Monday, 10 June 2019

अभिमान कैसे छूटे ?

अभिमान कैसे छूटे ?
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अभिमान के विषय में रामचरित मानस में आया है-

संसृत मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोक दायक अभिमाना ।।[ मानस 7। 74। 3]

जितनी भी आसुरी-सम्पत्ति है, दुर्गुण-दुराचार हैं, वे सब अभिमान की छाया में रहते हैं।
मैं हूँ- इस प्रकार जो अपना होनापन (अहंभाव) है, वह उतना दोषी नहीं है, जितना अभिमान दोषी है। भगवान का अंश भी निर्दोष है। परन्तु मेरे में गुण हैं, मेरे में योग्यता है, मेरे में विद्या है, मैं बड़ा चतुर हूँ, मैं वक्ता हूँ, मैं दूसरों को समझा सकता हूँ- इस प्रकार दूसरों की अपेक्षा अपने में जो विशेषता दीखती है, यह बहुत दोषी है।

अपने में विशेषता चाहे भजन-ध्यान से दीखे, चाहे कीर्तन से दीखे, चाहे जप से दीखे, चाहे चतुराई से दीखे, चाहे उपकार (परहित) करने से दीखे, किसी भी तरह से दूसरों की अपेक्षा विशेषता दीखती है तो यह अभिमान है। यह अभिमान बहुत घातक है और इससे बचना भी बहुत कठिन है।

अभिमान जाति को लेकर भी होता है, वर्ण को लेकर भी होता है, आश्रम को लेकर भी होता है, विद्या को लेकर भी होता है, बुद्धि को लेकर भी होता है। कई तरह का अभिमान होता है।
मेरे को गीता याद है, मैं गीता पढ़ा सकता हूँ, मैं गीता के भाव विशेषता से समझता हूँ- यह भी अभिमान है। अभिमान बड़ा पतन करने वाला है।
जो श्रेष्ठता है, उत्तमता है, विशेषता है, उसको अपना मान लेने से ही अभिमान आता है।
यह अभिमान अपने उद्योग से दूर नहीं होता, प्रत्युत भगवान् की कृपा से ही दूर होता है।
अभिमान को दूर करने का ज्यों-ज्यों उद्योग करते हैं, त्यों-त्यों अभिमान दृढ़ होता है।
अभिमान को मिटाने का कोई उपाय करें तो वह उपाय ही अभिमान बढ़ाने वाला हो जाता है।

इसलिये अभिमान से छूटना बड़ा कठिन है!

साधक को इस विषय में बहुत सावधान रहना चाहिये।साधक को इस बात का खयाल रखना चाहिये कि अपने में जो कुछ विशेषता आयी है, वह खुद कि नहीं है, प्रत्युत भगवान् से आयी है। इसलिये उस विशेषता को भगवान् की ही समझे, अपनी बिलकुल न समझे। अपने में जो कुछ विशेषता दीखती है, वह प्रभु की दी हुई है- ऐसा दृढ़तापूर्व मानने से ही अभिमान दूर हो सकता है।

मैं जैसा कीर्तन करता हूँ, वैसा दूसरा नहीं कर सकता; दूसरे इतने हैं, पर मेरे जैसा करने वाला कोई नहीं है- इस प्रकार जहाँ दूसरे को अपने सामने रखा कि अभिमान आया!

साधक को ऐसा मानना चाहिये कि मैं करने वाला नहीं हूँ, प्रत्युत यह तो भगवान् की कृपा से हो रहा है...........

तेरी कृपा से सब काम हो रहा है  ।
करते हो तुम कन्हैया बस मेरा नाम हो रहा है ।।

जो विशेषता आयी है, वह मेरी व्यक्तिगत नहीं है। अगर व्यक्तिगत होती तो सदा रहती, उस पर मेरा अधिकार चलता। ऐसा मानने से ही अभिमान से छुटकारा हो सकता है।

भगवान् की कृपा है कि वे किसी का अभिमान रहने नहीं देते। इसलिये अभिमान आते ही उसमें टक्कर लगती है। भगवान विशेष कृपा करके चेताते हैं कि तू कुछ भी अपना मत मान, तेरा सब काम मैं करूँगा। भगवान् अभिमान को तोड़ देते हैं, उसको ठहरने नहीं देते- यह उनकी बड़ी अलौकिक, विचित्र कृपा है।

जिसमें अभिमान रह जाता है, वह राक्षस हो जाता है। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, दन्तवक्त्र, शिशुपाल  आदि सब में अभिमान था।

अभिमान के कारण वे किसी को नहीं गिनते। भगवान को भी नहीं गिनते! उनके अभिमान को दूर करने के लिये भगवान अवतार लेते हैं और कृपा करके उनका नाश करते हैं।
वास्तव में भगवान मनुष्य को नहीं मारते हैं, प्रत्युत उसके अभिमान को मारते हैं।

जैसे फोड़ा हो जाता है तो वैद्य लोग पहले उसको पकाते हैं, फिर चीरा लगाते हैं। ऐसे ही भगवान् पहले अभिमान को बढ़ाते हैं, फिर उसका नाश करते हैं। इस विषय में वे किसी का कायदा नहीं रखते।भगवान का स्वभाव बड़ा विचित्र है। दूसरे मनुष्य तो हमारा कुछ भी उपकार करते हैं तो एहसान जनाते हैं कि तेरे को मैंने ऊँचा बनाया!

