प्रेमी भक्तों के लक्षण : _________श्री राधा विजयते नमः
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श्री नारद जी ने अपने भक्तिसूत्र के 48 वे सूत्र में कहा है
"य: कर्मफलं त्यजति, कर्माणि सन्यसति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति "
यहां श्री नारद जी प्रेमी भक्तों के लक्षण बता रहे हैं!
भगवान का प्रेमी भक्त जो कुछ भी करता है, वह भगवान के लिये ही करता है!
उसकी न कर्म में आसक्ति है ना कर्म फल में ! वह तो यंत्रवत है, परंतु जहां तक उसे यह स्मरण रहता है कि मैं यंत्र हूं, तब तक वह कर्म फल का त्यागी तो होता है, कर्म का त्यागी नही हो पाता! कर्म का त्यागी प्रेमी संत तभी होगा, जब वह अपने शरीर एवं संसार को सर्वथा विस्मृत कर जायेगा ! जगत एवं शरीर की स्मृति रहते भगवान मे पूर्ण तल्लीनता कहां हुई??
प्रेमी भक्त को जब आठो- पहर, रात-दिवस का भी ज्ञान नहीं रहता , उसके ध्यान पथ से भगवान जब एक क्षण के लिये भी नहीं हटते, उस स्थिती मे उसे पता ही नही रहता कि मैं शरीर हूं, मेरा शरीर एवं कोई संसार भी है और मुझसे कोई कर्म हो रहा है! उसके मन बुधि तो सम्पूर्णतया भगवान मे डूब जाते हैं और उस प्राकृत अहंकार के स्थान पर एक भाव जगत का भागवती, अप्राकृत अहंकार उदय हो जाता है !
उस अप्राकृत भागवती अहंकार की प्राप्ति के साथ ही उस प्रेमी भक्त का अप्राकृत भाव-जगत प्रारंभ हो जाता है,तब उस प्रेमी संत को ना तो प्राकृत जगत की स्मृति ही रहती है,एवं ना ही उसे प्राकृत काल, दिवस-रात का भान होता है!
उस स्थिति में जैसे हम पूर्वजन्म की पूर्णतया विस्मृति कर देते हैं, उस महाकृपापात्र प्रेमी भक्त की मन-बुधि इस प्राकृत माया जगत की पूर्णतया विस्मृति कर देती है! वह भगवान और भागवती लीला जगत से ऐसे एक हो जाता है, जैसे एक बूंद समुंद्र में गिरकर समुद्र से एक-मेक हो जाये ! वह नित्य भगतलीला का अप्राकृत पात्र बन जाता है
उस स्थिति का उल्लेख 48वें सूत्र मे नारद जी कर रहे है कि भगत समग्र कर्मो का स्वरुपत: त्यागकर द्वंद्व रहित भगवान का यंत्र हो जाता है,तब उस भक्त के अंत:करण में भगवान स्वयं विराजित हुए उसके प्रारब्ध पूरे होने तक संगोपान कर्म करने लगते हैं!!\\
Sunday, 22 May 2016
यः कर्म फलम् त्यजति , भक्ति सूत्र
Saturday, 21 May 2016
हित वृन्दावन 4
हित वृन्दावन 4
बन की लीला लालहिं भावै।
प्रत्र-प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नखसिख प्रिया जनावै।।
सकुचित न सकत प्रगट परिरंभन अलि-लंपट दुरि धावै।
संभ्रम देति कुलकि कल कामिनी रतिरण-कलह मचावै।।
उलटी सवै समुझि नैननि में अंजन - रेख बनावै।
(जैश्री) हितहरिवंश प्रीतिरीति बस सजनी श्याम कहावै।।
