Wednesday, 5 October 2016

मानव का लक्ष्य - भाग - 2 कृपालु जी महाराज जी

🌿🌷 - मानव का लक्ष्य - 🌷🌿
                भाग - 2⃣
"नर  तनु  गुरु  सँग  गोविन्द  राधे।
प्रेम पिपासा तीनों, लक्ष्य दिला दे।"

प्यास की बहुत सारी लिमिट(limit) होती है | किसी चीज़ के पाने की लिमिट बहुत क्लास(class) की होती है |
साधारण क्लास की भी होती है - 'मिल जाये तो अच्छा है |' थोड़ा प्रयत्न किया - 'अरे हटाओ नहीं मिलेगी |' और 'नहीं इसको पाना है', और लग गए उसके पीछे | तो ऐसे ही प्रेम पाने की प्यास भी अलग-अलग मात्रा की सब की होती है | वो वैराग्य पर डिपैंड(depend) करता है | संसार से हमें कितनी लिमिट में वैराग्य हुआ ? यानि ये ज्ञान कितना पक्का हुआ ये हमारा नहीं है - ये माँ, ये बाप, ये बेटा, ये स्त्री, ये पति, ये धन, ये संसार - आत्मा के लिए नहीं है | है ही नहीं | उससे मतलब ही नहीं है एक प्वाइंट(point) भी |
हम तो दिव्य आत्मा हैं भगवान् के अंश हैं | और ये संसार तो माया का है, मैटीरियल(material) है | ये शरीर के लिए भगवान् ने बनाया है | हमारे लिए नहीं बनाया | ये बात हर समय, हर जगह सेंट-परसेंट(cent percent) बैठी रहे | अब प्रेम की पिपासा सही हो जाएगी, अब सही वैराग्य हो जायेगा | इसको पक्का करने के लिए बार-बार अभ्यास करना होगा |

लेकिन जिस दिन ये पक्का हो जायेगा - ये हमारा नहीं | आज वो गया ? हाँ | क्यों जी जब वो मरा होगा, शरीर छोड़ के जा रहा होगा, तो सोचता होगा - ये माँ भी छूटेगी ? बाप भी ? बेटा-बेटी भी ? ये हमारी बनाई हुई बिल्डिंग(building) ? ये सब छूटा जा रहा है ? मैं अकेला जा रहा हूँ ? अरे ये सब हमारे ? कैसा लगता होगा उसको ? अरे ! वो समय भी आयेगा आप लोगों का भी | तो उस समय आप लोगों को कैसा लगेगा | सोचो ! अकेले में कि जब अकेला जाउँगा, कोई साथ नहीं होगा ? हमारा कर्म साथ होगा | जो हमने साधन किया है - अच्छा-बुरा | वो साथ जायेगा | उसी का फल मिलेगा | कैसी फीलिंग(feeling) होगी उस समय हमको ? तो प्रेम की प्यास जितनी तेज हो उतनी जल्दी लक्ष्य मिलता है | दो चीज़ तो हमको मिल गई - मनुष्य का शरीर और तत्त्वज्ञान - गुरु के संग का परिणाम | यानी मनुष्य शरीर मिला और उस ज्ञान में लक्ष्य को पाने का साधन - ज्ञान भी मिला | दोनों बातें मिल गई |