पर भगवान् सब कुछ देकर भी कहते हैं-

‘मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि’!

भगवान यह नहीं कहते कि मैंने तेरे को ऊँचा बनाया है, प्रत्युत खुद उसके दास बन जाते हैं।

इतना ही नहीं, भगवान उसको पता ही नहीं चलने देते कि मैंने तेरे को दिया है। मनुष्य के पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जो कुछ है, वह सब भगवान् का ही दिया हुआ है। वे इतना छिपकर देते हैं कि मनुष्य इन वस्तुओं को अपना ही मान लेता है कि मेरा ही मन है, मेरी ही बुद्धि है, मेरी ही योग्यता है, मेरी ही सामर्थ्य है, मेरी ही समझ है।

यह तो देने वाले की विलक्षणता है कि मिली हुई चीज अपनी ही मालूम देती है।

अगर आँखें अपनी हैं तो फिर चश्मा क्यों लगाते हो?

आँखों में कमजोरी आ गयी तो उसको ठीक कर लो। शरीर अपना है तो उसको बीमार मत होने दो, मरने मत दो।

देने वाले कि इतनी विचित्रता है कि वे यह जनाते ही नहीं कि मेरा दिया हुआ है। इसलिये मनुष्य मान लेता है कि मैं समझदार हूँ, मैं वक्ता हूँ, मैं पण्डित हूँ, मैं लेखक हूँ आदि। वह अभिमान कर लेता है कि मैं इतना जप करता हूँ, इतना भजन करता हूँ, इतना ध्यान करता हूँ, इतना पाठ करता हूँ आदि।

विचार करना चाहिये कि यह किस शक्ति से कर रहा हूँ?

यह शक्ति कहाँ से आयी है?

अर्जुन वही थे, गाण्डीव धनुष और बाण भी वही थे, पर डाकू लोग गोपियों को ले गये, अर्जुन कुछ नहीं कर सके-

‘भीलहिं  लूटी गोपिका, वे अर्जुन वे बाण’।

अर्जुन ने महाभारत-युद्ध में विजय कर ली तो यह उनका बल नहीं था, प्रत्युत जो उनके सारथि बने थे, उन भगवान श्रीकृष्ण का बल था।

गीता में भगवान् ने कहा भी है-

‘"मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’"[ गीता 11। 33]

‘ये सभी मेरे द्वारा पहले से मारे हुए हैं।

हे सव्यसाचिन्! तुम निमित्तमात्र बन जाओ।’

सन्तों की वाणी में एक बड़ी विचित्र बात आयी है कि भगवान ने संसार को मनुष्य के लिये बनाया और मनुष्य को अपने लिये बनाया।

तात्पर्य है कि मनुष्य मेरी भक्ति करेगा तो संसार की सब वस्तुएँ उसको दूँगा! उसको किसी बात की कमी रहेगी ही नहीं! सदा के लिये कमी मिट जायगी! पर वह भक्ति न करके अभिमान करने लग गया।

अभिमान भगवान को सुहाता नहीं-----

ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च ।
               [नारद भक्ति० 27]
"ईश्वर का भी अभिमान से द्वेषभाव है और दैन्य से   प्रियभाव है।’

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ।
जन अभिमान न राखहिं काऊ ।।
संसृत मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोक दायक अभिमाना ।।
ताते करहिं कृपानिधि दूरी।
सेवक पर ममता अति भूरी ।।[ मानस, उत्तर० 74। 3-4]

भगवान् अभिमान को दूर करते हैं, पर मनुष्य फिर अभिमान कर लेता है! अभिमान करते-करते उम्र बीत जाती है!

इसलिये हरदम ‘हे नाथ! हे मेरे नाथ!’ पुकारते रहो और भीतर से इस बात का खयाल रखो कि जो कुछ विशेषता आयी है, भगवान से आयी है।

यह अपने घर की नहीं है। ऐसा नहीं मानोगे तो बड़ी दुर्दशा होगी!यह मानव जन्म भगवान का ही दिया हुआ है।
भगवान् ने मनुष्य को तीन शक्तियाँ दी हैं- ----
करने की शक्ति,
जानने की शक्ति और
मानने की शक्ति।

करने की शक्ति दूसरों का हित करने के लिये दी है,

जानने की शक्ति अपने-आपको जानने के लिये दी है

और मानने की शक्ति भगवान् को मानने के लिये दी है।

परन्तु गलती तब होती है, जब मनुष्य इन तीनों शक्तियों को अपने लिये लगा देता है।

इसीलिये वह दुःख पा रहा है। बल, बुद्धि, योग्यता आदि अपने दीखते ही अभिमान आता है।

मैं ब्राह्मण हूँ- ऐसा मानने पर ब्राह्मणपने का अभिमान आ जाता है।
मैं धनवान् हूँ- ऐसा मानने पर धन का अभिमान आ जाता है।
मैं विद्वान् हूँ- ऐसा मानने पर विद्या का अभिमान आ जाता है।
जहाँ मैं पन का आरोप किया, वहीं अभिमान आ जाता है।

