Thursday, 11 August 2016

श्रोता के प्रकार

कही हम इस प्रकार के श्रोता तो नहीं

नवधा भक्ति में प्रथम भक्ति श्रवण कही गई है,श्रीकृष्ण कथा का आश्रय लेने वाले श्रोता दो प्रकार के माने गए है-
१.प्रवर (उत्तम),और
२.अवर (अधम).

१). प्रवर श्रोता - "चातक", "हंस", "शुक" और "मीन" आदि कहे गए है.  

२). अवर श्रोता - "वृक", "भुरुंड", "वृष". और "उष्ट्र" आदि कहे गए है.
                                   
 प्रवर (उत्तम )श्रोता   

१. चातक - चातक कहते है पपीहे को,पपीहा जैसे बादल से बरसते हुए जल में ही स्पृहा रखता है दूसरे जल को छूता ही नहीं उसी प्रकार जो श्रोता सब कुछ छोड़कर केवल श्रीकृष्ण सम्बन्धी शास्त्रों के श्रवण का व्रत ले लेता है वह "चातक" है.

२ . हंस - जैसे हंस दूध के साथ मिलकर एक हुए जल से निर्मल दूध ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है उसी प्रकार भली भांति पढाया श्रवण करके उसमे से सार भाग अलग करके ग्रहण करता है. उसे "हंस" कहते है.

३. शुक - जैसे तोता अपनी मधुर वाणी से शिक्षक को और पास आने वाले दूसरे लोगो को भी प्रसन्न करता है उसी प्रकार जो श्रोता कथा वाचक व्यास के मुह से उपदेश सुनकर उसे सुन्दर और परिमित वाणी में पुनः सुना देता है व्यास और अन्य श्रोताओ को अत्यंत आनंदित करता है वह "शुक" कहलाता है.

४. मीन - जैसे क्षीरसागर में मछली मौन रहकर अपलक आँखों से देखती हुई सदा दुग्ध पान करती रहती है उसी प्रकार जो कथा सुनते समय निर्निमेष नयनो से निरंतर कथा रस का ही आस्वादन करता रहता है वह प्रेमी श्रोता "मीन" कहा गया है.                                                               अवर (अधम )श्रोता

१. वृक - वृक कहते है भेडिये को,जैसे भेडिया वन के भीतर वेणु की मीठी आवाज सुनने में लगे हुए मृगो को डराने वाली भयानक गर्जना करता है, वैसे ही जो मुर्ख कथा श्रवण के समय रसिक श्रोताओ को उद्विग्न करता हुआ, बीच-बीच में जोर जोर से बोल उठता है वह "वृक" कहलाता है.

२. भुरुंड - हिमालय पर भुरुंड जाति का पक्षी होता है वह किसी के शिक्षाप्रद वाक्य सुनकर वैसे ही बोला करता है किन्तु स्वयं उससे लाभ नहीं उठाता,इसी प्रकार जो उपदेश की बात सुनकर उसे दूसरों को तो सिखाये पर स्वयं आचरण में न लाये ऐसे श्रोता को "भुरुंड" कहते है.

३. वृष - वृष कहते है बैल को,उसके सामने मीठे मीठे अंगूर हो या कडवी खली दोनों को वह एक सा ही मानकर खाता है उसी प्रकार जो सुनी हुई सभी बाते ग्रहण करता है पर सार और असार वस्तु का विचार करने में उसकी बुद्धि अंधी है असमर्थ है वह "वृष" के समान है.

