Wednesday, 27 April 2016

लीलामय भगवान 1 - भाई जी

1- भगवान के कर्म भगवान के स्वरूप से भिन्न नहीं हैं। इसीलिये भगवान के कर्मों का नाम कर्म नहीं, लीला है। लीला सच्चिदानन्दस्वरूप का चित्स्वरूपविलास है। जैसे समुद्र की तरंगे समुद्र के ही विलास हैं, वैसे चिद्-घन-सिन्धु भगवान की लीला चित्स्वरूप के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
2- भगवान की अचिन्त्य महाशक्ति में विश्वास किये बिना लीला में रस नहीं आयेगा। उसमें स्थान-स्थान पर संदेह उत्पन्न होगा या उन लीलाओं का आध्यात्मिक अर्थ लगाकर उनका माधुर्य नष्ट कर दिया जायगा। भगवान की लीलावली भक्तों के सामने नित्य सत्य है और वास्तव में तो सत्य है ही।
3- लोगों के देखने में वृन्दावनधाम आठ कोस लम्बा तथा चार कोस चौड़ा है, पर भगवान का धाम अचिन्त्य चिन्मयस्वरूप है। उसके एक-एक धूलकण में अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों का समावेश हो सकता है और है।
4- भगवान की प्रकट लीला में जितने भी लीलासहचर वात्सल्य, सख्य, एवं मधुरभाव रखने वाले हैं, वे सब-के-सब भगवान के ही स्वरूप हैं; क्योंकि वे सभी भगवान की लीला-पार्षद हैं। उनके द्वारा जो भी चेष्टा होती है, वे जो कुछ भी करते हैं, करने की चेष्टा करते हैं, सब भगवान की इच्छा शक्ति से समन्वित लीलाशक्ति के द्वारा होता है तथा यह सब भगवान की लीला का उपकरण है।
5- भगवान की बाललीलाएँ ठीक प्राकृत बालकों की भाँति होती है। उनमें अप्राकृत भाव देखने को नहीं मिलता। अप्राकृत का यह विचित्र प्राकृतानुकरण देखने में बड़ा मनोहर होता है। जिनके संकल्प से अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन, पालन, संचालन होता है, उनकी प्राकृत लीला को देखकर यह भ्रम होना स्वाभाविक ही है कि ये सर्वेश हैं कि नहीं। यदि कोई उनके चरणों की शरण लेकर माधुर्य ग्रहण करना चाहे तो उसे ज्ञात होगा कि अप्राकृत की यह प्राकृत लीला कितनी मधुर है। भगवान की ‘भक्तवत्सलता’ एवं ‘प्रेमाधीनता’ का यहीं पता लगता है।

