जैसे रणरेही का खेत।।

खुसरो पाती प्रेम की, बिरला बांचे कोय।
बेद कुरान पोथी पढ़े, प्रेम बिना न होय।।

आ साजन मेरे नैनन में, सो पलक ढांप तोहे दूं।
न मैं देखूं औरन को, न तोहे देखन दूं।।

अपनी छवि बनाय के, मैं तो पी के पास गयी।
जब छवि देखि पीहूं की, सो अपनी भूल गयी।।

खुसरो सरीर सराय है, क्यों सोवे सुख चैन।
कूच नगारा साँस का, बाजत है दिन रैन।।

मूक सत्संग स्वामी जी

💐|| मूक सत्संग ||💐

* मूक सत्संग का तात्पर्य केवल वाणी से मूक हो जाना नहीं है अपितु
इंद्रियाँ - मन- बुद्धी से भी " मूक " ( क्रियारहित , असंग , शान्त ) हो
जाना है | इस साधन में कुछ करना नहीं पडता है | तात्पर्य यह है कि यह
करने का साधन नहीं है अपितु समझने का साधन है |

एक बार सागर में रहने वाली एक नन्हीं सी मछली के भीतर एक
जिज्ञासा उत्पन्न हुई | उसने अपनी माँ से पूँछा कि मैं कई दिनों से
"सागर" नाम सुन रही हूँ , पर यह सागर कौन है और कहाँ रहता है ?
माँ ने उत्तर दिया कि " सागर " नाम तो मैं भी बचपन से सुनती
आयी हूँ , पर मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता | मैनें कभी इस पर
विचार ही नहीं किया ! चलो अपनी सखियों से पूँछती हूँ | उसने
अपनी सखियों से पूँछा तो उनका भी यही उत्तर था कि इस पर तो
हमने कभी सोचा ही नहीं ! हाँ , एक बूढी मछली है , वह शायद
" सागर" के बारे में जानती हो | चलो चलकर उसी से पूँछें |कुछ
मछलियाँ तो यह कहकर रूक गयीं कि आप ही उस बूढी मछली के
पास जाओ , हमें " सागर" से क्या लेना देना ? कुछ मछलियाँ तमासा
देखने के उद्देश्य से उनके साथ चल पडीं | सब मिलकर उस बूढी
मछली के पास गयीं और पूँछा कि यह" सागर " कौन है ? आप
इसके बारे में कुछ जानती हो तो बतायें |

तब बूढी मछली ने हँसते
हुये कहा- " अरी पगलियो ! जिसमें तुम्हारा हमारा सबका जन्म
हुआ है , जिसमें हम दिन रात रहते है , जिसमें हम सब जी रहे हैं
और जिसमें हम सब एक दिन विलीन हो जायेंगें , जो हमारे बाहर
भीतर सब जगह परिपूर्ण है , जिसकी सत्ता से ही हमारी सत्ता है ,
जिससे हम कभी अलग नहीं हो सकते , और जो हमें अपने चारों
ओर दिखाई दे रहा है यही तो " सागर " है !कई मछलियों को तो
यह बात समझ में नहीं आयी | वे मौन होकर एक दूसरे का मुँह
देखने लगीं | कुछ समझदार मछलियों की आँखें आश्चर्य से खुली
की खुली रह गयीं |पर वह नन्हीं सी जिज्ञासु मछली सागर के ध्यान
में खोकर चुप ( मूक ) हो गयी , उसे सचमुच " सागर " का वोध हो
गया !