अब तीसरी चीज़ पैदा करना - ये हमारा काम है | ये न भगवान् का काम है, न गुरु का काम है | भगवान् ने अपना काम कर दिया | मानव देह दे दिया, गुरु से मिला दिया | गुरु ने अपना काम कर दिया- आपको तत्त्वज्ञान करा दिया, जो लाखों, करोड़ों वर्ष में आप शास्त्र-वेद पढ़के न समझ पाते, वो उसने चुटकियों में करा दिया | अब इसके आगे तीसरा काम आपका | वो भक्ति करना, उपासना करना, साधना करना, मन को भगवान् में लगाना - ये जो साधन है, भक्ति है | ये भगवान् नहीं करके देंगे, न कोई गुरु करके देगा | क्यों ? अगर वो करके दे सकते, तो अनंत कोटि ब्रह्माण्ड ही क्यों रहता ? अरे! देखो - भगवान् का एक गुण है -
'सत्य संकल्प' - (श्लोक....) अंतिम। सबसे बढ़िया गुण 'सत्य-संकल्पः' यानी भगवान् ने जो सोचा - हो गया | करना वरना नहीं | ये तो ऐसे लिख दिया वेद में कि -(श्लोक....) भगवान् ने देखा, भगवान् मुस्कुराये | अजी नहीं मुस्कराना-फुस्कराना कुछ नहीं | बस सोचा | ये तो करना पड़ेगा भगवान् को |(श्लोक....) उसने सोचा | बस हो गया | जो सोचा हो गया | सृष्टि हो जा | हो गई | प्रलय हो जा | हो गया | रक्षा हो जा | हो गया | शरीर बन जा | बन गया | शरीर समाप्त कर दो, निराकार हो जाओ | हो गए | जो सोचते हैं - वो हो जाता है | ये उनका एक गुण है सबसे बड़ा | और ये गुण संतों के पास भी है | भगवान् के पास जो गुण होते हैं न ये आठों, ये सब महापुरुषों को भी दे देते हैं सेंट-परसेंट, लेकिन न कोई भगवान्, न कोई संत ऐसा कर सका कि सोच ले - 'अनंत जीवों का उद्धार हो जाये, सब गोलोक चले जायें' |
अरे ! कोई संत कर लेता ऐसा संकल्प, तो हम लोगों का काम बन जाता फ्री(free) में | हाँ | कितना सरफोड़ी करते हैं संत लोग | किताब लिखते हैं, दुनिया भर का लेबर(labor) करते हैं हमारे साथ | अरे काहे को इतना प्रयत्न कर रहे हो ? बस संकल्प कर लो | हो गया | नहीं | हमको करना पड़ेगा | हम भगवान् और गुरु के भरोसे बैठे-बैठे तो अनंत जन्म गँवा चुके | ये मूर्खता अब छोड़नी होगी | ये हमको करना है | जीवों को करना है वेद कहता है -(श्लोक....) ये जीव को करना है | चलना है तुम को | 'उत्' ऊपर को |(श्लोक....)नीचे को, अधोगति के लिए रजोगुणी, तमोगुणी, सत्वगुणी के लिए नहीं |

तो ये प्रेम की पिपासा ये हमको बढ़ानी होगी | और एक मन है और दो चीज़ें हैं पाने की, खाने की | एक विष, एक अमृत | एक माया, एक भगवान् | एक प्रेय, एक श्रेय | दो में एक अपनाना पड़ेगा | तीसरी कोई चीज़ है ही नहीं | और बिना अपनाये आप रह सकते नहीं | क्योंकि आप अकर्मा नहीं रह सकते, क्योंकि आपको लक्ष्य प्राप्त करने की नेचुरल(natural) भूख है | इसलिए दो में एक साइड(side) में जाना पड़ेगा | तो सही साइडमें जाकर सही लक्ष्य प्राप्त कर लो -(श्लोक....) 'साधु भवती' वेद कह रहा है | तो इस प्रकार ये तीन दुर्लभ वस्तुयें हैं | इनमें दो मिल चुकी, तीसरी हमको करनी है, हमको पानी है, हमको बढ़ानी है - वो प्रेम की पिपासा - उसका हम अभ्यास करके, बढ़ा करके और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें |

और इस मानव देह के बारे में एक बात सदा याद रक्खें | वो नहीं रखते आप लोग | वो क्या है ?
अगला क्षण मिले न मिले | अभी मेरी उम्र क्या है? दस साल का तो हूँ, बीस साल का तो हूँ, चालीस साल का तो हूँ, पचास साल का तो हूँ | ये मत सोचो| अरे ! आँख से देख तो रहे हो संसार में क्या हो रहा हैं ? बच्चा पैदा हुआ | ' क्याँव' कहा और मर गया, एक बार रोया फिर मर गया | अरे माँ के पेट में ही मर गया, मरा हुआ पैदा हुआ | वो आई.ए.एस.(I.A.S.) करके आ रहा है लड़का | इधर पिता, माँ खुश हो रहे हैं | और बधाई हो रही है, मिठाई बँट रही है | रास्ते में एक्सीडेंट (accident) हो गया | मर गया | रोज़ देख रहे हैं | तो अपने लिए भी तो सोचना है | युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा था सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है | 'किमाश्चर्यम्' सबसे बड़ा आश्चर्य है कि हम अपने लिए नहीं सोचते | लापरवाह हैं | उसको हार्टअटैक (heart attack) हो गया, वो आज मर गया | अच्छा खासा बैठा था वो अरबपति, वो प्राइमिनिस्टर (Prime Minister) वो प्रेसीडैन्ट (President) | अरे ! किसी को नहीं छोड़ता काल | राजा, रंक, फ़कीर, संत कोई हो | जाना होगा, शरीर छोड़ना होगा | और कब ? ये पता नहीं। इसलिए उधार नहीं करना है ।वेद कहता है -(श्लोक....) प्रह्लाद ने कहा -(श्लोक....) अरे ! बचपन में ही लग जाओ भगवान् की ओर | युवावस्था आवे न आवे | और हम लोग क्या करते हैं | बचपन है | अभी तो पढ़ने का समय है, खेलने कूदने का समय है | युवावस्था आई | अभी तो मौज मस्ती का समय है | यही करते-करते मर गये | अनंत बार मर गये | एक दो बार नहीं | और प्रेम पिपासा नहीं पैदा कर सके। भगवान् के मिलन की परम व्याकुलता नहीं पैदा कर सके।
इसलिए इन तीनों बातों को समझना है, बार-बार विचार करना है | और बार-बार संसार से मन को हटाकर लक्ष्य की ओर लगाना है | अभ्यास से ही काम होगा | और अगर ऐसा नहीं किया तो -(श्लोक....) करोड़ों कल्प चौरासी लाख में घूमना पड़ेगा | अनंत जन्म घूम चुके, आगे भी घूमना पड़ेगा।