रस-लीलाओं के निर्माण में वृन्दावन के सहयोग के अन्य अनेक सुन्दर उदाहरण राधावल्लभीय रसिकों की वाणियों में देखे जा सकते हैं वास्तव में, वृन्दावन के सहयोग से ही राधा-माधव की प्रीति का विशदीकरण होता है और वे प्रेम रस का नित्य नूतन आस्वाद करने में समर्थ बनते हैं। प्रबोधानंद सरस्वती कृत एक शतक में वृन्दावन के इस कार्य के लिये कृतज्ञता प्रकाशित करते हुए श्री श्यमासुन्दर कहते है,-‘अहो मेरी और श्री राधा की जो केलि-चातुर्यधारा है, एवं हम दोनों की एक-दूसरे के प्रति जो अत्युच्च काम-तृष्णा निरवधि बढ़ती रहती हैं, तथा हम दोनों के प्रेम-बंधन में जो नित्य गाढ़ बल लगते हैं, हे रसखान वृन्दावन, यह सब तेरी शक्ति का ही चमत्कार हैं’-
श्री राधाय ममच यदहो केलिचातुर्यधारा,
यच्चात्युच्चैर्निरवधि वीरवृद्धयते कामतृष्ण।।
गाढ़ गाढ़ यदितिवलते कोअपि नौ प्रेमबन्ध,
सर्वर वृन्दावन -रस-खने ! शक्ति-विस्फूर्जितं ते।।
वृन्दावन को, रसिकों ने, प्रेरक प्रेम की मूर्ति माना है। प्रेरक प्रेम में भोक्ता -भोग्य की उभय रतियां एक बन कर मूर्तिमान होती हैं। अत: प्रेरक प्रेम युगल का समान पक्षपाती और पोषक होता है किन्तु प्रेम में भोग्य की स्वभाविक प्रधानता होती है और प्रेरक प्रेम भी भोग्य-प्रधान है। हितप्रभु ने, इसी लिये वृन्दावन को ‘राधा-विहार विपिन कहा है और अपने मन को उसी में रम जाने के लिये प्रोत्साहित किया है,
राधा करावचित पल्लववल्लरीके,
राधापदांकविलसन् मधुरस्थलीके।
राधायशोमुखरमत्तखगावली के,
राधा-विहार-विपिने रमतां मनो में।।[1]
उन्होंने श्री राधा को केवल वृन्दावन में ही प्रकट बतलाया है-यद् वृन्दावनमात्रगोचरमहो,’[2] ओर अपनी कोटि जन्मान्तरों की मधुर आशा को सर्वत्र से हटा कर वृन्दावन-भूमि पर स्थापित किया है-
किंवा नस्तै: सुशास्त्रै: किमथ तदुदितैर्वर्त्मभि: सद्गृहीतै।
यत्रास्ति प्रेममूर्ते र्नहि महिमसुधा नापि भावस्तदीय:।।
किंवा वैकुण्ठलक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा।
किंत्वाशाप्यस्तु वृन्दावनभुवि मधुराकोटिजन्मान्तरेअपि।।
रस-रूपा श्री राधा का यह अद्भुत रस-धाम उन्हीं की कृपा से उपासक के दृष्टि -पथ में आता है। हिताचार्य ने अपने एक पद में लीलागान से पूर्व वृन्दावन को प्रणाम किया है और श्री राधा की कृपा के बिना उसको सबके मनों के लिये अगम्य बताया है।
प्रथम यथामति प्रणऊँ वृन्दावन अतिरम्य।
श्री राधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य।।[1]
श्री राधा और वृन्दावन का इस प्रकार का सम्बन्ध देख कर हितप्रभु के शिष्य श्री प्रबोधानंद सरस्वती ने अपने शतक में इन दोनों की प्राप्ति को एक दूसरे के आश्रित बताया है। वे कहते हैा-‘जब तक श्री राधा के पद-नख-मणि की चन्द्रिका का आविर्भाव नहीं होता, तब तक मन-चकोरी को मोद प्राप्त नहीं होता, और जब तक वृन्दावन भूमि में गाढ़-निष्ठा नहीं होती तब तक श्री राधा-चरणों की करूणा का पूर्ण उदय नहीं होता।'
यावद्राधा पदनखमणी चन्द्रिका नाविरास्ते,
तावद् वृन्दावन भुवि मुद नैति चेतश्चकोरी।
तावद् वृन्दावन भुवि भवेन्नापि निष्ठा गरिष्ठा,
तावदाधा चरणकरूणा नैव ताद्दश्युदेति।।
जय जय श्यामाश्याम ।।। क्रमशः ।।
मिलन - आँचल सखी जु
मिलन...