इसलिये भीतर से हरदम भगवान को पुकारते रहो। अपने में योग्यता प्रत्यक्ष दीखती हैं, इसलिये अभिमान से बचना बहुत कठिन होता है।

मनुष्य को प्रत्यक्ष दीखता है कि मैं अधिक पढ़ा-लिखा हूँ, मैं गीता जानने वाला हूँ, मैं कीर्तन करने वाला हूँ, इसलिये वह फँस जाता है।

अगर यह दीखने लग जाय कि यह सब केवल भगवान् की कृपा से ही हो रहा है तो निहाल हो जाय! जिनको चेत न हो, उन पर दया आनी चाहिये। वे भी चेतेंगे, पर देरी से!

नारद जी महाराज भगवान् के भक्त थे, पर उनको भी अभिमान हो गया। इतना अभिमान हो गया कि भगवान् को ही शाप दे दिया-----

भले भवन अब बायन दीन्हा।
पावहुगे फल आपन कीन्हा ।।
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।
सोइ तनु धरहु श्राप सम एहा ।।
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी।
करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी ।।
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी।
नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी ।।
[मानस, बाल० 137। 3-4]

नारद जी ने कहा कि बन्दर आपकी सहायता करेंगे- ‘करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी’ तो यह शाप हुआ कि वरदान?

यह तो वरदान हुआ! इसलिये कहा है- ---

‘साधु ते होइ न कारज हानी’। [मानस, सुन्दर० 6। 2]

शाप के कारण भगवान का अवतार हुआ और विविध लीलाएँ हुईं, जिनको गा-गाकर लोगों का कल्याण हो रहा है।

तात्पर्य है कि नारद जी का शाप लोगों के कल्याण का उपाय हो गया! ऐसे ही भगवान का भी क्रोध वरदान के समान कल्याणकारी होता है-

‘क्रोधोअपि देवस्य वरेण तुल्यः’।

भगवान् और उनके भक्त- दोनों ही बिना हेतु सबका हित करने वाले हैं- ----

हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ।।[मानस, उत्तर० 47। 3]

इन दोनों के साथ किसी भी तरह से सम्बन्ध हो जाय तो लाभ-ही-लाभ होता है। ये सब पर कृपा करते हैं। लोग कहते हैं कि भगवान ने दुःख भेद दिया! पर भगवान् के खजाने में दुःख है ही नहीं, फिर वे कहाँ से दुःख लाकर आपको देंगे?

भगवान् और सन्त कृपा-ही-कृपा करते हैं, इसलिये इनका संग छोड़ना नहीं चाहिये।

मनुष्य जन्म में किये गये पाप चौरासी लाख योनियाँ भोगने पर भी सर्वथा नष्ट नहीं होते, बाकी रह जाते हैं।
फिर भी भगवान् कृपा करके मनुष्य शरीर दे देते हैं, अपने उद्धार का मौका दे देते हैं। परन्तु मनुष्य मिले हुए को अपना मान लेता है। मिलने और बिछुड़ने वाली वस्तु को अपना मानने से वह वस्तु अशुद्ध हो जाती है।

इसलिये शुद्ध करने से अन्तःकरण शुद्ध नहीं होता, प्रत्युत अपना न मानने से शुद्ध होता है।

अतः सब कुछ भगवान् के अर्पण कर दो----

तन मन धन सब कुछ है तेरा स्वामी
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा  .......

मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि को भगवान् का मान लो तो सब शुद्ध निर्मल हो जायँगे।

जहाँ अपना माना, वहीं अशुद्ध हो जायँगे और अभिमान आ जायगा।

हम लोग विचार ही नहीं करते कि भगवान की हम पर कितनी विलक्षण कृपा है! हम क्या थे, क्या हो गये!

भगवान् ने कृपा करके क्या बना दिया-इस तरफ देखते ही नहीं, सोचते ही नहीं, समझते ही नहीं।

अपने-अपने जीवन को देखें तो मालूम होता है कि हम कैसे थे और भगवान् ने कैसा बना दिया!

गोस्वामी जी ने कहा है----

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ।।
[मानस, बाल० 26]

हौं तो सदा खर को असवार, तिहरोइ नामु गयंद चढ़ायो ।।[कविताव्ली, उत्तर० 60]

मैं कितना अयोग्य था, पर आपकी कृपा ने कितना योग्य बना दिया! इसलिये भगवान् की कृपा की ओर देखो।

हम जो कुछ बने हैं, अपनी बुद्धि, बल, विद्या, योग्यता, सामर्थ्य से नहीं बने हैं। जहाँ मन में अपनी बुद्धि, बल आदि से बनने की बात आयी, वहीं अभिमान आता है कि हमने ऐसा किया, हमने वैसा किया।

इस अभिमान से बचने के लिये भगवान को पुकारो। अपने बल से नहीं बच सकते, प्रत्युत भगवान् की कृपा से ही बच सकते हैं।
भगवान् की स्मृति समस्त विपत्तियों का नाश करने वाली है- ------
‘हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्’।[श्रीमद्भा० 8। 10। 55]