हमारी जिद्द नहीं काम देगी | ए जी - हम झगड़े में नहीं पड़ते | जो मन में आता है वो करते हैं | ठीक है | जीव कर्म करने में स्वतंत्र है | मन में आये सो करते जाओ लेकिन फल भोगने में परतंत्र है | फल भोगना पड़ेगा, भगवान् के अनुशासन के अनुसार | वहाँ नहीं चलेगी | हम नहीं भोगते जी, न -(श्लोक....) इसलिए सावधान होकर उधार न कर के हम लोगों को साधना में तत्पर हो करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए |

लाड़ली लाल की जय |👏👏👏
(जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज के प्रवचन का अंश)
(-- बरसाना १०.४.२००६)
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गोपी गीत , भाग 15 , करपात्री जी

गोपी गीत 15

अटति यद् भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुख च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृछ् दृशाम्।।15।।

अर्थात्, हे प्रिय! दिन के समय जब आप वन में विहरण करते रहते हैं तो आपके अदर्शन से हमें एक-एक क्षण भी सुगवत् प्रतीत होने लगता है; सन्ध्या समय जब आप लौटते हैं और हम आपकी घुँघराली लटों से युक्त मुखचन्द्र को निहारने लगती हैं तो हमारी आँखों की पलकें ही हमारे लिये शत्रृवत् हो जाती हैं क्योंकि इनका बार-बार गिरना आपके मुखचन्द्र के दर्शन में विघ्नकारक होता है। ऐसे समय हमको प्रतीत होता है कि इन नेत्रों को बनाने वाले विधाता जड़मूर्ख हैं।

‘अटति यद् भवानह्नि काननं’ आप दिनभर व्रन्दावन में पर्यटन करते हैं; आपका यह पर्यटन सर्वथा प्रयोजनरहित है। इस वृन्दावन मतें तो कोई दर्शनीय वस्तु भी नहीं है; गोकुल में, नन्द-ग्राम में, बरसाने में रासेस्वरी, नित्यनिकुज्जे - श्वरी, वृषभानुनन्दिनी श्री राधारानी के मंगलमय मुखचन्द्र का दर्शन हो सकता है; इस दर्शन से आपके नेत्र सफल हो सकते हैं। तब भी, आप तो वन में ही पर्यटन करते रहते हैं और आपके अदर्शन से हम लोगों को त्रृटिवत् काल भी यृगवत् प्रतीत होता है। विश्वनाथ चक्रवर्ती के मतानुसार शत कमल - पत्र को एक पर एक रखकर तीव्र धारयुक्त तलवार से वेगयुक्त छेदन के प्रयास में तलवार की गति के पौर्वापर्य - कालसमूह से भी जो सूक्ष्म काल है वही क्षण कहलाता है। एक क्षण का सत्ताईस सौवाँ भाग ‘त्रुटि’ कहा जाता है। सूक्ष्मता के कारण त्रुटि - काल अनुभूत भी नहीं हो सकता। ‘त्रसरेणुत्रिकं भुङ्क्ते यः कालः स त्रुटिः समृतः’ । ‘त्रुटि’ वह काल है जितने समय में सूर्य तीन त्रसरेणुओं का उल्लंघन करता है।

सौ त्रुटियों का एक वेध, तीन वेधों का एक लव, तीन लवों का एक निमेष और तीन नियमों का एक क्षण होता है। अस्तु, एक क्षण का सत्ताईस सौवाँ भाग ही ‘त्रुटि’ काल है। कहीं-कहीं ‘क्षण’ को ही अव्यवहार्यतः सूक्ष्म कहा गया है। श्याम- सुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र वृन्दावन में अटन कर रहे हैं। उनकी परम-प्रेयसी गोप - सीमंतिनियाँ उनके विप्र योगजन्य तीव्र ताप से संतत्त होकर त्रुटि - परिमित काल को भी युगतुल्य अनुभव करती हुई कथंचित् कालयापन कर रही हैं। यहाँ भावना होती है कि ऐसा क्योंकर सम्भव है? किस कारण गोपाङनाओं को श्रीकृष्ण के अदर्शन से क्षण भी युगवत् प्रतीत होता है?