मिलन एक अतृप्त तृप्ति है,जो कभी पूर्ण नही।
यह एक ऐसी अग्नि है,जो प्रेमी की बाहो मे होकर ओर ओर भडकती है।
प्रेमी का समीप होना ही,इसके लिए घृत का कार्य करता है।
यह वो रस है,जो प्यास बुझाता नही,बढाता है....इस अग्नि मे सब शीतलता लुप्त हो जाती है।
Thursday, 19 May 2016
भाई जी के अद्भुत विचार
[]श्री भाईजी --->
हमारे मन पर जो भी प्रभाव डाले वो सारा संग है, वो संग चाहे किसी भी वस्तु का हो या परिस्थिति का हो या किसी भी प्राणी का हो। जो भगवान से हटा के भोगों मे लगा दे वो कुसंग और जो भोगो से हटाकर के भगवत्प्रेम की ओर लगा दे वो सत्संग , वो साधुसंग ।
भगवान के प्रेम की प्राप्ति के मार्ग में जो कुछ भी बाधक है वो सारा का सारा दुस्संग है , चाहे उसका नाम सत्संग हो , चाहे उसका नाम सम्पत्ति हो , चाहे उसका नाम धन हो , मान हो ,कीर्ति हो ,अधिकार हो ,स्वर्ग हो ,सुख हो ,भोग हो , मान हो ,संतपना हो , कुछ भी हो ,जो भगवत्प्रेम के मार्ग में विरोधी , बाधक, उसका संग दुस्संग , दुस्संग सर्वथा त्याज्य ।
बरु भल बास नरक कर ताता दुष्ट संग जनि देइ विधाता
( रामचरितमानस)
[]श्री भाईजी --- ये जो बहुत सुनना और बहुत कहना है -- ये साधकों का काम नहीं है, ये तो सुनने की शौक वालों का काम है। अच्छी शौक है इसलिए अच्छी बात है, बुरी चीज नहीँ, इससे लाभ होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। भगवान के गुणानुवाद, अच्छी बातें कैसे भी कान में जायँ - ये लाभदायिनी हैं जरा भी संदेह नहीं , इसका खंडन जरा भी नही, जितना प्रचार उतना अच्छा , तथापि जो एकांत साधक है, उसके लिए बहुत सुनने की, बहुत जानने की आवश्यकता नहीँ, थोड़ा जाने, थोड़ा सुने और जो जाने, जो सुने, उसको जीवन में उतारना शुरू करदे - ये साधक का काम।
[]श्री भाईजी --- ये जितने भी भाषण हैं, जितने भी वक्तव्य हैं --- ये सब साधना की चीज नहीं है। सर्वोत्तम चीज तो क्या होगी --- ये मैं समझता हूँ, चुपचाप बैठा राधा नाम जपता और राधा के स्वरूप का ध्यान करता हुआ आँसू बहाता। उसके सामने इन भाषणों का कोई मूल्य नहीँ है, ये सब बाह्य हैँ। पर स्थिति अपनी बाह्य है, इसलिए बाह्य स्थिति की बात सामने आती है, इतना सौभाग्य - इनमें राधा का नाम आ जाता है, श्यामसुन्दर का नाम आ जाता है, इसी बहाने उनकी स्मृति होती है।
[]श्री भाईजी --
वस्तुतः मुझमें कुछ भी नही है। जो कुछ है, भगवान में है। भगवान के सम्पर्क को लेकर जो मेरे माध्यम से भगवत्प्राप्ति या भगवत्प्रेम चाहते हैं,उनके अन्तःकरण की सत्यता के फलस्वरूप भगवत्कृपा से उनकी प्रेमकामना पूर्ण होगी। पर मेरे साथ उनका सम्बन्ध केवल भगवत्-सम्पर्कयुक्त ही होना चाहिये, किसी प्रकार की लौकिकता का सम्मिश्रण उसमें नहीं होना चाहिए।
इसलिए मै इस बात को जानता हूँ कि मुझसे दूर-दूर रहने वाले कई स्त्री-पुरुष मुझमें भगवत्सम्पर्कित निष्ठा रखने के कारण भगवत्प्राप्ति के समीप पहुँच रहे है,और मेरे पास, सदा मेरे समीप रहने वाले बहुत से लोग भाव न रखने के कारण आत्मवंचित हो रहे हैं।