श्री योगवशिष्ठ महारामायण में मुनि वशिष्ठ जी श्रीराम जी से
कहते है " हे राम जी जिससे यह सब संसार है , जिसमें यह सब
संसार है , अर्थात जो संसार का अभिन्न निमित्तोपादान काँरण है
वही " ब्रह्म " है |* यह मूक सत्संग इस सिद्धान्त पर आधारित है कि
हम जहाँ है वहीं परमात्मतत्व है |* जो तत्व सब जगह परिपूर्ण है ,
नित्यप्राप्त है उसके लिये कोई साधन करना बनता ही नहीं |उसके
लिये तो एकमात्र " मूक " ( बाहर भीतर से अक्रिय होना ) ही उपाय
है|* चुप होने के सिवाय और करेंगें भी क्या ? " चुप " ( मूक ) इसलिये
होना है कि हमे जो परमात्मतत्व चाहिये वह अपने में है और अभी है ,
वह अपने द्वारा प्राप्त होता है शरीर के द्वारा नहीं |चुप ( मूक ) होने से
स्वत: उसका अनुभव होता है |

( श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी
महाराज के प्रवचन से. )

🙏🙏🙏

आत्महत्या किसकी ओशो

हम आत्महत्यारे क्यों ?

ध्यान रहे, आत्महत्या शब्द का हम प्रयोग करते हैं, लेकिन ठीक अर्थों में उपनिषद ने प्रयोग किया है, हम ठीक अर्थों में प्रयोग नहीं करते। अगर कोई आदमी अपने शरीर को मार डाले, तो हम कहते हैं, आत्महत्या की है उसने, आत्महंता है वह, स्यूसाइड किया। ठीक नहीं है यह बात। क्योंकि शरीर को मार डालना आत्मा को मार डालना नहीं है; शरीर की हत्या आत्महत्या नहीं है। स्वयं ने की है, फिर भी स्वयं की नहीं है। वस्त्र का, आवरण का ही बदलाहट है। शरीर—घात है, आत्महत्या नहीं है।

उपनिषद तो उसे आत्महंता कहता है, जो अज्ञान से आच्छादित अपने को बिना जाने ही जी लेता है। वह स्यूसाइडल है। वह आदमी अपनी आत्मा की हत्या कर रहा है। अपने को बिना जाने जीना आत्महत्या है। अपने को बिना जाने जीना..।

और हम सब अपने को बिना जाने जीते हैं। हम जीते हैं जरूर, लेकिन यह बिलकुल पता नहीं होता कि हम कौन हैं, कहां से हैं, क्यों हैं, किसलिए हैं? किस ओर हैं, कहां जाते हैं, क्या प्रयोजन है? क्या अर्थ है इस होने का? नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। हमें अपना कोई भी पता नहीं है।