अखिल ब्रह्माण्डपालक होकर भी वे अपने असीम ऐश्वर्य का तनिक-सा भी प्रकाश न करके साधारण बालकों के साथ ठीक बालक होकर खेलते हैं। पर ऐसा नहीं मानना चाहिये कि वे कोई दम्भ करते हैं; वे सचमुच ही खेलते हैं, सचमुच ही उन्हें इसमें आनन्द मिलत है। आनन्द को आनन्द देना, आनन्दमय में आनन्द की कामना - स्पृहा उत्पन्न करना, यह प्रेमी भक्तों का ही काम है। आनन्द का रस लेने के लिये ही भगवान वात्सल्य, सख्य, मधुर आदि रसों की प्रेमी भक्तों के अनुरूप लीला करते हैं। अप्राकृत की लीला अप्राकृत है, पर देखने में प्राकृत-सी है। प्रेमी भक्तों को सुख हो, भगवान उसी प्रकार की लीलाएँ करते हैं। प्रेमियों के सुख में उन्हें सुख होता है। उनके श्रीकृष्ण आदि अवतारों की लीलाएँ नयी नहीं हैं; वे तो नित्य होता हैं और नित्य होती रहेंगी - यह नहीं कि पहले नहीं थीं, अब प्रकट हुई हैं। भगवान जिस प्रकार नित्य हैं, उसी प्रकार उनकी लीलाएँ भी नित्य हैं। इनमें मायिक जगत् का काम नहीं। जो भक्त इनमें आनन्द लेते हैं, वास्तविक रूप में वे ही भाग्यवान् हैं।
6- लीलाशक्ति एवं कृपाशक्ति भगवान की समस्त शक्तियों में प्रधान हैं। कोई भी शक्ति इन दोनों शक्तियों के विरोध में आत्म प्रकाश नहीं करती। सारी शक्तियाँ इन दोनों शक्तियों के प्रकाश के लिये ही कार्य करती हैं और सदा इनके अनुगत होकर चलती हैं।
7- भगवान दम्भ नहीं करते, न नाट्य करते हैं। भगवान की जितनी भी प्रेमलीलाएँ होती है, उनमें भगवान जानते हुए भी अनजान की भाँति काम करते हों यह बात नहीं है। उनकी प्रत्येक लीला सच्ची है। लीलाशक्ति की इच्छा से वहाँ सर्वज्ञता शक्ति भी छिपी रहती है, यह उनकी प्रेमाधीनता है।
8- जीव की तुच्छ शक्ति के काँटे पर जब हम भगवान की क्रियाओं को तौलने जाते हैं, तब विफल ही होते हैं। पर यदि अपनी शक्ति को भूलकर श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्ति की ओर ध्यान दें तो हमें ज्ञात होगा कि उनकी अचिन्त्य शक्ति के लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।
9- लीलामय के लीला-सिद्धान्त को समझने के लिये लीलामय के चरणों की शरण लेनी चाहिये। जो अपनी विद्या, पुरुषार्थ और अपनी शक्ति के बल पर उनको समझना चाहता है, जानना चाहता है, वह न तो भगवान को समझ ही सकता है और न जान ही सकता है। वह यथार्थ वस्तु को जान नहीं सकता और उसमें अपनी माया बुद्धि से, मायिक समझ से प्राकृत भाव घर कर बैठता है। भगवान की लीला को समझने के लिये भगवान की कृपा पर भरोसा करना, अचिन्त्य महाशक्ति की शरण लेना तथा श्रीकृष्ण के चरणों का आश्रय ग्रहण करना चाहिये; नहीं तो विपरीत धारणा हो जाती है, विश्वास नहीं होता और उस लीला में रूपक, कल्पना, माया, नाट्य, दृष्टान्त, प्रक्षिप्तता आदि दोष बुद्धि आ जाती है।

इस प्रकार हम लीला कथा सुनकर अविश्वास करके नाना प्रकार के अपराध कर बैठते हैं। हमारे पाप के साथ-साथ वक्ता को भी पाप का भागी होना पड़ता है। जो श्रीकृष्ण लीला में रंच मात्र भी अविश्वास करते हों, जो अपनी विद्वत्ता के कारण उसे रूपक, कल्पना आदि बताते हों, उनके सामने लीला-कथा नहीं कहनी चाहिये। श्रीकृष्ण लीला उन्हीं के सामने कहनी चाहिये, जो तर्क के स्थान पर विश्वास रखते हों तथा जो श्रद्धापूर्वक लीला कथा सुनना चाहते हों। भगवान की लीला अत्यन्त गुह्य है।

10- भगवान श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तो सर्वत्र व्याप्त है, उसे देखने के लिये प्रयास नहीं करना पड़ता; पर उसका माधुर्य बड़ा गोपनीय है, उसका प्रकाश उनकी कृपा के बिना नहीं हो सकता। उनका माधुर्य तो उनकी मुग्धता में ही है। वे जब बहुत बड़े होकर भी बहुत छोटे बनते हैं, ज्ञानमय होकर भी अज्ञ बनते हैं, प्रेमी भक्तों के साथ मिलन एवं विरह की लीला करते हैं, उस समय उनका माधुर्य सिन्धु उमड़ता है और उसमें अनन्त एक-से-एक विलक्षण विविध तरंगें लहराने लगती हैं, जिससे सारा जगत परमानन्द-सुधा से आप्लावित हो जाता है।
"भाई जी" का यह भाव आगे भी जारी है , बात सरल तरह से कहीँ है फिर भी सन्देह रहित चित् रहे अतः शांत भाव से मनन कर गुरूजन का यथेष्ठ संग कीजिये  -- सत्यजीत तृषित ।

Tuesday, 26 April 2016

प्रेम भक्ति के प्रश्न ?