४. उष्ट्र- जिस प्रकार ऊट माधुर्य गुण से युक्त आम को भी छोड़कर केवल नीम की पत्ती चबाता है उसी प्रकार जो भगवान की मधुर कथा को छोड़कर उसके विपरीत संसारी बातो में रमता रहता है उसे "ऊँट" कहते है

जय जय श्री राधे

Wednesday, 10 August 2016

ब्रज भूमि

ब्रजभुमि
********

योगेश्वर कृष्ण और जगत जननी राधिका जी की जनम स्थली और क्रीड़ा स्थली को ही लोक में ब्रजभूमि की संज्ञा दी गई है।

व्रज:- अर्थात 'व' से ब्रह्म और शेष रह गया 'रज' यानि यहाँ ब्रह्म ही रज के रुप में व्याप्त हैं।

स्कन्दपुराण में व्रज शब्द की सुन्दर परिभाषा दी गयी है :-
'गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं ब्रज उच्यते।
सदानन्दं परं ज्योति मुक्तानां पदव्ययम्॥'

सत्त्व, रज, तम, इन तीनों गुणों से अतीत जो परब्रह्म हैं, वह विश्व के कण-कण में सर्वत्र व्याप्त हैं, इसलिए उसे ही ब्रज कहते हैं।

यह सच्चिदानन्द स्वरुप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है, जीवन्मुक्त परम रसिक ही इसमें निवास करते हैं।

'ब्रजन्ति गावः यस्मिन्नित्ति ब्रजः' अर्थात जहाँ गो, गोपाल, गोप और गोपियाँ विचरण करती हैं, उसे ब्रज कहते हैं।

नन्दबाबा अपनी गऊओं, बछड़ों, परिवार और परिकरों के साथ जिन-जिन स्थानों पर निवास करते थे, वह स्थान 'ब्रज' कहलाता है।

योगेश्वर कृष्ण और जगत जननी राधिका जी की जनम स्थली और क्रीड़ा स्थली को ही लोक में ब्रजभूमि की संज्ञा दी गई है, इसलिए यहाँ केवल प्रेम ही प्रेम बिखरा पड़ा है और उस प्रेम-समुद्र में उन्नत उज्जवल प्रणयरस सदा उच्छ्वलित होता रहता है।

ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण ब्रज में आज भी नित्य विराजते हैं और यहाँ पर उनकी परम रसमयी रास एवं अन्यान्य क्रीड़ाएँ, नित्यलीला सदैव गतिमान रहतीं हैं।
अतएव, उनके दर्शन के निमित्त भारत के समस्त तीर्थ यहाँ विराजमान हैं।

यही कारण है कि इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है।
यहाँ पर राधा-कृष्ण ने अनेकानेक चमत्कारिक लीलाएं की हैं, सभी लीलाएं यहाँ के पर्वतों, कुण्डों, वनों और यमुना तट आदि पर की गई हैं।

लगभग चौरासी कोस में फैली इस भूमि पर ही श्री कृष्ण ने यमुना किनारे अपने अनगिनत गोप सखाओं और दाऊ भैया के साथ गायें चराई थीं।

यहाँ पर ही श्री कृष्ण अपनी मधुर-मधुर बंशी बजाते हुए असंख्य गौओं के साथ सर्वत्र विचरण करते थे।

यहीं पर उन्होंने कहीं राक्षसों का नाश किया, कहीं यमुना के तट पर कालिया को नाथा।

कहीं कुञ्जों में छुपकर जगत जननी राधा जी का श्रृंगार किया और कहीं गोपियों के संग रास रचाया था।

यहीं पर कभी कन्हैया ने इन्द्र का मान भंग करने के लिए नख पर गिरिवर धारण किया था।

यहाँ के पनघट पर घट भरने के बहाने ब्रज बालाएँ अपने ह्रदय-घट में कृष्ण प्रेम रस भरने के लिए नित जाती थीं।

"पनघट जान दे री, पनघट जात हैं" सखि री, मुझे पनघट जाने दे, नहीं तो प्रियतम से मिलने का पन घट जायेगा।
इस पन की रक्षा के लिए घट लिए ब्रज बालाओं की पनघट पर भीड़ लग जाती थी।

इस रसीले स्थल पर प्रियतम की तिरच्छी रसीली चितवन से ब्रज-बालाएँ जब जल भरने के बहाने जल में गागर डुबोने लगती थी, उसी समय बज उठती थी रसिक शिरोमणि की रसीली बाँसुरी।

फिर ये ब्रज-बालाएँ घट भरकर ले आती थीं या खाली लौटाकर ले आती थीं, भला किसे यह सुध रहती थी?