अपने को जगत के सामने मुझे अपना जाहिर करने वाले कोरे रह गये और जिनके विषय में किसी को पता भी नहीं है कि उनसे मेरा कोई सम्पर्क है, वे पा गये। जो पा गये, वे अब भी पा रहे हैं और चूंकि उनका मार्ग मुक्त हो गया है,अतएव वे आगे भी यथाधिकार पाते रहेंगे।
अत एव जबतक जीवन है,तबतक जिनको कुछ भी पाने की ईच्छा.हो,उन्हें अंतरंग बनने की -- पास रहने, न रहने को कोई महत्व न देकर -- मेरे मनोनुकूल साधना में नित्य प्रवृत्त रहनें की चेष्टा करनी चाहिये, जिससे कम से कम उनका ग्रहण द्वार मुक्त हो जाय।
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हित वृन्दावन 3
हित वृन्दावन 3
वृन्दावन की एकरस प्रेमरूपता को अनेक सुन्दर प्रकारों में व्यक्त किया गया है। ‘श्रीवृन्दावन में आनन्द -सिन्धु की तरंगे उठती रहती हैं। वहां अनुराग के मेघों के मनद वर्षणों में छवि के दो फूल श्याम-श्यामा फूले रहते हैं। वृन्दावन-रूप सरोवर में गम्भीर प्रेम-नीर भरा है जिसमें दोनों रसिक मुग्ध भाव से मज्जन करते रहते हैं:-
श्री वृंदावन मांहि, आनंद सिधु तरंग उठैं।
घन अनुराग चुचांहिं, फूले छवि के फूल द्वै।।
वृन्दावन सरवर भरयौ, प्रेम-नीर गंभीर।
तामें मज्जत रसिक दोऊ, बिसरे नैननि-चीर।।[1]
काव्य-रस की दृष्टि से वृन्दावन केा उद्दीपन विभाव माना जा सकता है और वह श्याम-श्यामा की प्रीति का उद्दीपन करता भी है।
किन्तु वृन्दावन-रस-रीति में श्यामाश्याम की उज्ज्वल रस-मयी लालाओं के निर्माण में वृन्दावन का सक्रिय सहयोग रहता हैं। अनेक लीलायें ऐसी होती हैं जिनका प्रवर्तन ही वृन्दावन के द्वारा होता है। वृन्दावन का सक्रिय सहयोग रहता है। अनेक लीलायें ऐसी होती हैं जिनका प्रवर्तन ही वृन्दावन के द्वारा होता होता है। वृन्दावन के द्वारा आयोजित लीलाओं की विशेषता यह है कि उनमें रस के बड़े विरल अंगों का प्रकाशन होता है। हिताचार्य ने अपने एक पद में इस प्रकार की एक लीला का वर्णन किया है। वे कहते हैं, ‘वृन्दावन के द्वारा आयोजित लीलायें श्यामसुन्दर को प्रिय हैं। वृन्दावन के पत्र-प्रसून इतने निर्मल हैं कि उनमें श्याम-श्यामा के प्रतिबिंब पड़ते रहते हैं। किन्तु कभी ऐसा होता है कि इनमें पड़ा हुआ श्याम सुन्दर का प्रतिबिंब भी श्रीराधा का ही प्रतिबिंब मालूम होता है। अपने और अपनी प्रियतमा के प्रतिबिंबों की समता होने पर श्याम सुन्दर संकोच में पउ़ जाते हेा और इस विचार से कि प्रिया का परिरंभण करने की चेष्टा करने पर कहीं वे अपने प्रतिबिंब का ही आलिंगन न करलें, वे श्रीराधा के स्वाभाविक अंग-सौरभ का अनुसंधान पकड़ कर अपने प्रतिबिंब को बचाते हुए चलते हैं। उधर श्री राधा भी अपने प्रियतम को संभ्रम देती है और नायक की भांति रतिगण-कलह मचाती हैं। अपनी प्रिया का स्पर्ष करने की प्रत्येक चेष्टा विफल होती देख कर और यह समझ कर कि इस समय सारी बातें उलटी हो रही है, वे अपने हाथ से अपने नेत्रों में अंजन की रेखा बनाते हैं और इस प्रकार अपनी प्रिया की सखी बन कर उनको प्राप्त कर लेते हैं। क्योंकि कि वृन्दावन के पत्र-प्रसूनों में सखियों का प्रतिबिंब प्रिया-रूप में नहीं पड़ता।'