प्रेम भक्ति के प्रश्न🌹🌹🌹🌹

1- "सर्वोच्च विद्या क्या है?"
"श्रीराधा रानी जी की भक्ति !"

2- "सबसे बड़ा यशस्वी कार्य क्या है?"
"श्रीराधा रानी जी की  सेविका ( मंजरी ) बनना !"

3- "सर्वोच्च धन क्या है? "
" श्रीराधा-कृष्ण के प्रति सहज प्रेम !"

4- "सबसे भारी दुःख क्या है?"
"श्रीराधा रानी जी के भक्तो के संग से दूर होना !"

5- "परम सेवा क्या है?"
"श्रीराधा रानी जी चरण कमल सेवा के

6- "कौन-सा गीत सर्वोत्तम है?
"वह जो राधा -कृष्ण की लीलाओं से युक्त हो !"

7- जीवों का परम मंगल किसमें है?"
" श्री राधा  जी के भक्तों का संग !"

8- ध्यान योग्य एकमात्र वस्तु क्या है?"
श्रीराधा-कृष्ण के चरणकमल !"

9- रहने योग्य सर्वोत्तम स्थान कौन-सा है?"
जहाँ कहीं भी श्री राधा कृष्ण अपनी दिव्य लीलाएँ  करें वृन्दावन श्री राधा कुण्ड बरसाने

10-"श्रवण योग्य सर्वोत्तम विषय क्या है?"
"श्रीराधा -कृष्ण की मधुर लीलाएँ !"

11- सबसे उपास्य वस्तु क्या है?
"श्रीराधा - कृष्ण का नाम!"

मैं कौन हूँ ? मेरा कर्त्तव्य क्या है ? भाग 1 - सेठ जी

॥ओम नारायण ॥
मैं कौन हूँ और मेरा क्या कर्तव्य है ?
पोस्ट संख्या- (१)