कालिन्दी के कल-कल करते हुए तटों पर मधुर निकुञ्जों में, टेढ़ी-मेढ़ी संकरी रसीली बीथियों में इन रसीली छेड़-छाड़ से, राग-तकरार से, ऐंठ-उमेठ से, मधुर चितवन से, मधुर-मधुर बोलियों से जल केलि का रसास्वादन कर रसिक शेखर ब्रजेन्द्रनन्दन उत्तरोत्तर रस में विभोर हो जाते थे।

ब्रज की महिमा का भला कौन वर्णन कर सकता है?

इसी कारण यहाँ ब्रजराज कहलाए जाने वाले सर्वेश्वर प्रभु को गोप-ग्वालों और गोपिकाओं के साथ मनोहारी अद्भुत लीलाएँ करते देखकर स्वयं ब्रह्माजी को भी शंका उत्पन्न हुई थी कि यह कैसा भगवद् अवतार बताया जा रहा है।

अन्त में वे भी हार मानकर कहते हैं- 'अहो भाग्यम्! अहो भाग्यम्।

जय जय श्री राधे कृष्ण
🌺🌺🔳🌳🌳🔳🌺🌺

ब्रज भूमि

ब्रजभुमि
********

योगेश्वर कृष्ण और जगत जननी राधिका जी की जनम स्थली और क्रीड़ा स्थली को ही लोक में ब्रजभूमि की संज्ञा दी गई है।

व्रज:- अर्थात 'व' से ब्रह्म और शेष रह गया 'रज' यानि यहाँ ब्रह्म ही रज के रुप में व्याप्त हैं।

स्कन्दपुराण में व्रज शब्द की सुन्दर परिभाषा दी गयी है :-
'गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं ब्रज उच्यते।
सदानन्दं परं ज्योति मुक्तानां पदव्ययम्॥'

सत्त्व, रज, तम, इन तीनों गुणों से अतीत जो परब्रह्म हैं, वह विश्व के कण-कण में सर्वत्र व्याप्त हैं, इसलिए उसे ही ब्रज कहते हैं।

यह सच्चिदानन्द स्वरुप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है, जीवन्मुक्त परम रसिक ही इसमें निवास करते हैं।

'ब्रजन्ति गावः यस्मिन्नित्ति ब्रजः' अर्थात जहाँ गो, गोपाल, गोप और गोपियाँ विचरण करती हैं, उसे ब्रज कहते हैं।

नन्दबाबा अपनी गऊओं, बछड़ों, परिवार और परिकरों के साथ जिन-जिन स्थानों पर निवास करते थे, वह स्थान 'ब्रज' कहलाता है।

योगेश्वर कृष्ण और जगत जननी राधिका जी की जनम स्थली और क्रीड़ा स्थली को ही लोक में ब्रजभूमि की संज्ञा दी गई है, इसलिए यहाँ केवल प्रेम ही प्रेम बिखरा पड़ा है और उस प्रेम-समुद्र में उन्नत उज्जवल प्रणयरस सदा उच्छ्वलित होता रहता है।

ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण ब्रज में आज भी नित्य विराजते हैं और यहाँ पर उनकी परम रसमयी रास एवं अन्यान्य क्रीड़ाएँ, नित्यलीला सदैव गतिमान रहतीं हैं।
अतएव, उनके दर्शन के निमित्त भारत के समस्त तीर्थ यहाँ विराजमान हैं।

यही कारण है कि इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है।
यहाँ पर राधा-कृष्ण ने अनेकानेक चमत्कारिक लीलाएं की हैं, सभी लीलाएं यहाँ के पर्वतों, कुण्डों, वनों और यमुना तट आदि पर की गई हैं।