इसलिये भगवान को याद करो, भगवान् का नाम लो, भगवान् के चरणों की शरण लो। उनके सिवाय और कोई रक्षा करने वाला नहीं है।

भगवान् के बिना संसार मात्र अनाथ है। भगवान के कारण से ही संसार सनाथ है।

चलती चक्की में आकर सब दाने पिस जाते हैं, पर जिस कील के आधार पर चक्की चलती है, उस कील के पास जो दाने चले जाते हैं, वे पिसने से बच जाते हैं- -----

"‘कोई हरिजन ऊबरे कील माकड़ी पास’"।

इसलिये प्रभु के चरणों की शरण लो और प्रभु को पुकारो, इसके सिवाय अभिमान से बचने का कोई उपाय नहीं है।

राम- वन्दना

राम- वन्दना
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पूरन पुरान अरू पुरूष पुरान परि पूरन
बतावैं न बतावै और उकित को।
दरउन देत झिन्हें दरसन समुझैं न
नेति-नेति कहै बेद छाडि भेद-जुकित को।
जानि यह केसोदास अनुदिन राम-राम
रटत रहत न डरत पुनरूकित को
रूप देहि अनिमाहि गुन देहि गरिमाहि
नाम देहि महिमाहि भक्ति देहि मुक्तित को।

अर्थ:- राम के अमित गुणों का वर्णन करते हुए केशवदास कहते है कि अठारहों पुराण और प्राचीन ऋषि- महर्षि आदि राम को सब प्रकार से परिपूर्ण बताते है। इसके अतिरिक्त वे राम के विषय में अन्य कोर्इ बात नही कहते।
भाव यह है कि राम की परिपूर्णता शास्त्रोक्त और लोकोक्त है। जिस राम के स्वरूप को दर्शनशास्त्र भी नहीं समझ पाते और वेद भी भेद-युक्ति को छोडकर जिनके स्वरूप के विषय में यह भी नही यह भी नही कहकर अपनी असमर्थता व्यक्त कर देते है।
राम की अपार महिमा और भक्तवत्सलता को जानकर मै (केशव) पुनरूक्ति-दोष का भय त्यागकर नित्य राम-राम रटता रहता हू।
राम का सौन्दर्य- वर्णन अणिमा सिद्वि को राम का गुण- वर्णन गरिमा सिद्वि को राम का नाम-स्मरण महिमा सिद्वि को और राम की भक्ति मुक्ति को प्रदान करने वाली है।

प्रेम का अधिकारी - वियोगी हरि

*प्रेम का अधिकारी*

*प्रेम योग -वियोगी हरि*

प्रेम का असली अधिकारी करोड़ों में कहीं एक मिलता है। दर्द का मर्म किसी कस कीले दिलवाले के ही आगे खोला जाता है। जो स्वयं ही प्रेमी नहीं, वह प्रेम का भेद कैसे समझ सकेगा? कबीर साहब इस बेदर्दी दुनिया के रंग ढंग से ऊबकर अपने मन से कहते हैं कि अपनी राम कहानी किसे जाकर सुनायें, अपना रोना किसके आगे रोया जाय? दर्द तो कोई जानेगा नहीं, उलटे सब हँसेंगे-

कह कबीर, दुख कासों कहिए, कोई दरद न जानै।।
इससे अपनी मीठी मनोव्यथा मन में ही छिपा रखनी चाहिए। अनाधिकारियों के आगे अपना दुख रोने से लाभ ही क्या? व्यथा को बाँट लेने वाला तो कोई है नहीं, सुनकर लोग उलटे अठलायँगे। रहीम का यह सरस सोरठा किस सहृदय की आँखों से दो बूँद आँसू न गिरा देगा-

मन ही रहिए गोय, ‘रहिमन’ या मन की व्यथा।
बाँटि न लैहै कोय, सुनि अठिलैंहैं लोग सब।।

कहो, किसे प्रेम का अधिकारी समझें! किसे अपनी प्रेम गाथा सुनायें। क्या कहा कि किसी पंडित या ज्ञानी को अपनी व्यथा कथा क्यों नहीं सुना देते, क्या  ज्ञानी भी तुम्हारी प्रेम वेदना सुनने का अधिकारी नहीं है? नहीं, वह प्रेम प्रीत का अधिकारी नहीं है। वह विद्याभिमानी ज्ञानी प्रेम कथा को क्या समझेगा-
अँधे आगे नाचते, कला अकारथ जाय।
शास्त्रों के मनोमुग्धकारी मार्ग में वह नेत्रवान् हुआ करे, परंतु प्रेमपंथ में तो नेत्र विहीन ही है। अँधे के आगे नाचने से कोई लाभ तो फिर किसी नियम निरत योगी को ढूँढ़ लाओ। तुम्हें तो किसी श्रोता से ही प्रयोजन है न? वह जरूर तुम्हारे दिल की बात समझ लेगा। और तुम्हारी अंतर्व्यथा पर सहानुभूति भी प्रकट कर देगा। प्रेम का तो उसे अवश्य अधिकारी होना चाहिए। नहीं, भाई! नेमी और प्रेमी में पृथिवी आकाश का अंतर है। वह प्रेम का अधिकारी कदापि नहीं हो सकता। इससे-