       प्रत्येक मनुष्यको विचार करना चाहिये कि 'मैं कौन हूँ और मेरा क्या कर्तव्य है ?' मैं नाम, रूप, देह, इंद्रिय, मन या बुद्धि हूँ या इनसे कोई भिन्न वस्तु हूँ ? विचारपूर्वक निर्णय करनेसे यही बात ठहरती है कि मैं नाम नहीं हूँ। मुझे आज जयदयाल कहते हैं परंतु जब प्रसव हुआ था, उस समय इसका नाम जयदयाल नहीं था । यद्यपि मैं मौजूद था, घरवालोंने कुछ दिन बाद नामकरण किया । उन्होंने उस समय जयदयाल नाम न रखकर महादयाल रखा होता तो आज मैं महादयाल कहलाता और अपनेको महादयाल ही समझता । मैं न पूर्वजन्ममें जयदयाल था, न गर्भमें जयदयाल था और न शरीर-नाशके बाद जयदयाल रहूँगा । यह तो केवल घरवालोंका निदेश किया हुआ सांकेतिक नाम है । यह नाम एक ऐसा कल्पित है कि जब चाहे तब बदला जा सकता है और उसीमें उसका अभिमान हो जाता है । जो विवेकवान पुरुष इस रहस्यको समझ लेता है कि मैं नाम नहीं हूँ वह नामकी निन्दा-स्तुतिसे कदापि सुखी-दु:खी नहीं होता । जब मनुष्य 'नाम'की निन्दा-स्तुतिमें सम नहीं है, निन्दा-स्तुतिमें सुखी- दु:खी होता है, तब वह नाम न होनेपर भी 'नाम' बना बैठा है, जो सर्वथा भ्रमपूर्ण है । जो इस रहस्यको जान लेता है, उसमें इस भ्रमकी गन्धमात्र भी नहीं रहती । इसीलिये श्रीभगवानने तत्ववेत्ता पुरुषोंके लक्षणों को बतलाते हुए उन्हें निन्दा और स्तुतिमें सम बतलाया है… 'तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी' (गीता १२ । १९) 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:' (गीता १४ । २४)
        फिर यह प्रसिद्ध भी है कि जयदयाल 'मेरा' 'नाम' है, 'मैं’ जयदयाल नहीं हूँ। इससे यह सिद्ध हुआ नाम 'मैं' नहीं हूँ।
        इसी प्रकार रूप- भी मैं नहीं हूँ, क्योकि देह जड है और मैं चेतन हूँ । देह क्षय, वृद्धि, उत्पति और विनाश धर्मवाला है, मैं इससे सर्वथा रहित हूँ। बालकपनमें देहका और ही स्वरूप था, युवापनमें दूसरा था और अब कुछ और ही है; किंतु मैं तीनों अवस्थाओंको जाननेवाला तीनोंमे एक ही हूँ। किसी पुरुषने मुझको बाल्यावस्थामें देखा था, अब वह मुझसे मिलता है तो मुझे पहचान नहीं सकता । देहका रूप बदल गया । शरीर बढ़ गया, मूँछें आ गयी । इससे वह नहीं पहचानता । किन्तु मैं पहचानता हूँ, मैं उससे कहता है, आपका शरीर युवावस्थासे वृद्ध होनेके कारण उसमे कम अन्तर पडा है, इससे मैं आपको पहचानता हूँ। मैने अपको अमुक जगह देखा था । उस समय मैं बालक था, अब मेरे शरीरमें बहुत परिवर्तन हो गया, अत: आप मुझे नहीं पहचान सके । इससे यह सिद्ध होता है कि शरीर 'मैं नहीं हूँ।' किंतु 'शरीर मैं हूँ' ऐसा अभिमान भी पूर्वोक्त नामके समान ही सर्वथा भ्रमपूर्ण है । जो पुरुष इस रहस्यको जानते हैं वे शरीरके मानापमान और सुख-टु:खमें सर्वथा सम रहते हैं, क्योकि वे इस बातको समझ जाते है कि मैं शरीरसे सर्वथा पृथक हूँ। इसीलिये तत्त्ववेत्ताओँके लक्षणोंमें भगवान कहते हैं-
        'समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापनायो: ।'
                                           (गीता १२। १८)
         'मानापमानयोस्तुल्य:' ( गीता १४ । २५)
         'समदुखसुखः स्वस्थ: ' ( गीता १४ । २४)
    अतएव विचार करनेसे यह प्रत्यक्ष सिद्ध होता है कि यह जड शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इस शरीरका ज्ञाता हूँ और प्रसिद्ध भी यही है कि -शरीर 'मेरा' है । मनुष्य भ्रमसे ही शरीरमें आत्माभिमान करके इसके मानापमान और सुख-दु:खसे सुखी-दु:खी होता है ।
॥ ओम नारायण ॥
क्रमश :--

गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित 'ज्ञानयोगका तत्व' में परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका का लेख ।

क्या प्रत्यक्ष दर्शन होता है ? - गोयन्दका जी सेठ जी

बहुत-से सज्जन मन में शंका उत्पन्न कर इस प्रकार के प्रश्न करते हैं कि दो प्यारे मित्र जैसे आपस में मिलते हैं क्या इसी प्रकार इस कलिकाल में भी भगवान् के प्रत्यक्ष दर्शन मिल सकते हैं ? यदि सम्भव है तो ऐसा कौन-सा उपाय है कि जिससे हम उस मनोमोहिनी मूर्ति का शीघ्र ही दर्शन कर सकें ? साथ ही यह भी जानना चाहते हैं, क्या वर्तमान काल में ऐसा कोई पुरुष संसार में है जिसको उपर्युक्त प्रकार से भगवान् मिले हों ?