‘भवस्य दग्धकामस्य भवस्यापि अनः प्राणः। अनिति तिष्ठते इति अनः-प्राण; दग्धकामस्य शंकरस्यापि जीवनभूतः’ भव, शंकर जो दग्धकाम है, जिसने कन्दर्प को अपने दृष्टिमात्र से भस्मीभूत का दिया, उनके भी आप प्राण हैं ‘किमुत वक्तव्यं अस्माकं कामिनीनां भवान् अनः भवेत्’ तब हम कामिनीजनों के भी आप प्राण, जीवन सर्वस्व क्यों न हों? हम कामिनियों के लिए श्यामसुन्दर, मदनमोहन श्रीकृष्ण ही जीवन मूल हों इसमें क्या विस्मय है? तात्पर्य कि व्यवहारतः भी यह स्वाभाविक है कि रागियों की रागास्पद कोई सुन्दर वस्तु ही होः किसी सुन्दरी को देखकर रागी काम - उत्कंठित हो जाय यह तो स्वाभाविक है परन्तु जिसमें वीरगती का मन भी चंचल हो उठे वह प्रेमास्पद ही विशिष्ट है।

सौन्दर्य माधुर्य सौरस्य - सुधा जलनिधि श्यामसुन्दर मदनमोहन के सौन्दर्य का ही वैशिष्ट्य है कि काम - दग्ध, आप्तकाम पूर्णकाम परम - निष्काम भूत - भावन भगवान् शंकर भी आपके अनन्य अनुरागी हैं और आपके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकते हैं। ऐसी स्थिति में रागियों का विशेषत: हम जैसी अनुरागिणियों का मन आकृष्ट हो जाय यह तो अत्यन्त स्वभाविक ही है। यही कारण है कि श्याम-सुन्दर, मदन-मोहन के अदर्शन में त्रुटि - परिमितकाल भी हमारे लिये युगवत् प्रतीत होता है। प्राण के संकटापन्न होने पर अत्यन्त सूक्ष्म काल, एक क्षण भी व्यतीत होना कठिन हो जाता है; एक-एक क्षण शत-शत कोटि युगवत् प्रतीत होने लगता है; परन्तु प्राण सुखी हों तो कोटि कल्प भी क्षणवत् व्यतीत हो जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के अदर्शन में गोपाङनाओं को त्रुटिकाल भी युग - तुल्य प्रतीत होता था परन्तु भगवत् - सन्निधान में कोटि-कोटि ब्रह्म - रात्रियाँ सन्निविष्ट प्रहर चतुष्टयवती रात्रि भी क्षणार्धवत् बीत गई। 

‘तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीतामयैव वुन्दावनगोचरेण।’

और

‘गोपीनापं परमानन्द आसीत् गोविन्ददर्शने।
क्षणं युगशतर्तामव यासां येन विनाभवत्।।’

भगवान् श्रीकृष्ण प्राण के भी प्राण हैं। न केवलं भवस्य शंकरस्यैव अपितु सर्व स्वैय भवस्य भवान् अनः प्राणः’ वे केवल हमारे ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के प्राण हैं, भव - शंकर के भी प्राणों के भी प्राण हैं; उनके त्रुटिकाल - पर्यन्त वियोग में भी जीवन क्योंकर सम्भव हो सकता है? प्राण के वियोग में ही दारुण दुःख होता है। वेद - वाक्य है,

‘न प्राणेन नापानेन मत्र्यो जीवति कश्चन्।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ।।’

लौकिक प्राण एवं अपान प्राणी के जीवन - धारण का कारण नहीं है; जीवन का मूल आधार वह इतर है जिस पर प्राण और अपान दोनों ही आश्रित हैं। प्राण एवं अपान के झूले में झूलनेवाला वह इतर ही प्राणों के प्राण, सुख के सुख राम हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही वह सूत्रधार हैं जिसके आधार पर प्रणापान क्रमबद्धतः उदित एवं विलोन होते रहते हैं। ‘योगवासिष्ठ’ में ‘प्राणोपासना’ का बड़ा महत्व बताया गया है; इस उपासना का उपदेश काकभुशण्डीजी ने वशिष्ठ - जी को किया; ‘हंसस्सोऽहम् हंसस्सोऽहम्’ का अनुभव करना ही प्राणोपासना है। ‘एक एव हंति गच्छति इति हंसः शुचि षद्बसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथि - र्दुरोणसत्। नृषद्वरसहतद्सव्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्।।’ ये सब सूर्य के नाम हैं; सूर्य के नाम होते हुए भी सब परब्रह्म के भी नाम हैं।