ईशावास्य उपनिषद, प्रवचन-३,

Monday, 2 May 2016

परमात्मा है या नहीँ

* नाना प्रकार के जीव प्रकृति में जन्म - जीवन - मृत्यु के चक्र का मजा ले रहे हैं । जीवों में मनुष्य मात्र एक ऐसा जीव है जो अपनें अन्दर भोग और भगवान दोनों की चाह रखता है ; कभीं भोग - भाग उस को नियंत्रित करता है तो कभीं परमात्मा की सोच उसे चैन से भोग में घडी भर से ज्यादा रुकनें नहीं देती । इस भोग -भगवान के मध्य एक साधारण पेंडुलम की भांति मनुष्य चक्कर काट रहा है ।
* शायद ही कोई ऐसा हो जिसके मन में कभीं यह संदेह न उठता हो कि क्या परमात्मा है भी ? परमात्मा है या परमात्मा नहीं है - इन दो सोचों के मध्य मन संदेह की रस्सी से ऐसा बधा हुआ है कि उसे घडी भर को भी चैन नहीं ।
* परमात्मा है - इस सोच में डूबा मन , मंदिर , गुरुद्वारा , चर्च और मस्जिद आदि का निर्माण करते नहीं थकता और परमात्मा नहीं है कि उर्जा से भरा मन जो कर रहा है , उसको क्या ब्यक्त
करें ? आप -हम सब लोग हर पल अपनें चारो तरफ देख ही रहे
हैं ।
* एक बार बंगाल के एक शास्त्री जी अपनें 500 शिष्यों के साथ परम हंस श्री रामकृष्ण जी के पास दक्षिणेश्वर मंदिर पधारे । वे कुछ दिन पहले संदेसा भेजवाये थे कि मैं अपनें समर्थकों के साथ आप के पास आ रहा हूँ । मैं आप को बताना चाहता हूँ कि देवी - देवता और और परमात्मा मात्र एक भ्रम है ,इनका कोई अस्तित्व नहीं है ।
* कई दिनों तक शास्त्री जी परम हंस जी को अपनें तर्क के आधार पर बतानें की कोशिश की कि आपकी काली माता की सोच मात्र एक भ्रम है , देवी -देवता और परमात्मा नाम को कोई चीज नहीं , जो है वह सब प्रकृति -पुरुष के योग से है ।
* जब भी शास्त्री जी बोलना बंद करते ,परम हंस जी नाचनें लगते और शास्त्री जी के पैरों पर गिर कर कहते - हे मेरे प्रभु ! मेरे से ऐसा क्या गुनाह हुआ कि आप बोलना बंद कर दिए ? बोलिए न ? * शास्त्री जी बोल -बोल कर थक गए और मौन हो गए । कुछ दिन यों ही मौन में रहे । एक दिन सुबह -सुबह उनका एक प्रमुख शिष्य बोला ," आचार्य ! अब हम सबको वापिस चलना चाहिए ।
" शास्त्री जी बोले , " तुम सब जाओ और खोजो , हमें तो वह मिल गया जिसकी खोज में मैं अभीं तक भाग रहा था ।"
# शास्त्री जी परमहंसजीके साथ अपना जीवन गुजार दिया ।
# शास्त्री जी अपनें संस्मरण में लिखते हैं ," मुझे आजतक कोई पता नहीं कि परमात्मा क्या है लेकिन परम हंस जी से जब आँखें मिलती हैं तब ऐसा लगनें लगता है कि - हो न हो यही परमात्मा
हो ।"
# अब आप सोचो कि परमात्मा है या नहीं ।
<> क्या करोगे सोच के ? नानक जी कहते हैं ," सोचै सोच न होवहीं " अर्थात उसकी सोच की उपज हमारी सोच से संभव
नहीं । क्यों संभव नहीं ? क्योंकि हमारी सोच गुण - तत्त्वों एवं अहंकार की उपज है जबकि उसकी सोच इनके परे की है ।
<> 10 दिन अपनें मनके द्वार पर चौकीदारी करो । यह देखते रहो कि इन दो बातों में से एक भी बात आपके मन में प्रवेश न कर
सके ।
<> यह 10 दिनका अभ्यास - योग आपको परम सत्य से भर देगा <>
...... ॐ .......

मर्म और मलहम

मर्म और मलहम
<> क्या रिश्ता है , इन दोनों में ?
* वह जो मर्मको समझता है , वहीं सही मलहम लगानेंकी तकनीकको समझ सकता है ।
* जितनें मरहम लगानें वाले आपको मिलेंगे , उनमें शायद ही कोई ऐसा मिले जो अपनें दिल से चोट की गाम्भीरताको पकड़नेकी कोशिश भी करता हो , वरना तो , चोट पर मिर्च छिड़कनेंके बहानें ही लोग मरहमकी डिब्बी लेकर आपके पास आते हैं ।
* चोटकी गंभीरताको दिल से समझना , और आँखें बंद करके दिलसे उस चोटको सहलाना, मरहम लगानेंसे उत्तम परिणाम देता है ।
* वह जो मर्मको समझता है , उसे भौतिक मरहम की कोई जरुरत नहीं ।
* चोटकी गंभीरताको देखते ही हृदय से उपजे और आँखोंसे टपके दो बूँद आँसू , परम मरहम का काम करते हैं ।
~~~ ॐ ~~~

मौन

* मौनका आकर्षण अतुल्य है
* मौनका आकर्षण ध्यानकी गहराई के साथ सघन होता चला जाता है ।
* ध्यानकी गहराई के प्रवेश द्वार पर पहले जो प्रसाद मिलता है यह है मौन ।
* मौन जब पकता है तब वह ध्यानीको द्रष्टा - साक्षी बना देता है ।
* मौन सत्यका बसेरा है ।
* मौन घटित होनें पर अंतः करण निर्विकार अवस्था में शुद्ध हीरे की तरह विकिरण द्वारा जो किरणें फैलाता रहता है , वे किरणें चरों तरफ एक परम ऊर्जा का क्षेत्र निर्मित करती हैं । वह जो जगना चाह रहा होता है , वह इस ऊर्जा क्षेत्र से आकर्षित होता चला जाता है । उसका यह आकर्षण उसे मौनी बना देता है ।
~~~ ॐ ~~~