     वास्तव में तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर वे ही महान पुरुष दे सकते हैं जिनको भगवान् की उस मनोमोहिनी मूर्ति साक्षात् दर्शन हुआ हो |
यद्यपि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ तथापि परमात्मा की और महान पुरुषों की दया से केवल अपने मनोविनोदार्थ तीनों प्रश्नों के सम्बन्ध में क्रमशः कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ |

     (१) जिस तरह सत्ययुगादि में ध्रुव, प्रह्लादादि को साक्षात् दर्शन होने के प्रमाण मिलते हैं उसी तरह कलियुग में भी सूरदास, तुलसीदासादि बहुत-से भक्तों को प्रत्यक्ष दर्शन होने का इतिहास मिलता है; बल्कि विष्णुपुराणादि में तो सत्ययुग की अपेक्षा कलियुग में भगवत-दर्शन होना बड़ा ही सुगम बताया है | श्रीमद्भागवत् में भी कहा—
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः |
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकिर्त्तानात् || (१२ | ३ | ५२)
     ‘सत्ययुग में निरंतर विष्णु का ध्यान करने से, त्रेता में यज्ञद्वारा यजन करने से और द्वापर में पूजा (उपासना) करने से जो परमगति की प्राप्ति होती है वही कलियुग में केवल नाम-कीर्तन से मिलती है |’

     जैसे अरणी की लकड़ियों को मथने से अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसी प्रकार सच्चे हृदय की प्रेमपूरित पुकार की रगड़ से अर्थात् उस भगवान् के प्रेममय नामोच्चारण की गम्भीर ध्वनि के प्रभावसे भगवान् भी प्रकट हो जाते हैं | महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगदर्शन में कहा है—
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोग: | (२ | ४४)
‘नामोच्चार से इष्टदेव परमेश्वर के साक्षात् दर्शन होते हैं |’

     जिस तरह सत्य-संकल्पवाला योगी जिस वस्तु के लिए संकल्प करता है वही वस्तु प्रत्यक्ष प्रकट हो जाती है, उसी तरह शुद्ध अन्तःकरणवाला भगवान् का सच्चा अनन्य प्रेमी भक्त जिस समय भगवान् के प्रेममें मग्न होकर भगवान् की जिस प्रेममयी मूर्ति के दर्शन करने की इच्छा करता है उस रूप में ही भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं | गीता अ० ११ श्लोक ५४ में भगवान् ने कहा है—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ||
     ‘हे श्रेष्ठ तपवाले अर्जुन ! अनन्य भक्ति करके तो इस प्रकार (चतुर्भुज) रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए और तत्त्वसे जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ |’

     एक प्रेमी मनुष्य को यदि अपने दूसरे प्रेमी से मिलने की उत्कट इच्छा हो जाती है और यह खबर यदि दूसरे प्रेमी को मालूम हो जाती है तो वह स्वयं बिना मिले नहीं रह सकता, फिर भला यह कैसे संभव है कि जिसके समान प्रेम के रहस्य को कोई भी नहीं जानता वह प्रेममूर्ति परमेश्वर अपने प्रेमी भक्त से बिना मिले रह सके ?

     अतएव सिद्ध होता है कि वह प्रेममूर्ति परमेश्वर सब काल तथा सब देश में सब मनुष्यों को भक्तिवश होकर अवश्य ही प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं |

   (२) भगवान् के मिलने के बहुत-से उपायों में से सर्वोत्तम उपाय है ‘सच्चा प्रेम’ | उसी को शास्त्रकारों ने अव्यभिचारिणी भक्ति, भगवान् में अनुरक्ति, प्रेमा भक्ति और विशुद्ध भक्ति आदि नामों से कहा है |

     जब सत्संग, भजन, चिन्तन, निर्मलता, वैराग्य, उपरति, उत्कट इच्छा और परमेश्वरविषयक व्याकुलता क्रम से होती है तब भगवान् में सच्चा विशुद्ध प्रेम होता है |