हंस’ हो वह परम मंत्र है जिसे प्राणी निरन्तर जपता रहता है। ‘हकारेण बहिर्याति सकारेणाविशेत्पुनः’ ।।61।। ‘हंसहंसेत्यमुंमन्नं जीवो जपति सर्वदा’ (ध्यानबिन्दूपनिषद्) अर्थात् हकार से श्वास बाहर जाता है, सकार से श्वास भीतर जाता है, प्राणापान की इस निरन्तर गति से ‘सोहम्’ शब्द सदा होता रहता है। प्राण एवं आपान, दोनों ही जिस आधार पर टिके हैं वही वाक्यार्थ है, वही परब्रह्म हैं, वही परमेश्वर हैं, वही भगवान् हैं, राम हैं, कृष्ण हैं। लक्ष्यार्थ माने ‘तत्त्व’, ‘तत्त्व’ पद का वाक्यार्थ क्या है? ‘त’ सभी पदार्थ है ‘त्वं’ भी पदार्थ है; दोनों का वाक्यार्थ है अभेद।

जैसे, समुद्र ही तरंगों के उदित एवं विलीन होने का आधार है, वैसे ही ‘प्राणापान’ तप तरंगों के उदित एवं लय का एकमात्र आधार, सर्वाधिष्ठान, परात्पर परब्रह्म परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। अतः ‘भवस्य सर्वस्यैव’ आप ही सम्पूर्ण संसार के प्राणों के प्राण हैं; जैसे प्राण विना प्राणी निस्सार हो जाता है, वैसे ही आप बिना जगत् निष्प्राण हो जाता है। ‘सुरेशलोऽपि न वै स सेव्यताम्’[1] जहाँ भगवान् की मंगलमयी कथा - सुधा का पान करने को न मिले, जहाँ भगवद् - भक्तों का संग न मिले, वह यदि इन्द्रलोक भी हो तो भी वहाँ न रहें।

‘भाति, वाति अनिति सर्व काननं सर्व जगत्-यस्मात् स-भवान्’ - सम्पूर्ण संसार, सम्पूर्ण वन, वृन्दावन धाम सब आप ही से देदीप्यमान हैं, आप ही से सुगन्धमय है, आप ही से जीवनयुक्त है। मानव शरीर में ही दिव्य सुगन्ध भी है, विचित्र दुर्गन्ध भी है। शास्त्रानुमोदित सन्मार्ग का अनुसरण करते हुए सत्कर्म द्वारा प्रसारित यश ही दिव्य सुगंध है; विमार्ग का अनुसरण करते हुए अकर्म-कुकर्मजन्य अपयश ही दुर्गन्ध है। प्राणी के यशस्वरूप सुगन्ध से लोकान्तर प्रसन्न होते हैं और अपयशरूप दुर्गन्ध से लोकान्तर खिन्न हो जाते हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत् को देदीप्यमान करने वाले हैं, आप ही सम्पूर्ण जगत् को जीवित, प्रफुल्लित करने वाले हैं। ‘भवति सर्व जगद् यस्मात् इति भवः, अनिति सचेष्ट है। ‘तज्जलानितिशान्त उपासीत्’[2] सम्पूर्ण जगत् परमात्मा से ही उत्पन्न होता है, परमात्मा से ही सचेष्ट होता है, और परमात्मा में ही लीन हो जाता है अतः सम्पूर्ण जगत् ही तज्जलान् है। एतावता भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति एवं स्थिति के मूल कारण भी हैं और आधार भी हैं अतः त्रुटिकालपर्यन्त श्रीकृष्ण - वियोग असह्य है।

शरीर और आत्मा का वार्तालाप

*""""शरीर और आत्मा की वार्तालाप""""*

😴😴😴😴😴😴😴

*:-सुबह के 4 बजे:-*

*"आत्मा" --- चलो उठो साधना का समय हो गया है !*
*उठो ना !*
*उठो ना !*
*उठो ना !*

*"शरीर" --- सोने दो न ! क्यों तंग कर रही हो ?*
😧😧😧
*पता नहीं क्या रात को बहुत देर से सोया था.........*
😴😴😴
*थोड़ी देर के बाद साधना करूँगा ।*

*"आत्मा" --- बोली ठीक है और मन में सोचने लगी मुझे भूख लगी है और ये है क़ि समझता ही नहीं है*

*सुबह के 6:- बजे तो आत्मा बोली - अब तो उठ जाओ भाई !सूरज भी आपनी किरणे फैलाते हुए हमें उठा रहा है उठो नplzzzzz.*
*उठो ना !*
*उठो ना !*
*उठो ना plzzzz !*
🌞🌞🌞🌞🌞

*"शरीर" --- कितना परेशान करती हो ! ठीक है उठ रहा हूँ बस 5 मिनट और सोने दो !*

*आत्मा छटपटाती हुई शरीर के इंतजार में कि ये कब उठेगा और कब मेरी भूख को शांत करेगा*
😧😧😧