Sunday, 1 May 2016

कुछ प्रमुख गोपियों के नाम व उनका पूर्वजन्म

कुछ प्रमुख गोपियों के नाम व उनका पूर्वजन्म •

उग्रतपा नामक ऋषि ने रासलीला रत नवकिशोर श्रीकृष्ण का सौ कल्पों तक ध्यान किया, वे सुनन्द नामक गोप की कन्या ‘सुनन्दा’ हुए। •सत्यतपा नामक ऋषि ने सूखे पत्ते खाकर श्रीराधा के दोनों हाथ पकड़कर नाचते हुए श्रीकृष्ण का दस कल्पों तक ध्यान किया। वे सुभद्र नामक गोप की कन्या ‘सुभद्रा’ हुए। •हरिधामा नामक ऋषि ने निराहार रहकर  कोमल पत्तों की शय्या पर लेटे हुए श्रीराधाकृष्ण का ध्यान किया, वे तीन कल्प के बाद सारंग नामक गोप के घर ‘रंगवेणी’ नामक कन्या के रूप में अवतीर्ण हुए। •जाबालि ऋषि ने एक पैर पर खड़े होकर व्रज में विहार करने वाले श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए नौ कल्पों तक तपस्या की। फिर वे प्रचण्ड नामक गोप के घर ‘चित्रगन्धा’ के रूप में प्रकट हुए। •शुचिश्रवा नामक ऋषि ने शीर्षासन में रहकर दस वर्ष की आयु वाले श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए तपस्या की। वे एक कल्प के बाद व्रज में सुधीर नामक गोप के घर उत्पन्न हुए।  गोपियों का अपने पति-पुत्रादि से भी बढ़कर श्रीकृष्ण में प्रेम क्यों हुआ?  श्रीमद्भागवत में राजा परीक्षित के यह पूछने पर कि ‘गोपियों का अपने पति-पुत्रादि से भी बढ़कर श्रीकृष्ण में प्रेम क्यों हुआ?’ शुकदेवजी कहते हैं–’आत्मा ही सब प्राणियों के लिए प्रियतम है। यह सारा जगत आत्मा के सुख के लिए ही प्रिय हुआ करता है और श्रीकृष्ण ही अखिल आत्माओं के आत्मा हैं (इसलिए श्रीकृष्ण के लिए गोपियों का इतना स्नेह है)।’  गोपियों का तन-मन-धन–सभी कुछ प्राणप्रियतम श्रीकृष्ण था। वे संसार में जीती थीं श्रीकृष्ण के लिए, घर के सारे काम करती थीं श्रीकृष्ण के लिए। यहां तक कि उनकी निद्रा भी श्रीकृष्ण में ही होती थी। स्वप्न और सुषुप्ति दोनों में ही वे श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं को देखतीं और अनुभव करतीं थीं। भगवद्गीता में भगवान ने जो कुछ करने के लिए कहा है, गोपियों के जीवन में वे सब बातें स्वाभाविक विद्यमान थीं। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है–  ‘वे निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले तथा मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले मेरे परम भक्त परस्पर मेरी ही चर्चा करते हैं, मेरी ही लीला गा-गाकर संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं; इस प्रकार प्रेमपूर्वक नित्ययुक्त होकर मुझे भजने वाले भक्तों के साथ अपनी ईश्वरीय बुद्धि का योग मैं करा देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।’  