    शोक तो इस बात का है कि बहुत-से भाइयों को तो भगवान् के अस्तित्व में विश्वास नहीं है | कितने भाइयों को यदि विश्वास है भी, तो वे क्षणभंगुर नाशवान् विषयों के मिथ्या सुख में लिप्त रहने के कारण उस प्राणप्यारे के मिलने के प्रभाव को और महत्त्व को ही नहीं जानते | यदि कोई कुछ सुन-सुनाकर तथा कुछ विश्वास करके उसके प्रभाव को कुछ जान भी लेते हैं तो अल्प चेष्टा से ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं या थोड़े–से साधनों में ही निराश-से हो जाया करते हैं | द्रव्य-उपार्जन के बराबर भी परिश्रम नहीं करते |

     बहुत-से भाई कहा करते हैं कि हमने बहुत चेष्टा की परन्तु प्राणप्यारे परमेश्वर के दर्शन नहीं हुए | उनसे यदि पूछा जाय कि क्या तुमने फाँसी के मामले से छूटने की तरह भी कभी संसार की जन्म-मरण-रूपी फाँसी से छुटने की चेष्टा की ? घृणास्पद, निन्दनीय स्त्री के प्रेम में वशीभूत होकर उसके मिलने की चेष्टा के समान भी कभी भगवान् से मिलने की चेष्टा की ? यदि नहीं, तो फिर यह कहना कि भगवान् नहीं मिलते, सर्वथा व्यर्थ है |

    जो मनुष्य शर-शय्यापर शयन करते हुए पितामह भीष्म के सदृश भगवान् के ध्यान में मस्त होते हैं, भगवान् भी उनके ध्यान में उसी तरह मग्न हो जाते हैं | गीता अ० ४ श्लोक ११ में भी भगवान् ने कहा है—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
     ‘हे अर्जुन ! जो मुझको जैसे भजते हैं मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ |’

     भगवान् के निरन्तर नामोच्चार के प्रभाव से जब क्षण-क्षण में रोमांच होने लगते हैं, तब उसके सम्पूर्ण पापों का नाश होकर उसको भगवान् के सिवा और कोई  वस्तु अच्छी नहीं लगती | विरह-वेदना से अत्यन्त व्याकुल होने के कारण नेत्रों से अश्रुधारा बहने लग जाती है तथा जब वह त्रैलोक्य के ऐश्वर्य को लात मारकर गोपियों की तरह पागल हुआ विचरता है और जल से बाहर निकाली हुई मछली के समान भगवान् के लिये तड़पने लगता है, उसी समय आनन्दकन्द प्यारे श्यामसुन्दर की मोहिनी मूर्ति का दर्शन होता है | यही है उस भगवान् से मिलने का सच्चा उपाय |

    यदि किसी को भी भगवान् के मिलने की सच्ची इच्छा हो तो उसे चाहिये कि वह रुक्मिणी, सीता और व्रजबालाओं की तरह सच्चे प्रेमपूरित हृदय से भगवान् से मिलने के लिए विलाप करे |

     (३) यद्यपि प्रकट में तो ऐसे पुरुष कलिकाल में नहीं दिखायी देते जिनको उपर्युक्त प्रकार से भगवान् के साक्षात् दर्शन हुए हों, तथापि सर्वथा न हों यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रह्लाद आदि की तरह हजारों में से कोई कारणविशेष से ही किसी एककी लोकप्रसिद्धि हो जाया करती है, नहीं तो ऐसे लोग इस बात को विख्यात करने के लिये अपना कोई प्रयोजन ही नहीं समझते |

    यदि यह कहा जाय कि संसार-हित के लिये सबको यह जताना उचित है, सो ठीक है, परन्तु ऐसे श्रद्धालु श्रोता भी मिलने कठिन हैं तथा बिना पात्र के विश्वास होना भी कठिन है | यदि बिना पात्र के कहना आरम्भ कर दिया जाय तो उसका कुछ भी मूल्य नहीं रहता और न कोई विश्वास ही करता है |