लगभग चौरासी कोस में फैली इस भूमि पर ही श्री कृष्ण ने यमुना किनारे अपने अनगिनत गोप सखाओं और दाऊ भैया के साथ गायें चराई थीं।

यहाँ पर ही श्री कृष्ण अपनी मधुर-मधुर बंशी बजाते हुए असंख्य गौओं के साथ सर्वत्र विचरण करते थे।

यहीं पर उन्होंने कहीं राक्षसों का नाश किया, कहीं यमुना के तट पर कालिया को नाथा।

कहीं कुञ्जों में छुपकर जगत जननी राधा जी का श्रृंगार किया और कहीं गोपियों के संग रास रचाया था।

यहीं पर कभी कन्हैया ने इन्द्र का मान भंग करने के लिए नख पर गिरिवर धारण किया था।

यहाँ के पनघट पर घट भरने के बहाने ब्रज बालाएँ अपने ह्रदय-घट में कृष्ण प्रेम रस भरने के लिए नित जाती थीं।

"पनघट जान दे री, पनघट जात हैं" सखि री, मुझे पनघट जाने दे, नहीं तो प्रियतम से मिलने का पन घट जायेगा।
इस पन की रक्षा के लिए घट लिए ब्रज बालाओं की पनघट पर भीड़ लग जाती थी।

इस रसीले स्थल पर प्रियतम की तिरच्छी रसीली चितवन से ब्रज-बालाएँ जब जल भरने के बहाने जल में गागर डुबोने लगती थी, उसी समय बज उठती थी रसिक शिरोमणि की रसीली बाँसुरी।

फिर ये ब्रज-बालाएँ घट भरकर ले आती थीं या खाली लौटाकर ले आती थीं, भला किसे यह सुध रहती थी?

कालिन्दी के कल-कल करते हुए तटों पर मधुर निकुञ्जों में, टेढ़ी-मेढ़ी संकरी रसीली बीथियों में इन रसीली छेड़-छाड़ से, राग-तकरार से, ऐंठ-उमेठ से, मधुर चितवन से, मधुर-मधुर बोलियों से जल केलि का रसास्वादन कर रसिक शेखर ब्रजेन्द्रनन्दन उत्तरोत्तर रस में विभोर हो जाते थे।

ब्रज की महिमा का भला कौन वर्णन कर सकता है?

इसी कारण यहाँ ब्रजराज कहलाए जाने वाले सर्वेश्वर प्रभु को गोप-ग्वालों और गोपिकाओं के साथ मनोहारी अद्भुत लीलाएँ करते देखकर स्वयं ब्रह्माजी को भी शंका उत्पन्न हुई थी कि यह कैसा भगवद् अवतार बताया जा रहा है।

अन्त में वे भी हार मानकर कहते हैं- 'अहो भाग्यम्! अहो भाग्यम्।

जय जय श्री राधे कृष्ण
🌺🌺🔳🌳🌳🔳🌺🌺

भगवत्प्रेम का पथिक , भाई जी

भगवत्प्रेम के पथिकों का एकमात्र लक्ष्य होता है-भगवत्प्रेम। वे भगवत्प्रेम को छोड़कर मोक्ष भी नहीं चाहते- यदि प्रेम में बाधा आती दीखे तो भगवान के साक्षात् मिलन की भी अवहेलना कर देते हैं, यद्यपि उनका हृदय मिलन के लिये आतुर रहता है। जगत का कोई भी पार्थिव पदार्थ, कोई भी विचार, कोई भी मनुष्य, कोई भी स्थिति, कोई भी सम्बन्ध, कोई भी अनुभव उनके मार्ग में बाधक नहीं हो सकता। वे सबका अनायास- बिना ही किसी संकोच, कठिनता, कष्ट और प्रयास के त्याग कर सकते हैं। संसार के किसी भी पदार्थ में उनका आकर्षण नहीं रहता। कोई भी स्थिति उनकी चित्त भूमि पर आकर नहीं टिक सकती, उनको और नहीं खींच सकती। शरीर का मोह मिट जाता है। उनका सारा अनुराग, सारा ममत्व, सारी आसक्ति, सारी अनुभूति, सारी विचार धारा, सारी क्रियाएँ एक ही केन्द्र में आकर मिल जाती हैं; वह केन्द्र होता है केवल भगवत्प्रेम - वैसे ही जैसे विभिन्न पथों से आने वाली नाना नदियाँ एक समुद्र में आकर मिलती हैं।