कोऊ कहूँ भूलि जिन कहियो नेमीसों यह ज्ञानी।
कैसे मिदै तासु उर अंतर ज्यों पाथर में पानी।।- बख्शी हंसराज

नियम बेचारा तो यम नियम की ही बातें सुनना चाहेगा। प्रेमव्यथा की यह अकथनीय कथा तो आदि से अंत तक नियम नियंत्रण से परे है। बेचारा सुनते सुनते थक जायेगा। उसका मन ही न लगेगा। बड़ी लंबी चौड़ी कहानी है। दूसरे, इसका कहना भी महान् कठिन है। यह तो अंतस्तल की कथा है, जिगर की कहानी है। जिसे पढ़ना हो, कलेजा चीरकर पढ़ ले। पर ऐसा प्रेमाधिकारी तो उस प्रेम प्यारे को छोड़ दूसरा कोई नजर आता नहीं-

मेरी ये प्रेम व्यथा लिखिबेको गनेस मिलैं तो उन्हीतें लिखावौ।
व्यास के शिष्य कहाँ मिलै मोहिं, जिन्हें अपनी बिरतान्त सुनावौं।।
राम मिलैं तौ प्रनाम करौं, कवि ‘तोष’ बियोगकथा सरसावौं।
पै इक साँवरे मीत बिना यह काहि करेजो निकारि दिखावौ।।

यों तो इस जगत् में ‘प्रेमी’ उपाधि धारी सैकड़ों सहस्रों महापुरुष मिलेंगे, पर उनमें भुक्त भोगी प्रेमाधिकारी तो कदाचित् ही कहीं कोई एकाध देख पड़े। तालाब में मछली भी रहती है और मेढक भी रहता है। दोनों ही जलचरर है, जल के जीव हैं। पर नीर के प्रेम की अधिकारिणी एक मछली ही है। अब कहो जल वियोग की व्यथा सुनने या समझने का सच्चा अधिकार मेढक को है या मीन को?
जिन नहिं समुझय्यौ प्रेम यह, तिनसों कौन अलाप?

दादुर हू जल में रहै, जानै मीन मिलाप।।- ध्रुवदास
इस मतलबी दुनिया में मेढक जैसे नामधारी प्रेमी तो पग पग पर मिल जाएंगे, पर मीन की जाति का प्रेमाधिकारी शायद ही कहीं कोई मिले। बख्शी हंसराज ने ‘सनेह सागर’ में क्या अच्छा कहा है-

चाहनहारे सुख संपत्ति के जग में मिलत धनेरे।
कोऊ एक मिलत कहुँ प्रेमी, नगर बगर सब हेरे।।

परम प्रेमी आनन्दघन ने अपनी करुणा कलापिनी कविता के अधिकारी की जो व्याख्या की है, प्रायः वही प्रेमाधिकारी की भी परिभाषा है। जिसके हृदय और नेत्रों में एक प्रेम की पीर, लगन की एक मीठी सी कसक या हूक उठा करती है, वही अनुरागी आनन्द घन की कविता या किसी प्रेमी की प्रेम कहानी सुनने और समझने का सच्चा अधिकारी है-

प्रेम सदा अति ऊँचो लहै, सुकहै इहि भाँति की बात छकी।
सुनिकै सबके मन लालच दौरै, पै बोरे लखैं सब बुद्धि चकी।।
जग की कविताई के धोखें रहैं, ह्याँ प्रवीननि की मति जाति जकी।
समुझै कविता ‘घन आनंद की’ हिय आँखिन नेह की पीर तकी।।

इस अधिकार का पाना कितना कठिन है, कैसा दुर्लभ है, इसे कौन कह सकता है। प्रेमी होना चाहे कुछ आसान भी हो, पर प्रेम का अधिकारी होना तो एकदम मुश्किल है। बड़ी टेढ़ी खीर है। सिंहिनी का दूध दुह लेना चाहे कुछ सुगम भी हो, पर प्रेम का अधिकार प्राप्त कर लेना तो महान् कठिन है।
हमारी मनोव्यथा सुनने समझने का अधिकारी तो वही हो सकता है, जिसे अपना शरीर दे दिया है, मन सौंप दिया है और जिसके हृदय को अपना निवास स्थान बना लिया है अथवा जिसे अपने दिल में बसा लिया है। उससे अपना क्या भेद छिपा रह सकता है। ऐसे प्रेमी को अपने रामकहानी सुनाते सचमुच बड़ा आनन्द आता है, क्योंकि वही उसके सुनने समझने का सच्चा अधिकारी है। रहीम ने कहा है-

जेहि ‘रहीम’ तन मन दियौ, कियौ हिये बिच भौन।
तासों सुख दुख कहन की रही बात अब कौन?