गोपियों के मन में इस लोक और परलोक के किसी भी भोग की कामना नहीं थी। उन्होंने अपने मनों को कृष्ण के मन में और अपने प्राणों को कृष्ण के प्राणों में विलीन कर दिया था।   कान्ह भए प्रानमय प्रान भए कान्हमय, हिय मैं न जानि परै कान्ह है कि प्रान है।  गोपियों का हृदय श्रीकृष्णमय हो गया था; गोपियां भगवान की बनी-बनायी भक्त थीं। उन्होंने अपनी सारी इच्छाओं को श्रीकृष्ण की इच्छा में मिला दिया था। ‘जो गोपियां गायों का दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकों को पालना झुलाते समय, रोते हुए शिशुओं को लोरी देते समय, घरों में छिड़काव करते तथा झाड़ू लगाते समय, प्रेमभरे हृदय से आँखों में आँसू भरकर गद्गद वाणी से श्रीकृष्ण का नाम-गुणगान किया करती हैं, उन श्रीकृष्ण में चित्त लगाने वाली गोपरमणियों को धन्य है।’  भगवान के आदेश पर जब उद्धवजी गोपियों को समझाने ब्रज में आए तब गोपियों ने कहा–   स्याम तन स्याम मन, स्याम है हमारौ धन, आठौ जाम ऊधौ ! हमैं स्याम ही सौं काम है। स्याम हिए, स्याम जिए, स्याम बिनु नाहिं तिए, आंधे की सी लाकरी अधार स्यामनाम है।।  स्याम गति स्याम मति, स्याम ही है प्रानपति, स्याम दुखदाई सौं भलाई सोभाधाम है। ऊधौ ! तुम भए बौरे, पाती लेकर आए दौरे, जोग कहाँ राखैं, यहां रोम-रोम स्याम है।।  अर्थात् यहां तो श्याम के सिवा कुछ है ही नहीं; सारा हृदय तो उससे भरा है, रोम-रोम में वह छाया है। सोते-बैठते कभी साथ छोड़ता नहीं; फिर बताओ तुम्हारे ज्ञान और योग को कहां रखें? उद्धव गुरु बनकर गोपियों को योग की दीक्षा देने गए थे पर उनके चेले बनकर लौटे। वापिस मथुरा आकर श्रीकृष्ण को ‘यदुनाथ’ कहना भूलकर  ‘गोपीनाथ’ पुकारने लगे। उद्धवजी ने कहा–’हे गोपाल, हे गोपीनाथ ! एक बार चलो न व्रज को। उस प्रेमलोक को छोड़कर यहां इस रूखी-सूखी मथुरा में कहां आ बसे।’  गीता में तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ही मुख से बारम्बार अपने को साक्षात् सच्चिदानन्द परात्पर तत्त्व घोषित किया है। और इन भगवान का गोपियों ने ‘चोर-जार-शिखामणि’ नाम रखा है। (गोपियों के घर माखन खाकर और यमुनातट पर उनके वस्त्रों को कदम्ब पर रखकर भगवान श्रीकृष्ण ‘चोर’ कहलाए तथा शरद पूर्णिमा की रात्रि को गोपियों में आत्मरमण कर भगवान ‘जार’ कहलाए।) वे भगवान श्रीकृष्ण जिनके चरणों की पावन धूलि पाने के लिए ब्रह्मा और ज्ञानी उद्धव कीड़े-मकोड़े की योनि और लता-गुल्म आदि जड़ शरीर धारण करने में भी अपना सौभाग्य समझते हैं।  