शरीर के सम्बन्ध, शरीर का रक्षण-पोषण भाव, शरीर की आसक्ति,(अपने या पराये) शरीर में आकर्षण, (अपने या पराये) शरीर की चिन्ता-सब वैसे ही मिट जाते हैं जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार। ये तो बहुत पहले मिट जाते हैं। विषय- वैराग्य, काम-क्रोधदिका नाश, विषाद-चिन्ता का अभाव, अज्ञानान्धकार का विनाश भगवत्प्रेम-मार्ग के अवश्यम्भावी लक्षण हैं! भगवत्प्रेम का मार्ग सर्वथा पवित्र, मोहशून्य, सत्त्वमय, अव्यभिचारी, त्यागमय और विशुद्ध होता है। भगवत्प्रेम की साधना अत्यन्त बढ़े हुए सत्त्वगुण में ही होती है। उस में दीखने वाले काम क्रोध, विषाद, चिन्ता, मोह आदि तामसिक वृत्त्तियों के परिणाम नहीं होते, वे तो शुद्ध सत्त्व की ऊँची अनुभूतियाँ होती हैं, जिनका स्वरूप बतलाया नहीं जा सकता। भूल से लोग अपने तामस विकारों को उनकी श्रेणी में ले जाकर ‘प्रेम’ नाम को कलंक्ति करते हैं।
वे तो बहुत ही ऊँचे स्वर की साधना के फलस्वरूप होती हैं। उनमें-हमारे अन्दर पैदा होने वाली भोग-वासना की सूक्ष्म और स्थूल तमोगुणी वृत्तियों का कहीं लेश भी नहीं होता। बहुत ऊँची स्थिति में पहुँचे हुऐ महात्मा लोग ही उनका अनुभव कर सकते हैं, वे कथन में आने वाली चीजें नहीं हैं- कहना-सुनना तो दूर रहा, हमारी मोहाच्छन्न् बुद्धि उनकी कल्पना भी नहीं कर सकती। भगवत्कृपा से ही उनका अनुमान होता है तभी उनकी अस्पष्ट-सी झाँकी होती हैं। इस अस्पष्ट झाँकी में ही उनकी इतनी विलक्षणता प्रतीत होती है कि जिससे यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि ये चीजें दूसरी ही जाति की हैं।

नाम एक-से हैं-- वस्तुगत भेद तो इतना है कि उनसे हमारी लौकिक वत्त्तियों का कोई सम्बन्ध ही नहीं जोड़ा जा सकता, तुलना ही नहीं होती। भगवान की कृपा से- इस प्रेम मार्ग में कौन कितना आगे बढ़ा होता है, कौन किस स्तर पर पहुँचा होता है, यह बाहर की स्थिति देखकर कोई नहीं जान सकता; क्योंकि यह वस्तु बाहर आती ही नहीं। यह तो अनुभव रूप होता है। जो बाहर आती है, वह तो प्रायः नकली होती है। जिसे हम अप्रेमी मानते हैं, सम्भव है वह महान प्रेमी हो। जिसे हम दोषी समझतें हैं, सम्भव है वह प्रेममार्ग पर बहुत आगे बढ़ा हुआ महात्मा हो; और जिसे हम प्रेमी समझ बैठते हैं, सम्भव है वह पार्थिव मोह में ही फँसा हों। भगवत्प्रेमियों को कोटिशः नमस्कार है। उनकी गति वे ही जानें। सीधी और सरल बातें जो करने की हैं, वे तो ये सात है-