ज्ञानी अथवा सिद्ध प्रेमाधिकारी नहीं हो सकता, किन्तु प्रेमाधिकारी निस्संदेह ज्ञानी और सिद्ध की अवस्था को अनायास पहुँच जाता है। जो प्रेम की कहानी सुन और समझ सकता है, वही तो ज्ञानी और सिद्ध है-

कहै प्रेम कैबरनि कहानी। जो बूझै सो सिद्ध गियानी।।  - जायसी

*वियोगी हरि*

लेखक एक दिव्य रसिक हुये है । उनका नाम ना हटावें । श्रीहरि को अपने प्रेमियों के नाम स्मरण से आह्लाद होता है ।

Thursday, 11 April 2019

शरणागति _ करपात्री जी

शरणागति करपात्री जी

*शरणागति*

‘मामेकं शरणं ब्रज’= मामेकमद्वितीयं शरणमाश्रयं व्रज निश्चिनु, यथा घटाकाशस्याश्रयो महाकाशः तरंगस्याश्रयो महासमुद्रः।

सब धर्मां का परित्याग करके मूल एक अद्वितीय अखण्ड परमात्मा की शरण ग्रहण करो। शरण क्या है? ‘शरणं गृहरक्षित्रौः’ शरण का अर्थ है आश्रय और रक्षिता। ‘मामेकं अद्वितीयं परमात्मानं शरणं= आश्रयं, ब्रज=अवगच्छ। ‘ब्रज गतौ’ मुझ एक अनन्त अखण्ड परात्पर परमात्मा को ही अपना आश्रय जानो, जैसे तरंग अपना आश्रय महासमुद्र को जाने, जैसे घटाकाश अपना आश्रय महाकाव्य को जाने, जैसे उत्पल की नीलिमा अपना आश्रय उत्पल को जाने, जैसे कटक, मुकुट, कुण्डल अपना आश्रय अखण्ड सुवर्ण को जानें। इस प्रकार से ‘मां एकं अद्वितीयं परमात्मानं शरणमाश्रयं व्रज अवगच्छ निश्चिनु’ यही कल्याण का रास्ता है। ‘भगवान ही हमारे आश्रय हैं, तरंग का आश्रय महासमुद्र जैसे है।’ यह निश्चय करना चाहिये। जीवात्मा के आश्रय-अनन्त ब्रह्माण्डधिष्ठान स्वप्रकाश परात्पर परब्रह्म हैं। अथवा ‘शरणं’ माने ‘रक्षितारं’ है। ‘मां एकं परमात्मानं रक्षितारं निश्चिनु’ = मुझ एक अखण्ड परमात्मा को ही अपना रक्षिता जानो। भगवान ही रक्षिता हैं। एक बात है- ‘स एनमविदितो न भुनिक्ति’ वेद कहता है- ‘देवता का जब तक साक्षात्कार नहीं होता, तब तक देव पालक नहीं होता, रक्षा नहीं करता।’ एतदर्थ देव का साक्षात्कार होना चाहिये। इसलिये ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः विद्यतेअयनाय इसलिये भगवत्स्वरूप का साक्षात्कार करना चाहिये और उन्हीं को अपना रक्षिता समझना चाहिये। भगवान रामचन्द्र राघवेन्द्र ने भी यही कहा कि-

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।

(जो एक बार भी शरण में आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षा की प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों से अभय कर देता हूँ। यह मेरा सदा के लिये व्रत है।)

सारे दृश्य प्रपंच से विरक्त होरक अर्थात भगवद्भिन्न सारे पदार्थों से विमुख निराश होकर एकमात्र सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् प्रभु को ही प्राप्त होना ‘प्रपत्ति’ है।

भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः।
परित्यकता मया लंका मित्राणि च धनानि च ।।

(हे श्रीरामभद्र! आप समस्त प्राणियों को शरण देने वाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है। अपने सभी मित्र, धन और लंकापुरी को छोड़कर आया हूँ।)
इसलिये सर्वपरित्यागपूर्वक भगबत्प्रपत्ति, भगवत्-शरणागति बड़ी ऊँची बात है। इससे तत्क्षण कल्याण होता है, देरी की कोई बात ही नहीं।

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।
सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बाँध बरि जोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिये मोरे। धस्उ देह नहि आन निहोरें।।

ऐसी भगवत्प्रपत्ति बहुत ऊँची है। अच्छा यह न बन सके तो, ‘तवास्मीति चयायते’ यह याच्णा करो कि हे प्रभो! हमें स्वीकार कर लीजिये।’ भक्तों ने कहा- ‘महाराज! आपने यह प्रतिज्ञा अकेले में नहीं की है, तीर्थ में की हैं। किस तीर्थ में? समुद्र में। सारे तीर्थ उसी में तो जाते हैं। गंगा भी वहीं जाय, यमुना भी वहीं जाय। तीर्थों का अधिष्ठान है समुद्र। उनके किनारे आपने प्रतिज्ञा की। अकेले नहीं थे आप, ऋषि थे, महर्षि थे, बन्दर भालु थे, इन सबके मध्य आपने प्रतिज्ञा की। इसलिये मुकर नहीं सकते महाराज! और महाराज श्रीरामचन्द्र मुकरें भी कैसे? तुलसीदास जी महाराज के राम तो कहते हैं-

शरणागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पाँवर पापमय तिन्हहिं विलोकत हानि।।

