Wednesday, 25 January 2017

कृपा रूपी वर्षा अखंड बह रही है , तृषित

वर्षा हो रही हो ... मोर नाच रहे हो ... प्रकृति झूम रही हो और फिर कोई सिद्ध आएं उसे उसके संगी आदेश करें , वर्षा रोक दो । वह कोई साधन करें , वर्षा रुक जाएं ... अब वर्षा साधन से रुकी या वर्षा के भीतर कोई खेल था यह कोई न जाने ।
सब सिद्ध की वाह वाही करें ... पुनः विशाल यज्ञ का आयोजन हो । क्यों वर्षा हेतु । वही सब साधक सिद्ध वर्षा के लिये यज्ञ करें , जिसे रोक कर यज्ञ कर रहे है ।
9 दिन बाद पूर्णाहुति के समय वर्षा होने लगें । सब आनन्दित हो । सिद्ध की महिमा और गहरी हो जाए ।

कृपा रूपी वर्षा अखंड अनन्त बह रही है ... चाह रूपी स्वांग से वह अदृश्य हो जाती है । और सभी चाहों की पूर्णाहुति होते ही कृपा रूपी वर्षा सदृश्य होती है । कुछ भोले मानस इस कृपा वर्षा को कर्म फल समझते है । कृपा रूपी वर्षा स्वयं स्वीकार करती है हाँ मै कर्म फल हूँ क्योंकि जिनकी दृष्टि से कृपा रूपी वर्षा हो रही है ... वह अति करुण और एक मात्र कर्ता होकर कर्तत्व से परे है ।

भगवान के विषय में कल्पना नहीँ हो सकती है , तृषित

कल्पना संसार की हो सकती है ... भगवान के संदर्भ में कल्पना का अस्तित्व नहीँ है ...  क्यों ??
वह सत है , असत नहीँ ।
भगवान की अनुभूति का स्पर्श ही वास्तविकता पर लें जाता है ।
भगवान और कल्पना का कभी संग नही हो सकता क्योंकि असत की सत्ता भी भगवान के स्पर्श से सत्य हो जाती है ।
भगवान के लिये की हुई कल्पना कहती है कि कही न कही कोई चाह या इच्छा है । परंतु भगवत सम्बन्ध होते ही वह कल्पना सत्य हो जाती है क्योंकि भोला मानस भले ही स्व इच्छा का त्याग न कर कल्पना कर लें परन्तु भगवान स्वरूप का त्याग कर कल्पना को सत्य करने का सामर्थ्य रख उस कल्पना से भी सत्य निकाल कर उसका उद्धार कर सकते है ।
यह बात ऐसे स्वीकार नहीँ होगी ...
रावण ने राम ईश्वर है या नहीँ यह जांचने को मायामृग भेजा । ईश्वर है तो माया मृग के पीछे जाएंगे नही और वही संग्राम कर मैं मुक्त हो जाऊँगा यह उसकी भावना रही ।
राम ने उसकी भावना जानकर ईश्वर होते हुए भी नर तनु की सिद्धि के लिये जानकर लीला की , जिससे रावण को विश्वास हो गया यह मानव है , ईश्वर होते तो मृग के पीछे नही जाते । भगवान ईश्वर है परंतु फिर भी मृग के पीछे गये । रावण की आंतरिक भावना राम से छिपी नहीँ है । और राम की लीला रावण के सामर्थ्य से परे है । सारी लीला रावण की भावना से हुई और वह सिद्ध होता गया भगवान सामान्य मानव रूप प्रकट करते गये , क्योंकि भगवान मानव रहकर ही उसका उद्धार कर सकते थे ब्रह्मा जी के वरदान के निमित्त । रावण के दरबार में देव याचक बन खड़े रहते , तो मानव तो उसे क्या मारेंगे यह जान उसने यह वर चाहा था कि मानव तो हमारा भोजन है उनका कहां सामर्थ्य । रावण के वरदान अर्थात कल्पना की सिद्धि करते हुये राम ने ईश्वरत्व को प्रकट न कर जानकर मानव रूप से उसका उद्धार किया । वरन भगवान जानते थे मैंने सोने के मृग की सृष्टि की या नहीँ पर भागे ... !!
तो भगवान कल्पना को कल्पना नही रहने देते उसे सत्य लीला रूप दे देते है ।
भक्त चित्त कभी भगवत विषयक कल्पना नहीँ कर सकता , क्योंकि शरणागति पर मन भी शरणागत है । मन उनके ही अनुरूप गमन करता है और भगवान की भावना में सत की सत्ता है , भगवान असत का चिंतन नहीँ कर सकते है । क्योंकि भगवान स्वयं सत्य है । -- तृषित