    अतः हमें विश्वास करना चाहिये कि ऐसे पुरुष संसार में अवश्य हैं, जिनको उपर्युक्त प्रकार से दर्शन हुए हैं | परन्तु उनके न मिलने में हमारी अश्रद्धा ही हेतु है और न विश्वास करने की अपेक्षा विश्वास करना ही सबके लिए लाभदायक है; क्योंकि भगवान् से सच्चा प्रेम होने में तथा दो मित्रों की तरह भगवान् की मनोमोहिनी मूर्ति के प्रत्यक्ष दर्शन मिलने में विश्वास ही मूल कारण है |
जय श्री कृष्ण

'तत्त्वचिन्तामणि' पुस्तक से, पुस्तक कोड- 683, विषय- भगवानके दर्शन प्रत्यक्ष हो सकते हैं, पृष्ठ-संख्या- ४६-४७, गीताप्रेस गोरखपुर

ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका 'सेठजी'

मैं कौन हूँ ? मेरा कर्त्तव्य क्या है ? भाग 2 - गोयन्दका जी सेठ जी

॥ओम नारायण ॥
मैं कौन हूँ और मेरा क्या कर्तव्य है ?
पोस्ट संख्या- (२)

            (पिछली पोस्टमें अपने आत्म-स्वरूपमें नाम, रूप तथा देहका निषेध बताया था। अब इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदिकी अपने सत्-स्वरूपमें स्थितिके बारेमें बता रहे हैं।)
           
           इसी तरह इन्द्रियाँ भी मैं नहीं हूँ। हाथ-पेरोंके कट जाने, आँखें नष्ट हो जाने और कानोंके बहरे हो जानेपर भी मैं ज्यों-का-त्यों पूर्ववत् रहता हूँ, मरता नहीं । यदि मैं इन्द्रिय होता तॊ उनके विनाशमें मेरा विनाश होना सम्भव है । अतएव थोडा-सा भी विचार करने पर यह प्रत्यक्ष प्रतीत होता है कि मैं जड़ इन्द्रिय नहीं हूँ, वरन् इन्द्रियोंका  द्रष्टा या ज्ञाता हूँ।
      इसी प्रकार मैं मन भी नहीं हूँ। सुषुप्तिकालमें मन नहीं रहता, परन्तु मैं रहता हूँ । इसीलिये जागनेके बाद मुझको इस बातका ज्ञान है कि मैं सुखसे सोया था । मैं मनका ज्ञाता हूँ। दूसरोंकी दृष्टिमें मी मनके अनुपस्थितिकाल में(सुषुप्ति या मूर्च्छित-अवस्थामें) मेरी जीवित अवस्था प्रसिद्ध है। मन विकारी है, इसमें भाँति-भाँतिके संकल्प-विकल्प होते रहते है । मनमें होनेवाले इन संकल्प-विकल्पोंका मैं ज्ञाता हूँ । खान, पान, स्नान आदि करते समय यदि मन दूसरी ओर चला जाता है, तो उन कामोंमें कुछ भूल हो जाती है; फिर सचेत होनेपर मैं कहता हूँ- मन दूसरी जगह चला गया था, इस कारण मुझसे भूल हो गयी; क्योंकि मनके बिना केवल शरीर और इन्द्रियोंसे सावधानीपूर्वक काम नहीं हो सकता । अतएव मन चञ्चल एवम चल है, परन्तु मैं स्थिर औरअचल हूँ । मन कहीं भी रहे, कुछ संकल्प-विकल्प करता रहे, मैं उसको जानता हूँ, अतएव मैँ मनका ज्ञाता हूँ, मन नहीं हूँ ।
        इसी तरह मैं बुद्धि भी नहीं हूँ, क्योकि बुद्धि भी क्षय और वृद्धि स्वभाववाली है । मैँ क्षय-वृद्धिसे सर्वथा रहित हूँ । बुद्धिमेँ मन्दता, तीव्रता, पवित्रता, मलिनता, स्थिरता, अस्थिरता आदि भी विकार होते है परंतु मैं इन सबसे रहित और इन सब स्थितियोंको जाननेवाला हूँ । मैं कहता हूँ-  उस समय मेरी बुद्धि ठीक नहीं थी, अब ठीक है । बुद्धि कब क्या विचार रही है, क्या निर्णय कर रही है और क्या निश्चय कर रही है, इसको मैं जानता हूँ । बुद्धि दृश्य है, मैं उसका दृष्टा हूँ । अतएव बुद्धिका मुझसे पृथकृत्व सिद्ध है; मैं बुद्धि नहीं हूँ।
         इस प्रकार मैं नाम, रूप, देह इन्द्रिय, मन, बुद्धि अादि  नहीं हूँ। मैं इन सबसे सर्वथा अतीत, इनसे सर्वथा पृथक, चेतन, द्रष्टा,  साक्षी, सबका ज्ञाता, सत्, नित्य, अविनाशी, अविकारी, अक्रिय, सनातन, अचल और समस्त सुख-दु:खोंसे रहित केवल शुद्ध आनन्दमय आत्मा हूँ , यही मैं हूँ । यही मेरा सच्चा स्वरूप है ।
॥ ओम नारायण ॥
क्रमश :--