श्रीउद्धवजी कहते हैं–   वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम्।। (श्रीमद्भागवत)  अर्थात्–’अहो ! इन गोपियों की चरण-रज का सेवन करने वाले वृन्दावन में उत्पन्न हुए गुल्म, लता और ओषधियों में से मैं कुछ भी हो जाऊँ (जिससे उन गोपियों की चरण-रज मुझे भी प्राप्त हो); क्योंकि इन गोपियों ने बहुत ही कठिनता से त्याग किए जाने योग्य स्वजनों को और आर्यपथ को त्यागकर भगवान श्रीकृष्ण के मार्ग को प्राप्त किया है, जिसको श्रुतियां अनादिकाल से खोज रही हैं। ……… मैं उन नन्दव्रजवासिनी स्त्रियों की चरण-रेणु को बारम्बार नमस्कार करता हूँ, जिनके द्वारा किया गया भगवान की लीला-कथाओं का गान त्रिभुवन को पवित्र करता है।’  भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुख से गोपियों की प्रशंसा करते हुए कहा है–  ‘हे अर्जुन ! गोपियाँ अपने अंगों की सम्हाल इसलिए करती हैं कि उनसे मेरी सेवा होती है; गोपियों को छोड़कर मेरा निगूढ़ प्रेमपात्र और कोई नहीं है। वे मेरी सहायिका हैं, गुरु हैं, शिष्या हैं, दासी हैं, बन्धु हैं, प्रेयसी हैं–कुछ भी कहो, सभी हैं ! मैं सच कहता हूँ कि गोपियां मेरी क्या नहीं हैं। हे पार्थ ! मेरा माहात्म्य, मेरी पूजा, मेरी श्रद्धा और मेरे मनोरथ को तत्त्व से केवल गोपियां ही जानती हैं और कोई नहीं जानता।’  भगवान श्रीकृष्ण स्वयं महाभागा गोपियों के ऋणी रहना चाहते हैं। भगवान ने कहा–  ’मैं जानता हूँ कि तुमने मेरे लिए, मेरी सेवा के लिए लोक-वेद-स्व सबका परित्याग कर दिया है। इसलिए मैं भी मन-ही-मन छिपकर तुम लोगों की सेवा करता हूँ। मैं तुम्हारा प्यारा हूँ और तुम हमारी प्यारी हो। अरी गोपियों, तुमने मुझसे ऐसा निश्छल, निष्कपट प्रेम किया है कि यदि मैं ब्रह्मा की आयु से भी तुम लोगों का बदला चुकाकर उद्धार पाना चाहूँ तो भी पार नहीं पा सकता, क्योंकि तुमने हमारे लिए घर छोड़ा है तथा जितने बन्धन थे, उन सबको छोड़ दिया है। तुम तो साधु हो और अपने शील-स्वभाव से ही हमें उऋण कर सकती हो।’  भाई हनुमानप्रसादजी पोद्दार के शब्दों में–   बंदौं गोपी-जन-हृदय, जो हरि राखे गोय। पलकहुँ नहिं निकसत कबहुँ, मानि परम सुख सोय।।  बंदौं गोपी-मन सरस, मिल्यौ जो हरि-मन जाय। हरि-मन गोपी मन बन्यौ, करत नित्य मनभाय।। बंदौं गोपी-नाम, जे हरि मुरली महँ टेर। सुख पावत हरि स्वयं करि कीर्तन बेरहिं बेर।।  बंदौं गोपी-रूप, जो हरि-दृग रह्यौ समाय। निकसत नैकु न नयन तैं छिन-छिन अधिक लुभाव।।  रसखानिजी के शब्दों में–   जदपि जसोदा नंद अरु ग्बालबाल सब धन्य। पै या जग में प्रेम कौं गोपी भई अनन्य।।

श्री राधा राधा राधा राधा राधा
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