Tuesday, 24 January 2017

जीवार्थ से आत्मार्थ सृष्टि तक , तृषित

हमारे प्रभु जी को दो तरह से सृष्टि करनी होती है । जीवार्थ और आत्मार्थ । जीवार्थ सभी भुवन - लोक आदि है । आत्मार्थ उनकी स्व रस की सृष्टि है । आत्मार्थ है वह वृन्दावनीय निकुंज जहाँ वह अपनी स्वरूपभुता से प्रेमानन्द रस अनुभूत करते है । उनके इस निकुंज रस को भोग जगत ना तो स्वीकार कर सकता है , ना ही चिंतन । और निर्मल प्रेम होने पर जीव अपने जीवत्व का खंडन कर निकुंज परिकरों द्वारा सिद्ध भाव में प्रवेश कर वहाँ नित्य युगल प्रियालाल की सेवा में परायण हो सकता है ।
मुक्ति आदि का लोभी भी जीवार्थ सृष्टि तक जाता है दिव्य लोक आदि में , मुक्ति की भावना भी भोग भावना है ।
परन्तु निकुंज रस में केवल प्रेम से ही स्पर्श अनुभूति सम्भव है । इसमें इतना प्रेम चाहिये कि जैसे जीवार्थ जो सृष्टि है उसमें हम कामना करते है और वह ही लीला ईश्वर करते है भले इससे उन्हें कष्ट ही हुआ हो परन्तु मनोभाव की सिद्धि के लिये वह सहज सब संकल्प सिद्ध करते है । वैसे ही ऐसे भाव स्वरूप की आवश्यकता उनके इस आत्मार्थ निकुंज रस में चाहिये जो चिंतन - संकल्प - मनन - चाह सब करें उनके ही सुख हेतु । स्व सुख का लोभी यहाँ नहीँ आता । यहाँ वह भाव स्वरूप आते है जिन्हें प्रियतम का सुख ही यथेष्ट हो । जीवार्थ सृष्टि में जीव स्वार्थ में अधिकतम ईश्वर की भावना के विपरीत ही जीवन व्यय करता है । इससे उन्हें बाह्य रूप से तो हर्ष रहता है क्योंकि वह प्रेमी होने के नाते जीव की भावना को पूरा करने को व्याकुल है । परंतु उनकी भी कोई भावना है यह जब प्रकट होता है जब स्वार्थ का त्याग हो । फिर धीरे धीरे उनके भाव सन्मुख होते है । शरणागत सन्तों का जीवन ईश्वर की इच्छा का जीवन है । रामराज्य का स्वरूप भी कहता है ईश्वर ने द्वेत की सृष्टि नहीँ की , वह आनन्द रचते है दुःख-सुख नहीँ । रामराज्य में पूर्णतः पुष्टि और आरोग्यता है जो कहती है कि यह उनकी भावना है । वस्तुतः आश्रय के त्याग से ही विकार होने लगते है । राम राज्य में सहज स्वीकार है कि हमारे सर्वस्व राम है ।