ईश्वर और साधना , भाई जी
श्रीभाईजी ( हनुमानप्रसादजी पोद्दार ) सर्वोपरि, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वमय , सर्वगुणाधार, निर्विकार, नित्य, निरंजन, सृष्टिकर्त्ता, पालनकर्त्ता, संहारकर्त्ता, विज्ञानानन्दघन, सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार, परमात्मा वस्तुतः एक ही हैं। वे एक ही अनेक भावों और अनेक रूपों में लीला करते हैं।।
हम अपने समझने के लिए मोटे रूप से उनके आठ रूपों का भेद कर सकते हैं। 1 - नित्य विज्ञानानन्दघन, निर्गुण, निराकार, मायारहित, एकरस ब्रह्म ; 2 - सगुण, सनातन, सर्वेश्र्वर, सर्वशक्तिमान, अव्यक्त निराकार परमात्मा ; 3 - सृष्टिकर्त्ता प्रजापति ब्रह्मा ; 4 - पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ; 5 - संहारकर्त्ता भगवान रूद्र ; 6 - श्री राम, श्रीकृष्ण, श्रीदुर्गा, काली आदि साकार रूपों में अवतरित रूप ; 7 - असंख्य जीवात्मा रूप से विभिन्न जीवशरीरो मे व्याप्त ; 8 - विश्व ब्रह्माण्ड रूप विराट। ये आठों रूप एक ही परमात्मा के हैं। इन्ही समग्र रूप प्रभु को रुचिवैचित्र्य के कारण संसार में लोग ब्रह्म, सदाशिव, महाविष्णु, ब्रह्मा, महाशक्ति, राम, कृष्ण, गणेश, सूर्य, अल्लाह, गॉड, प्रकृति आदि भिन्न भिन्न नाम रूपों में विभिन्न प्रकार से पूजते हैं। वे सच्चिदानन्दघन अनिर्वचनीय प्रभु एक ही हैं, लीलाभेद से उनके नाम रूपों मे भेद है और इसी भेदभाव के कारण उपासना में भेद है।
यद्यपि उपासक को अपने इष्टदेव के नाम-रूप मे ही अनन्यता रखनी चाहिये तथा उसी की पूजा शास्त्रोक्त पूजन-पद्धति के अनुसार करनी चाहिये, परन्तु इतना निरंतर स्मरण रखना चाहिये कि शेष सभी रूप और नाम भी उसी इष्टदेव के हैं। उसी के प्रभु इतने विभिन्न नामों-रूपों में समस्त विश्व के द्वारा पूजित होते हैं।इनके अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं। तमाम जगतमें वस्तुतः एक वही फैले हुए हैं।
एक की पूजा से स्वाभाविक ही सभी की पूजा हो जाती है।क्योंकि एक ही सब बने हुए हैं। जो विष्णु को पूजता है, वह.अपनेआप ही शिव, ब्रह्मा, राम, कृष्ण आदि को पूजता है और जो राम , कृष्ण को पूजता है वह ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि को ।
परन्तु जो किसी एक रूप से अन्य समस्त रूपों को अलग मानकर औरों की अवज्ञा करके केवल अपने इष्ट एक ही रूप को अपनी ही सीमा में आबद्ध रखकर पूजता है, वह अपनें परमेंश्वर को छोटा बना लेता है, उनको सर्वोच्च के आसन से नीचे उतारता है, इसलिए उसकी पूजा सर्वोपरि सर्वमय भगवान की न होकर एकदेशनिवासी स्वल्प देवविशेष की होती है और उसे वैसा ही उसका अल्प फल मिलता है।
अतएव पूजो एक ही रूप को, परन्तु शेष सब रूपों को समझो उसीएक के वैसे ही शक्तिसम्पन्न अनेक रूप ।