*!!!!!थोड़ी देर बाद साधना में बैठने के लिए शरीर ने वक्त निकाला ।*

*20-25 मिनट साधना में बैठा और आत्मा कुछ तृप्त ही हुई थी की शरीर उठ गया.......*
😧

*"आत्मा" --- अरे रे रे रे क्या हुआ क्यों उठ गए अभी तो मैं तृप्त हुई भी नहीं हूँ कि तुम उठ रहे हो !!!!!*
😔😔😔
*क्या हुआ भाई ? कहाँ जा रहे हो ?*
😒😒😒

*"शरीर" --- अरे मुझे (ऑफिस or घर का ) काम पर जाना है तुम्हारी तो कुछ समझ में ही नहीं आता !!!!*
😠😠😠

*"आत्मा" --- ठीक है शाम को तो साधना करोगे न ?*
😧😧😧

*"शरीर" --- (परेशान होते हुए) हाँ भई हाँ ।*

*सारा दिन निकल गया, आत्मा भूख से तड़पते हुए ......*
😧😧😟😟
*शाम हो गई आत्मा खुश हुई चलो अब तो मेरी भूख का निवारण हो ही जायेगा ...*
😃😃😃😃

*"आत्मा" --- अरे फ्री हो गए !*
*अब तो चल ही सकते हो साधना के लिए चलो न ।*
😳😳😳

*"शरीर" ---
😠😡😡😠
*देखती नहीं हो मैं अभी ऑफिस और घर के कामों से फ्री हुआ हूँ, थक गया हूँ ।*
😴😴😴

*"आत्मा" --- अरे तुम थके हुए हो तो साधना में जैसे ही बैठोगे तो तुम्हारी थकान चुटकी में दूर हो जाएगी ...*
👌👌👌✋

*"शरीर" --- नहीं अभी नहीं रात को पक्का बैठूँगा ।*
🌚🌚🌚

*शरीर की स्थिति - आँखें नींद में भरी हुई, थकान से बुरा हाल जैसे-तैसे आत्मा की ख़ुशी के लिए साधना में बैठे ....*
😁😧😟😁

*आत्मा की कुछ भूख शांत हुई ही थी कि यहाँ शरीर की आँखे नींद से भर गई ..*
😴😴😴😴

*शरीर उठा और सोने के लिए जाने ही लगा था क़ि ..*
😳😳😳

*"आत्मा बोल उठी" --- अरे अरे क्या हुआ क्यों उठ गए अभी बैठे ही थे की उठ भी गए ।*
😧😧😧

*"शरीर" --- मैं थक गया हूँ यार !!*
😔😔😔
*कल सुबह को पक्का 4 बजे उठ के साधना करुगा .....*
😃😃😃

*"आत्मा" --- तुम फिर से बहाना बना रहे हो तुम नहीं उठोगे मुझे पता है ।*
😫😩😫

*आत्मा दुखी होकर चुप हो गई तभी शरीर ने मोबाइल पर msg देखा।*
😳😳😳

*"शरीर" --- अरे ये तो मेरे best frd का msg*
*है चलो थोड़ी देर चैटिंग करके सोता हूँ ...*
😊😊😃

*आत्मा सोचती है (मन ही मन)- देखो साधना के वक्त तो इसे नींद आ रही थी और अब देखो friends से बात करने के वक्त नींद ही गायब हो गई ।*
😳😒😳
*जिसकी वजह से इसका अस्तित्व है उसी की ही परवाह नहीं है इसे*
😔😔😔
*"आत्मा" --- खैर चलो कल देखते है।*

*परंतु फिर वही दिनचर्या.....*
*सुबह के 4 बजे से रात के वक्त तक और आत्मा भूखी की भूखी रह जाती है ।*

      ।। राधे राधे जी।।
🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

बनत बनत बन जाई , राधा बाबा

हरि सो लगा रहु रे भाई। तेरी बनत - बनत बनि जाई।।

भगवान् से लगे रहने पर सब कुछ अपने आप बन जाता है। जगत में कितने ऐसे लोग हैं जो केवल भजन करते हैं, चले आते हैं और वैसे ही चले जाते हैं। उनकी भजन व्यर्थ तो नहीं जाता, पर उनमें जो अकड़ रहती है,  उसके कारण उन्हे भगवान् नहीं मिल पाते।भगवान् तो भोले भाले भक्तों पर रीझतें हैं; जिन्हे साधना क्या होती है, इसका भी ज्ञान नहीं होता। जो केवल किसी ने कुछ बता दिया उसी पर चलने लगे।
एक महात्मा जी से किसी ने पुछा - महात्मा क्या होते हैं? 
उन्होनें कहा - पागल कुत्ते होते हैं;जिन्हे एक डंडा मार दो तो भाग जाते हैं, पर थोड़ी देर में प्यार से बुलाने पर फिर आजाते हैं। ऐसे ही महात्माओं में मान नहीं होता। जैसे पागल कुत्ते के काटने से बचना कठिन है मनुष्य भौंकते - भौंकते ही मर जाता है, वैसे ही महात्मा ने जिस पर अपना प्रभाव डाला,  फिर वह राम- राम करता ही पागल हो जाता है।
कुत्ते का काटा हुआ तो शायद बच भी जाये,  पर महात्मा तो अँत तक ही पहुँचाते है।