ईश्वर जीवार्थ उसे अनुकूलता देने भी आते है और दुःख जिसे उन्होंने रचा ही नहीँ , उसे भी सहज पी लेते है । अब कोई कहे कैसे नहीँ रचा तो एक स्वार्थ के कारण जीव राम तक के विपरीत हो जाता है , प्रेम वश और शब्द सृष्टि की रक्षा के लिये असत को भी राम स्वीकार कर उसे सत कर देते है ।
अगर जीव विकार रहित हो तो उतना ही वह ईश्वर के लिये सहज सुख स्वतः प्रकट कर रहा है क्योंकि विकार आदि हेतु उन्हें असुर - दानव आदि का वध करना होगा और उसके लिये कष्ट भी उठाने होंगे । और असुर वृतियों को अर्थात हमारे विकारों को भी भस्म कर वह स्वयं में स्वीकार कर लेंगे उसका त्याग नहीँ करेंगे जैसे पूतना , ताड़का । यह सब हमारे ही विकारों की पराकाष्ठा है । जैसे रावण अहंकार की पराकाष्ठा । निर्मल हृदय प्रभु का चिंतन काम और कलुषित हृदय से सम्भव ही नहीँ । ईश्वर जब भी जीवन में प्रकट होते है या प्रकट लीला - व्यवहारिक लीला करते है तो भीतर एक चाह उनमे होती है निज धाम ले जाने की । जैसे चाह शून्यता हुई वह भावना वह सिद्ध कर देते है ।
स्मरण कीजिये संसार सदा जिन विकृतियो के लिये हमें त्यागता है ऐसे विकारों को भी शरणागत होते ही वह कहते है यह मेरा है । जैसे ताड़का आदि को कहते है तुम मेरी हो । हमारी शरणागति अगर पूर्णतः निर्मल होने से पहले हो तो हमारे समस्त धर्म और प्रतिफल के भोक्ता वह होते है , शरणागत वह है जिसका डैमेज ऑपरेटिंग सिस्टम अनइंस्टाल कर उसमें सुपर ऑपरेटिंग सिस्टम यानी उनकी भावना जीवन होता है । शरणागति डैमेज ऑपरेटिंग सिस्टम का फॉर्मेट स्टेज है । हमारे विकारों को भी वह अपना बना लेते है , उनके हृदय में परत्व है ही नहीँ । नित्य मंगल विकास वह रचना चाहते है । जीवन में घटा हर अमंगल यह सिद्ध करता है कि हमने उन्हें स्वीकार ही नहीँ किया । इन विषयों को विस्तार की आवश्यकता है ।
जीवार्थ से उनकी आत्मार्थ जो रस सृष्टि है उसमें सेवायत होने के लिये उनके प्रति अखंड , निर्मल , सहज , सरस , कोमल उनके सुख की लालसा से भरपूर प्रीत की आवश्यकता है ... यह सब भोगी और स्वार्थ जगत के लिये कठिन है और इस ही तत्सुख रस की पूर्णतम उन्हें रस प्रदान करने वाली भावना का नाम *राधा* है । तृषित ...