-------श्री राधाबाबा के श्रीमुख से - मेरी यह धारणा है कि श्रीराधारानी के साथ अभेदावस्था किसी किसी विरले महापुरुष की ही होती है। जिसका उदाहरण एकमात्र अबतक केवल चैतन्य महाप्रभु ही हैं।इनके अतिरिक्त आधुनिक सन्तों में तो कोई नही है। श्रीराधारानी में अभेदावस्था की प्राप्ति तो दूर की बात है,इन श्री राधारानी के इस रूप का दर्शन ही ब्रह्माजी एवं शंकरजी तक को दुर्लभ है। पद्मपुराण में यह कथा आती है कि श्रीनारदजी को इनके दर्शन होने पर श्री गोपीजनों ने कहा है कि इस रूप का दर्शन जो तुम्हे हुआ है,त्रिदेवों को भी दुर्लभ है।ऐसी श्रीराधारानी का दर्शन पूज्य श्री भाईजी हनुमानप्रसादजी पोद्दार को हुआ और वे उसमें लीन हो गये। पूज्य पोद्दार महाराज दासी का, मंजरी का, नर्म सखियों का सबका उल्लंघन करते हुए सीधे श्रीराधारानी में सायुज्य लाभ करके कृतार्थ हो गये।
-------किसी ने श्री भाईजी से प्रश्न किया - सर्वोत्तम साधन क्या है ? भाईजी ने उत्तर दिया -
मेरी तो first, last & latest discovery (प्रथम, अन्तिम और नवीनतम अविष्कार )यही है कि अपना कल्याण चाहने वाला व्यक्ति नाम का आश्रय पकड़ले और साधन हो सके तो अवश्य करे ,किसी का विरोध नही है परन्तु और कुछ भी न हो सके तो केवल जीभ से निरन्तर नाम जप करता रहे।
भगवन्नाम के अनुभव मैं क्या बताऊँ जीवन में जो कुछ भी अच्छापन है वह केवल भगवन्नाम और भगवत्कृपा की महिमा है।मैं सच कहता हूँ कि मेरे पास अगर कोई धन है तो भगवन्नाम और भगवत्कृपा का ।
भगवान के मंगलमय नाम से ऐसा कौन सा कार्य है,जो सिद्ध नहीं हो सकता ; ऐसा कौनसा महापाप है,जिसका नाश नही हो सकता।ऐसी कौनसी परम गति या मुक्ति है ,जो नाम से नहीं मिलती ।
मोहन-मन-धन हारिणी,सुखकारिणी अनूप।
भावमयी श्रीराधिका, आनन्दाम्बुधि-रूप।।
- श्री भाईजी।
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हित वृन्दावन 1
हित वृन्दावन
उपास्य तत्व के साथ उसके परम-पद, लोक किंवा स्थान की योजना वेदों के समय से ही होती चली आई है। वेदों और उपनिषदों में त्रिपाद्विभूति , महिमा, विष्णुपद, ब्रह्मलोक, परमव्योम, गुहा आदि की योजनाएं देखने को मिलती हैं। ऋग्वेद और यजुर्वेद में जहां ‘गोपविष्णु ‘ का उल्लेख हैं वहां उनके लोक का भी है, जिसमें बडे़-बडे सींग वाली गायें इधर उधर घूमती रहती हैं-‘यत्र गावो भूरि श्रृंगा आयास:’’। वृहदारण्यक उपनिषद्[1] और छान्दोग्य उपनिषद्[2] में ब्रह्मलोक का वर्णन है जहां पहुँच कर जीव को फिर भव-विप्लव में लौटना नहीं पड़ता-‘’ब्रह्मलोक मभिसम्पद्यते न च पुनरावत्ते न च पुनरावर्तते।‘’[3] इसके अतिरिक्त हर एक देवता के भी लोक निर्दिष्ट हैं-जैसे अगिनलोक, वायुलोक, आदित्यलोक आदि। इन सब लोकों, पदों और स्थानों का स्वरूप, सवभावत:, इनके अधिष्ठातृ देवता के अनुरूप होता है।
वैष्णव संप्रदायों के उदय के साथ, प्रधनतया आगमों और पुराणों पर आधारित, वैष्णव उपास्य -तत्व का विकास हुआ और विभिन्न उपास्य स्वरूपों के अनुरूप वैकुण्ठ, गो-लोक आदि स्थानों की योजना को महत्व मिला। इस योजन में वृन्दावन गोलोक का एक विशेष भाग है और रासलीला का स्थान होने के कारण सर्वश्रेष्ठ है। प्रकट लीला और अप्रकट लीला के भेद से वृन्दावन के दो रूप माने गये हैं-एक भू-वृन्दावन और दूसरा त्रिपाद्विभूतिस्थ किंवा गोलोकस्थ वृन्दावन और दोनों का अभेद प्रतिपादित किया गया है। विष्णु पुराण में भगवान की तीन शक्तियां मानी गई हैं-ह्रादिनी, संधिनी और संवित्। इनमें से वृन्दावन संधिनी शक्त्िा का विलास है और चिन्मय रूप है।