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित 'ज्ञानयोगका तत्व'में परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका का लेख ।

कार्यकरणकर्त्तृत्त्वे , भोक्ता और कर्ता

'कार्यकरणकर्त्तृत्त्वे हेतु: प्रकृतिरुच्‍यते।
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्‍तृत्‍वे हेतुरुच्‍यते।।
पुरुष: प्रकृतस्‍थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्‍गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्‍य सदसद्योनिजन्‍मसु।।
उपद्रष्‍टानुमन्‍ता च भर्ता भोक्ता महेश्‍वर:।
परमात्‍मेति चाप्‍युक्तो देहेऽस्मिन्‍पुरुष: पर:।।'[1]

इस सृष्टि का संचालक एक चेतन है। वह सृष्टि में व्‍यापक रहता भी इससे परे है और इस शरीर में- अन्‍त:करण में ही वह अन्‍तर्यामी रूप से स्थित है। वह महेश्‍वर उपद्रष्‍टा है, अनुमन्‍ता है। वस्‍तुत: वही भर्ता और भोक्ता भी है। वह अन्‍तर्यामी अन्‍त:करण में होकर भी केवल उपद्रष्‍टा है। वह अन्‍त:करण का मुख्‍य द्रष्‍टा नहीं है और अन्‍त:रण में तादात्‍म्‍यापन्न होकर कर्त्ता भी नहीं बना है। कर्त्ता तो है प्रकृति। अन्‍त:करण और बहि:करण[2] दोनों प्रकृति के कार्य हैं। अत: इन्द्रियों से या मन से जो कुछ होता है, सब कार्य प्रकृति के गुणों से ही होता है।

'प्रकृते र्क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहंकार विमूढात्‍मा कर्ताहमिति मन्‍यते।।'[1]
वस्‍तुत: जीव किसी कर्म का कर्त्ता नहीं है; किन्‍तु अहंकार से मूर्छितप्राय होकर प्रकृति के गुणों से हुए कार्यों को वह अपने में आरोपित करके अपने को कर्त्ता मान लेता है। यह मान लेने के कारण ही कर्म के शुभाशुभ फल का वह भोक्ता बन जाता है।

जो महेश्‍वर है, प्रकृति का संचालक है, वही वास्‍तविक भोक्ता है। लेकिन वह इस शरीराभिमानी जीव का भर्ता है- इसका भरण-पोषण वही करता है, अत: जब अज्ञानी जीव अपने को कर्त्ता मान लेता है, तब वह इसकी मान्‍यता का अनुमोदन कर देता है। वह अनुमन्‍ता बना रहता है। सत्यजीत तृषित ।