भटकना नही है , डुबकी चाहिये , योगानन्द जी

प्रतिदिन आध्यात्मिक पुष्प की तलाश मत कीजिये। बीज बो दीजिये और प्रार्थना एवं सही प्रयास के जल से उसे सींचिये। जब वह अंकुरित हो जाये, तो उसकी देखभाल कीजिये। उसके आसपास उग आने वाली शंका, अनिश्चय, एवं उदासीनता की घास - पात को उखाड़ फेंकते रहिये। किसी सुबह अकस्मात, आप आत्म - साक्षात्कार के अपने चिर - प्रतीक्षित आध्यात्मिक पुष्प के दर्शन करेंगे।

आप स्वयं अपने शत्रु हैं और आप इसे जानते भी नहीं। आप शान्त बैठना नहीं सीखते। आप ईश्वर के लिये समय देना नहीं सीखते। आप अधीर रहते हैं और तुरन्त स्वर्ग को पाने की अपेक्षा करते हैं। इसे आप पुस्तकें पढ़कर या प्रवचनों को सुनकर या लोकोपकारी कार्यों को करके नहीं पा सकते। इसे आप केवल गहरे ध्यान में प्रभु को समय देकर ही प्राप्त कर सकते हैं।

अपनी आध्यात्मिक खोज की शुरुआत में, विभिन्न आध्यात्मिक पथ एवं गुरुओं की तुलना करना बुद्धिमानी है। परन्तु जब आप अपने लिये निर्दिष्ट सद्गुरु को पा लेते हैं, जिनकी शिक्षायें आपको दिव्य लक्ष्य तक पहुँचा सकती हैं, तब वह व्यग्र खोज बन्द हो जानी चाहिये। एक आध्यात्मिक तृष्णा वाले व्यक्ति को अनिश्चित रूप से नये कुओं की खोज नहीं करते रहना चाहिये; बल्कि उसे सबसे अच्छे कुएँ पर जाकर नित्य इसके जीवनदायी जल का पान करना चाहिये।

———श्री श्री परमहंस योगानन्द

Saturday, 7 January 2017

समस्त देहधारियो के अन्तःकरण मे अन्तर्यामीरुप से स्थित भगवान

समस्त देहधारियो के अन्तःकरण मे अन्तर्यामीरुप से स्थित भगवान उनके जीवन के कारण है तथा बाहर कालरुप से स्थित हुए वे ही उनका नाश करते है । अतः जो आत्मज्ञानीजन अन्तर्दृष्टिद्वारा उन अन्तर्यामी की उपासना करते हैँ , वे मोक्षरुप अमरपद पाते है और जो विषयपरायण अज्ञानी पुरुष बाह्यदृष्टि से विषयचिन्तन मे ही लगे रहते है , वे जन्म मरण रुप मृत्यु के भागी होते हैँ ।

श्रीभगवान , सर्वगुरुओँ के गुरु हैँ

--> श्रीकृष्ण ,
श्रीभगवान , सर्वगुरुओँ के
गुरु हैँ । वे
सभी पतितात्माओँ
को मोक्ष प्रदान करने
वाले एवं त्रिलोक के
स्वामी है । भगवत्प्रेम
का अञ्जन लगाकर कोई
भी उनका दर्शन कर
सकता है -
" कृष्णं वन्दे जगतगुरुम् "
.... उनके पदारविन्दो मे
शरण ग्रहण करने
वाली सभी बद्धात्माओ
को उनका अभय हस्त
प्राप्त होता है .,.......
.......... भौतिक अस्तित्व से
भयभीत सभी प्राणियोँ के
लिए श्रीकृष्ण ही जीवन
के चरम लक्ष्य है ....

परमात्मा परम प्रेम के स्वरुप है

--> जय श्रीकृष्ण <--
परमात्मा परम प्रेम के
स्वरुप हैँ । सामान्य प्रेम
और परम प्रेम मेँ अन्तर है,
पुत्र , माता-
पिता आदि के साथ
जो प्रेम है , वह सामान्य
है । जगत् के सभी पदार्थ
और जीवोँ के
प्रति जो निःस्वार्थ
प्रेम होता है वह है परम
प्रेम ........ ....... जीव
बडा अयोग्य है , अपात्र
है । वह मन मेँ , आँखो से
हमेशा पाप
ही करता रहता है । फिर
भी ईश्वर तो उससे प्रेम
ही करते हैँ, ईश्वर जीव से
प्रेम करते है , उस पर प्रेम
बरसाते है और उससे प्रेम
की अपेक्षा करते है ।वे
प्रेम से ही वश मे हो सकते
है । वे धन से वश मेँ
नही हो सकते क्योँकि वे
स्वयं लक्ष्मीपति हैँ ........
.....,.. जब शारीरिक बल ,
द्रव्यबल , ज्ञानबल ,
आदि सब हार जाते हैँ , तब
प्रेमबल ही जीतता है ।
प्रेमबल सर्वश्रेष्ठ है ।
प्रेमबल परमात्मा को बस
मे करने का साधन है ।
.... सबसे ऊँची प्रेम सगाई ....
यदि परमात्मा के नाम
का बार - बार स्मरण
किया जाय तो प्रभुजी से
प्रेम हो जायेगा ..
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण
कृष्ण हरे हरे ..