‘‘जो शरणागत को त्याग देता है अपना अनहित-अहित समझकर, वह नर पामर है, पापमय है, उसके दर्शन में पाप लगता है।’’ ऐसे प्रभु कभी मुकर सकते हैं? कभी नहीं। श्रीरामभद्र ने वाल्मीकि- रामायण में कपोत का दृष्टान्त दिया है। कपोत के शरण कोई व्याध आया। शरण माने घर। अर्थात जिस पेड़ पर कपोत रहता था, उस वृक्ष के नीचे कोई व्याध भी ऐसा था जिसने कपोत की कपोती को अपने जाल में फँसा रक्खा था। शत्रु-सरीखा व्याध उसके शरण आया। जाड़े में वह ठिठुर रहा था। कपोत ने अतिथि का सत्कार करना चाहा, उसके प्राणों को बचाना चाहा। कहीं से जलती हुई लकड़ी ले आया। इधर-उधर से लकड़ियों को बटोर कर उस पर रखा। अग्नि प्रज्वलित कर अतिथि को शीत से बचा लिया। फिर कपोत ने सोचा यह अवश्य ही भूखा है, स्वयं ही अग्नि में कूद पड़ा-‘लो भैया, इस अग्नि में मुझे भून करके भूख मिटालो’ श्रीराम ने यह दृष्टान्त दिया।
उन्होंने कहा- शरणागत का इतना महत्त्व है। पक्षियों ने भी शरणागत को महत्त्व दिया है। हम राघव-कुल में उत्पन्न हैं, फिर शरणागत की रक्षा क्यों न करें?

श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः।
अचितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैनिमन्त्रितः।।
स हि तं प्रतिजग्राह भार्याहर्तारमागतम्।
कपोतो वानर श्रेष्ठ! किं पुनर्मद्विधो जनः।।

भगवान रामचन्द्र ने सुग्रीव से कहा- यदि रावण ही आया हो तो भी लौटकर पूछने की जरूरत नहीं है, ले आना। विभीषण हो अथवा रावण- जो भी आया हो, ले आओ। सदोष हो तो भी भूषण है। सदोष शरणागत को ग्रहण करना यह तो भूषण है।

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम्।।

शरणागति एक बहुत ऊँची चीज है, परन्तु उसमें एक खतरा है। यह ब्रह्मास्त्र है, ब्रह्मास्त्र जिसके ऊपर प्रयुक्त हो गया, उसके ऊपर यदि दूसरा बन्धन डाल देंगे तो वह विफल हो जायगा। मेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मास्त्र डाला। ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए हनुमान जी उससे निबद्ध हो गये। मेघनाद जरा आराम करने लगा। युद्ध करते-करते थक गया था। इधर राक्षसों ने सोचा यह बन्धन तो बड़ा कमज़ोर है। बड़ी-बड़ी श्रृखलाओं को लाकर हनुमान को बाँध दिया। मेघनाद की आँखें खुलीं। उसने देखा- हनुमान को इन राक्षसों ने लोहमयी श्रृखंलाओं से बाँध रखा है। उसने सोचा- इन दुष्टों ने बड़ा काम खराब किया। ब्रह्मास्त्र तो दूसरा बन्धन सहन करता ही नहीं। ब्रह्मास्त्र का प्रभाव तो जाता रहा है। इस हनुमान के लिये श्रृखलायें भला क्या चीज है’। इसी तरह भगवत-शरणागति दूसरी शरणागति को सहन नहीं करती।

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा विश्वासा।।

वेदान्तदेशिकाचार्य जी कहते हैं-

दुरीश्वरद्वारबहिवितदिकादुरासिकायै रचितोअयमंजलिः।
यदंजनाभं निरपायमस्ति मे धनंजयस्यन्नदनभूषणं धनम्।।

अर्थात् दुरीश्वरों के द्वार की बहिर्वितर्दिका पर दुराशा को लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया, क्योंकि हमारे पास तो धनंजय के रथ का अति सुन्दर अंजनाथ श्रीकृष्ण ही अनपाय-धन हैं। फिर हमें और की क्या आवश्यकता है? किसी ने चातक से कहा है-

रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूतया
मम्भोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वेअपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचितद् वृथा
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः।।

अर्थात अरे हे मित्र! यह तू पीहू-पीहू करता है बादल को देखते ही। जानता है? आकाश में बहुत ढंग के बादल होते हैं, कोई अपनी वृष्टि से वसुधा को आर्द्र करते हैं, कोई केवल गर्जन-तर्जन करते हैं, एक बिन्दु डालते नहीं। बहुत से संसार में व्यक्ति हैं, जो आया उसी के सामने ‘त्राहि मां-त्राहि मां, यह पद्धति गलत है।

*शरण्य की शरणागति*

हाँ एक बात है, ऐसा नहीं कि शरणागति दूसरी नहीं करनी चाहिये। इष्ट शरणागति के अनुकूल जो शरणागति हो, वह स्वीकार करने योग्य है।
‘श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये’
श्रीराम की शरणागति ग्रहण करोगे तो उसमें पुष्टि के लिये रामदूत-हनुमान् की शरणागति भी आवश्यक होगी। इसी दृष्टि से शरण्य की शरणागति अपेक्षित है, हरेक की नहीं। श्रीराम भगवान भी शरण हुए समुद्र के ‘समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति’, परन्तु उनकी शरणागति कहाँ सफल हुई? विफल हो गयी।