सत्संग सरिता
परिवार के मुखिया: राधा बाबा से

Tuesday, 4 October 2016

मानव का लक्ष्य कृपालु जी भाग 1

🌿🌷 - मानव का लक्ष्य - 🌷🌿

"नर  तनु  गुरु  सँग   गोविन्द राधे।
प्रेम पिपासा तीनों, लक्ष्य दिला दे ।।"

         भाग --1⃣

हमारा जो लक्ष्य है - उस लक्ष्य को पाने के लिए तीन चीज़ें परमावश्यक हैं-
नम्बर(number) एक -
मनुष्य का शरीर। और किसी शरीर में लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी | जिसको आप आनंदप्राप्ति कहते हैं, भगवत्प्राप्ति कहते हैं, जो आपका अंतिम लक्ष्य है, उसको पाने के जो तीन प्रमुख साधन हैं, उसमें सबसे पहले नर तनु |
ये शरीर पुरुषार्थ करके, साधन करके, लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और कोई शरीर नहीं | एकमात्र मानव-देह |

लेकिन अनंत बार ये मानव-देह मिल चुका, लक्ष्य नहीं मिला | तो केवल मानव-देह मिलने से तो और बात बिगड़ गई, बनी नहीं | क्यों ? बिगड़ क्यों गई ? इसलिए कि मानव-देह में हमारे किये हुए कर्मों का फल भोगना पड़ता है |  अन्य दूसरे शरीरों में हमारे द्वारा किये हुए कर्मों का फल नहीं भोगना पड़ता | वो भोग योनि कहलाती है| वहाँ केवल भोग-भोग है | और मानव-देह में कर्म भी है और भोग भी है - दोनों हैं |
अतः चूँकि मानव-देह ज्ञान प्रधान है अगर इसको सही दिशा में न लगाया गया, तो गलत दिशा में भी बड़ी स्पीड(speed) में जायेगा | पाप चोरी करना, बात बनाना, दूसरे को दुःख देना, तमाम प्रकार के पाप आप जानते हैं | ये पाप मनुष्य जितनी सफाई से कर सकता है कुत्ता, बिल्ली, गधा कैसे करेगा ? कुत्ता चोरी क्या करेगा ? कोई चीज़ ले के भागेगा, आप देख रहे हैं | लेकिन मनुष्य बैंक(bank) के लाँकरों(lockers) से भी चुरा लेता है | उसमें ज्ञान प्रमुख है | तो पाप करने में ज्ञान की आवश्यकता है | जैसे शुभ कर्म में ज्ञान की आवश्यकता है, ऐसे ही अशुभ कर्म में भी, पाप कर्म में भी।
जितना अधिक ज्ञान होगा जिसके पास, उतना बड़ा पाप कर सकेगा वो | तो हमने अनंत पाप कर लिए मानव-देह में | तो ये मानव-देह सबसे बढ़िया और सबसे खराब | सबसे बढ़िया इसलिए कि इसी मानव-देह में तुलसी, सूर, मीरा, कबीर, नानक, तुकाराम बड़े-बड़े संत हुए और सबसे खराब इसलिए कि अगर आपने भगवत्प्राप्ति का मार्ग नहीं अपनाया तो फिर गलत मार्ग में चलना पड़ेगा | क्यों ?
एक क्षण को भी आप अकर्मा नहीं रह सकते | (श्लोक....)
चलना पड़ेगा | चाहे पूर्व की ओर चलो, चाहे पश्चिम की ओर चलो | चलना पड़ेगा | एक सेकेण्ड(second) को भी बिना चले आप नहीं रह सकते | तो अगर सही दिशा में नहीं चलेंगे, तो गलत दिशा में चलना पड़ेगा | इसलिए सबसे खराब है मानव-देह | ये भी वाक्य सही है और सबसे बढ़िया है - ये तो ठीक ही है | इसलिए तुलसीदास ने बड़ा सुन्दर निरूपण किया है अपनी रामायण में -(श्लोक....) इसके समान कोई और देह नहीं | क्यों ?
अब देखो - रीज़न(reason) |
इसके समान कोई और देह नहीं ? इसमें कितना छुपा है राज़ | इसके समान खराब कोई देह नहीं - ये भी अर्थ हो सकता है और इसके समान अच्छा कोई देह नहीं - ये भी अर्थ हो सकता है | तो तुलसीदास ने बड़ी चालाकी से लिखा - (श्लोक....) जीव चराचर याचना करता है मानव-देह की -- नरक के लिए ? अरे ! ऐसा क्यों लिख दिया ? इसकी इम्पार्टेंस (importance) नरक के लिए है ? नहीं - ज्ञान प्रधान है और मनुष्य लापरवाह है वो भगवान् की ओर नहीं चलता, तो फिर नरक की ओर जाना पड़ेगा | पाप करेगा, नरक जायेगा, इसलिए नम्बर एक - नरक | और कुछ लोग थोड़े समझदार भी होंगे तो उनको स्वर्ग, ये कर्म धर्म करने वाले | नरक , स्वर्ग - और कुछ लोग और भी इने गिने बुद्धिमान होंगे तो 'अपवर्ग' मोक्ष ।
ये तीन चीज़ें अशुभ कर्म, शुभ कर्म और शुभाशुभ कर्म रहित कर्म से मिलती हैं | ये तीन प्रकार का कर्म होता है | अशुभ कर्म माने पाप कर्म | उससे तो नरक | और शुभ कर्म माने पुण्य कर्म धर्म | उसका फल - स्वर्ग | और पाप पुण्य दोनों न करे ऐसा अकर्म - ज्ञानियों का, इससे मोक्ष | और इससे भी बड़ी चीज़ -
'भक्ति सुख देनी' |
ज्ञान वैराग्य अनुचर रहेंगे | उनसे युक्त भक्ति | ये चार चीज़ देने वाली - ये नर तनु है | बहुत गुण गाया है मानव-देह का | वेदों ने, शास्त्रों ने, पुराणों ने,संतों ने, सब ने | क्योंकि फेक्ट(fact) है |