भोगों मे वैराग्य की भावना।
कुविचार, कुकर्म, कुसगं का त्याग।
विषय-चिन्तन का स्थान भगवच्चिन्तन को देने की चेष्टा।
भगवान का नाम-जप।
भगवद्गुण-गान-श्रवण।
सत्यसंग-स्वाधयाय का प्रयत्न।
भगवात्कृपा में विश्वास बढ़ाना।
वस्तुतः बाहरी एकान्त का महत्त्व नहीं; सच्चा एकान्त तो वह है, जिसमें एक प्रभु को छोड़कर चित्त के अंदर और कोई कभी आये ही नहीं-शोक-विषाद, इच्छा-कामना आदि की तो बात ही क्या, मोक्षसुख भी जिस एकान्त में आकर बाधा न डाल सके।जबतक चित्त में नाना प्रकार के विषयों का चिन्तन होता है, तब तक एकान्त और मौन दोनों ही बाह्म हैं और महत्व भी उतना ही है, जितना केवल बाहरी दिखावे के लिये होने वाले कार्यो का होता है। उन प्रेमी महापुरूषों को धन्य है जो एकमात्र श्रीकृष्ण के ही रंग में पूर्ण रूप् से रँग गये हैं, जिनका चित्त जगत के विनाशी सुखों की भूलकर भी खोज नहीं करता, जिनकी चित्त वृत्ति संसार के ऊँचे-से-ऊँचे प्रलोभन की ओर भी कभी दृष्टि नहीं डालती, जिनकी आँखें सर्वत्र प्रियतम श्यामसुन्दर के दिव्य स्वरूप को देखती हैं और जिनकी सारी इन्द्रियाँ सदा केवल उन्हीं का अनुभव करती हैं। सच्चा एकान्तवास और सच्चा मौन उन्हीं प्रेमी महात्माओं में है। भाई जी ।

Wednesday, 3 August 2016

साधन जगत के चार राज्य 1 भाई जी

साधन-जगत में प्रधानतया उत्तरोत्तर विलक्षण चार राज्य हैं -

कर्मराज्य
भावराज्य
ज्ञानराज्य
महान परम भावराज्य।
इस रस हेतु कृपया लेख पूरा पढियेगा ...
महान परम भावराज्य इसी के अनुसार साधकों के स्वरूप हैं, साध्य-स्वरूप हैं और दिव्य लोकादि हैं। कर्मप्रवण पुरुष कर्मराज्य में श्रौत-स्मार्त वैध कर्मों के द्वारा कर्म-साधन करते हैं। सकाम भाव होने पर वे स्वर्गादि पुनरावर्ती लोकों में जाते हैं और सर्वथा कामना रहित होने पर ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ को प्राप्त होते हैं। इनके तत्त्व ज्ञान की स्थिति में लोक की कल्पना नहीं है और कर्म तत्त्व की दृष्टि से सृजन-पालन-संहार करने वाले सर्वशक्तिमान सर्वनियन्ता ईश्वर के सांनिध्य में इनका कर्म जगत में कार्य चलता रहता है। इनमें कोई-कोई साधक सिद्धि प्राप्त करके ब्रह्मा के पद तक पहुँच जाते हैं और मूल परम तत्त्व के अंशावतार विभिन्न ब्रह्माण्डाधिपति सृजनकर्ता ब्रह्मा, पालन कर्ता विष्णु तथा संहार कर्ता रुद्रों में कहीं ‘ब्रह्मा’ का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं।