*शरण्य का स्वरूप*

शरण्य में क्या होता है? सर्वोश्वरत्व, सर्वकारणत्व, सर्वशेषित्व और सुलभत्व। ये शरण्य के प्रयोजक है। कौन शरण्य हो सकता है? जो सर्वोश्वर हो, सर्वकारण हो, सर्वशेषी हो और सर्व सुलभ हो। विभीषण की सहरणागति सफल हुई, क्योंकि उसने शरण्य ठीक चुना। भगवान राम सर्वेश्वर, सर्वकारण, सर्वशेषी और सर्व सुलभ भी हैं, पर उनसे भी ज्यादा सुलभ श्री जी है। श्रीराम को अनन्त ब्रह्माण्ड के उत्पाद, पालन और संगरण के प्रपञ्च में संलग्न रहना पड़ता है और सब सर्ते उनमें भी ठीक हैं। सर्वेश्वरत्व भी उनमें है, सर्वंशेषित्व भी उनमें है, सर्वकारणत्व भी उनमें है।

*शरणागति एक बार या बार-बार?*

एक विचार और है, शरणागति बार-बार या एक बार? महानुभावों ने विचार किया है-

‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत्’

सर्व प्राप्ति के लिये ज्योतिष्टोम का अनुष्ठान बार-बार करने की आवश्यकता नहीं, एक बार ही पर्याप्त है। एक बार के अनुष्ठान से ही स्वर्ग प्राप्ति निश्चित हो गयी, क्योंकि आवृत्ति का विधान नहीं है। इसी प्रकार एक बार शरणागति हो गई तो काम हो गया। लेकिन एक बार ही वेदान्त श्रवण से काम नहीं चलेगा-

‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्।’

सूत्रार्थः- प्रत्यय की आवृत्ति करनी चाहिये, क्यों कि ‘श्रोतव्यो मन्त्व्यः’ आदि श्रुतियों में इस प्रकार का बार-बार उपदेश है। वेद में लिखा है- ‘व्रीहीनवहन्ति’ ‘धानों को कूटे’ कितने बार मूसल चलाये? एक बार मूसल चलाने पर भी अवघात हो गया, परन्तु नहीं-

यावत्तण्डुलनिष्पत्ति र्न स्यात्

‘यावत्पर्यन्त तण्डुलनिष्पत्ति न हो तावत्पर्यन्त अवघाव करे’ इसी प्रकार वेदान्त श्रवण की सीमा है अपरोक्ष साक्षात्कार। वह जब तक न हो तब तक ममन, निदिध्यासन करते चलो। लेकिन शरणागति के लिये ऐसी-कोई बात नहीं। एक बार भी शरणागति हो गई तो ठीक है। सर्वेश्वरत्व, सर्वकारणत्वत्व, सर्वशेषित्व, सुलभत्व और वात्सल्यपूर्ण मातृत्व की दृष्टि से श्री जी की शरणागतिः- शरण्य के सम्बन्ध में आचार्यों ने विचार किया है। श्रीमन्नारायण और श्री जी के स्वरूप पर आचार्यों में मतभेद है। वेदान्तदेशिक की और भिन्न-भिन्न आचार्यों का दृष्टियाँ हैं, उसके साथ यह भी एक दृष्टि है-

एकंज्योतिरभूद्रेधा राधामाधवरूपकम्

एक अनन्त-अखण्ड-निर्विकार ब्रह्मज्योति ही गौर-तेज और श्याम तेज के रूप में प्रकट हुयी। इस तरह श्रीराधा-माधव दोनों एक ही हैं। एक ही अनन्त-अखण्ड-निर्विकार ब्रह्मज्योति श्रीमन्नारायण परात्पर परब्रह्म विष्णु और ऐश्वर्य-माधुर्य की अधिष्ठात्री भगवती महालक्ष्मी के रूप में, श्रीसीता और श्रीराम के रूप में प्रकट हुई है। ऐसा होने पर भी श्री जी में सुलभता अधिक है। सर्वेपूरकत्व, सर्वशक्तिमत्व उनमें है। सर्वकारणत्व, सर्वशोषित्व उनमें है। सुलभत्व तो उनसे ज्यादा और किसी में है ही नहीं। महाराज श्रीकरपात्री जी ।
(एक प्रमाद यहाँ तृषित निवेदन कर रहा है कि श्रीजी की शरणागति बनी या नहीं अथवा श्रीजी की शरणागति के फल का अनुभव कैसा होगा ??? श्रीजी शरणागति के फलस्वरूप ही श्रीजी की दासी (किंकरी-मंजरी) के प्रति शरणागति प्रकट होगी । श्रीजी किंकरी का जीवन में प्रवेश का अर्थ श्रीजी को विशेष ख्याल है सो निज परिकरि जीवन मे आई है वरण श्रीजी की किंकरी-मंजरी का चिन्तन ही स्फुरित नही होता है । जीवन श्रीजी की कृपा स्वरूप उनकी निज सखियों का सँग श्रीजी का ही प्रकट प्रेम है । तृषित । जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।