और कोई शरीर है ही नहीं जिससे हम लक्ष्य प्राप्त करें | तो मानव-देह नम्बर एक | नम्बर दो - गुरु संग | गुरु-मिलन नहीं - गुरु-संग | गुरु मिलन तो अनंत जन्म में अनंत बार हो चुका | हमको गुरु लोग मिले | लेकिन हमने संग नहीं किया | उनके पास गए - प्रणाम किया, लैक्चर(lecture) सुना, सिर हिलाया - हाँ हाँ हाँ समझ में आ गया | बस |प्रैक्टिकल(practical) नहीं किया | मन का लगाव संसार में ही किया |

मानव-देह नंबर एक, फिर गुरु का संग नंबर दो | इसलिए मानव-देह में भी भगवत्कृपा मानी गई | ये मानव-देह --(श्लोक....) कभी करुणा करके भगवान् मानव-देह देते हैं - ये पहली कृपा | और फिर गुरु का संग हम करें - ये तो बहुत बड़ी कृपा | गुरु मिले - ये कृपा नहीं | गुरु का संग करें हम, ये विशेष कृपा है | क्योंकि अगर हम संग नहीं करेंगे तो छप्पन व्यंजन रक्खा है, हम खाते ही नहीं | बैठे हैं देख रहे हैं उसको | तो भूखे मरेंगे | पानी रक्खा है, नहीं पीते, मर जायेंगे | तो केवल मिलने से काम नहीं चलेगा | हम मन का संग करें गुरु में |सरैण्डर(surrender) करें, शरणागत हो | उनकी बुद्धि से अपनी बुद्धि जोड़ दें | ये दूसरी विशेष कृपा | और यह भी हो गई अगर भगवान् की कृपा हमारे ऊपर - हो गई | अनंत जन्म में अनंत संत मिले, उन्होंने समझाया, हमारी बुद्धि में बैठा भी | ये दो कृपा तो हो चुकी | उसी का फल है आप लोग बैठे हैं यहाँ | ये आपका कमाल नहीं है । आप लोग अकेले में सोचिये - आपने क्या कमाल किया ? जो मानव-देह मिला और क्या कमाल किया जो तत्त्व ज्ञान मिला ? कितने शास्त्रों वेदों का अध्ययन किया आपने ? ये दो कृपा कैसे मिल गई आपको ? लेकिन लक्ष्य नहीं मिला |तीसरी कृपा और आवश्यक है -

उसका नाम - प्रेम की पिपासा, प्यास। यानी खाना खाने की भूख | पाने की व्याकुलता | उसको कोई मुमुक्षा कहता है - (शंकराचार्य) | कोई लालसा कहता है - (ये ब्रजवासी लोग) अनेक नाम हैं उसके | उस प्रेम के पाने की प्यास, भूख, कामना, व्याकुलता, तड़पन। उसके बिना रहा न जाये |
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(जगद्गुरू श्री कृपालु महाराज जी के प्रवचन का अंश)
क्रमशः - 2⃣ कल के अंक में।
राधे राधे....!👏👏👏