राधावल्ल्भय सिद्धान्त में प्रेम का प्रथम सहज रूप, उसकी सहज सुन्दर आकृति सुन्दर आकृति, श्री वृन्दावन है। इस सिद्धान्त में सभी रूप प्रेम के ही रूप हैं, किन्तु इन सब में प्रेम के प्रकाश का तारतम्य रहता है, इनमें प्रेम की शुद्ध, पूर्ण एवं स्वभाविक अभिव्यक्ति नहीं होती। अपने जिन चार रूपों में प्रेम पूर्ण शुद्ध स्थिति में व्यक्त होता है, उनको प्रेम का ‘सहज रूप’ कहा जाता है।
पूर्ण प्रेम नित्य, नूतन और एकरस होता है। स्वभावत: वृन्दावन भी नित्य नूतन और नित्य एकरस रहता है। नित्य नूतन रहेन के कारण वह परम सौन्दर्य का और नित्य एक-रस रहने कारण परमे प्रेम का धाम है। भारतीय रस-परंपरा में कमादेव को परम सौन्दर्य का प्रतीक माना जाता है। इन कामदेवों के समूह अपने परिकर-सहित वृन्दावन के नवल-निकुंज -मंदिर को रात-दिन सँवारते रहते हैं;
अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज।
सेवत सगन प्रीतिजुत दिन मीनध्वज पुंज।।[1]
‘वृन्दावन की भूमि सहज रूप से हेममयी है जिसमें अनेक रंग के रत्न इस प्रकार जड़े हुए हैं कि उनके द्वारा विचित्र प्रकार के चित्रों की रचना हेा रही है और उनमें से छवि की तरंगें उठती रहती हैं। वृन्दावन में कपूर की रज झलकती रहती है और उसको देखकर नेत्र और हृदय शीतल हो जाते हैं। यहां की प्रत्येक लता कल्पतरू हैं और प्रत्येक फूल परिजात है जो सहज एकरस रह कर यमुनाकूल पर झलमलाता रहता है। यहां सुन्दर, सुभग तमाल से कंचन की लता लिपट रही है जिसे देख कर नेत्रों को चकाचौंधीन होती है। यहां की कुंजें ऐसे अद्भुत प्रकाश से झलमलाती रहती हैं कि करोड़ों सूर्य- चन्द्र भी उसकी समानता नहीं कर सकते। वृन्दावन के चारों ओर अथाह शोभा लिये यमुना बहती रहती है, मानों श्रृंगार रस कुंडल बांधकर प्रवाहित हो रहा है।‘
‘वृन्दावन में मधुर गुंजार करती हुई मधुपावली मत्तधूमा करती है, मानो अनुराग के मेध मदगर्जन कर रहे हैं। यहां के विहंग मधुर गति-ताल से कूजते रहते हैं, मानों द्रुमों पर चढी रागनियां तान-तरंग गा रही हैं। यहां मृगी, मयूरी और हंसिनी प्रेमानंद से भरी हुई श्यामश्यामा रूप युगलकमलों का मकरंद मत्त होकर पान करती रहती हैं। वृन्दावन-बाग अनेक भांति से फूल रहा है और यहां रति और सोहनी हाथ में लिये पुष्प -पराग झाडती रहती हैं। वृन्दावन की प्रत्येक कुंज में शय्या-रूपी आसन झलमलाता रहता है और प्रत्येक कुंज युगल की सेवा में उपयोगी नित्य नूतन और सहज सामग्री से पूर्ण रहती है, जिसकी छवि के कण का भी वर्णन नहीं किया जा सकता। यह वन नाना प्रकार के सुगंधि-द्रव्यों से सुवासित रहता है और यहां मोद के उदगार उठते रहते हैं। सारा वन इस प्रकारा जगमगाता रहता है मानों करोड़ों दामिनी धन में सुशोभित हैं।'
-- क्रमशः ।।।।