इससे उच्चतर या आगे ‘भावराज्य’ है, वहाँ कर्म के साथ केवल निष्काम भाव की प्रधानता न होकर ईश्वर-प्रीति साधक भक्ति की प्रधानता होती है। भावुक पुरुष इस भावराज्य के क्षेत्र में भाव साधना के द्वारा अपने भावानुरूप इष्टदेव परमैश्वर्य-सम्पन्न, स्वशक्तियुक्त भगवत्स्वरूपों के सांनिध्य और उनके दिव्य लोकों को प्राप्त करते हैं। इनकी साधना का फल दिव्य भगवल्लोकों की प्राप्ति है। ये भी सर्वथा मायामुक्त होते हैं।
इससे आगे ज्ञान राज्य है। इसमें विचार-प्रधान पुरुष साधन-चतुष्टयादि के द्वारा महावाक्यों का अनुसरण करके विशुद्ध आत्म स्वरूप में परिनिष्ठित होते हैं। इनके प्राणों का उत्क्रमण नहीं होता। ये ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं या ब्रह्मसायुज्य को प्राप्त करते हैं।
इससे आगे एक महाभावरूप ‘भगवद्भाव-राज्य’ है। भुक्ति-मुक्ति, कर्म-ज्ञान आदि की वासना से शून्य पुरुष ही इस परम ‘भावराज्य’ के अधिकारी होते हैं। उपर्युक्त तत्त्वज्ञानी मुक्त पुरुषों में भी किन्हीं-किन्हीं में ‘भगवत्प्रेमांकुर का उदय हो जाता है, जिससे वे दिव्य शरीर के द्वारा उपर्युक्त कर्म-भाव-ज्ञान-राज्य से अतीत भगवद्भाव-राज्य में प्रवेश करके प्रियतम भगवान के साथ लीला विहार करते हैं या उनकी लीला में सहायक-सेवक होकर उनके सुख में ही अपने भिन्न स्वरूप को विसर्जित कर नित्य सेवारत रहते हैं; परंतु भोग-मोक्ष की कामना-गन्ध-लेश से शून्य, सर्वात्मनिवेदनकारी महानुभावों का ही इसमें प्रवेश होता है; चाहे वे पवित्र त्यागमय प्रेमस्रोत में बहते हुए सीधे ही यहाँ पहुँच जायँ अथवा उपर्युक्त ज्ञान-राज्य में ज्ञान प्राप्त होने के अनन्तर किसी महान कारण से इस सर्वविलक्षण महाभाव रूप परम दुर्लभ राज्य में प्रवेश प्राप्त करें।
इस भावराज्य में नित्य-निरन्तर भाव मय सच्चिदानन्दघन दिव्य प्रेम रस-स्वरूप श्रीराधा-कृष्ण का भाव मय नित्य लीला-विहार होता रहता है। गोपी-प्रेम की उच्च स्थिति पर पहुँचे हुए गोपी हृदय महापुरुष तथा श्रीराधा की कायव्यूहरूपा नित्यसिद्धा तथा विविध साधनों द्वारा यहाँ तक पहुँची हुई अन्यान्य गोपांगनाओं का उनमें नित्य सेवा-सहयोग रहता है। इसी को ‘गो-लोक’ या ‘नित्य प्रेम धाम’ भी कहते हैं। यह ‘भावराज्य’ ज्ञानराज्य से आगे का या उससे उच्च स्तर पर स्थित है। प्रेमी महानुभावों ने तो भगवत्कृपा से, ‘स्वयं भगवान’ श्रीकृष्ण के द्वारा सखा-भक्त अर्जुन के प्रति उपदिष्ट गीता में भी इसके संकेत प्राप्त किये हैं। कुछ उदाहरण देखिये - तेरहवें अध्याय में भगवान ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, ज्ञान-ज्ञेय के स्वरूप का वर्णन किया है। उसमें सर्वत्र व्याप्त सगुण निराकार तथा ज्ञानगम्य ब्रह्मस्वरूप का उपदेश करने के बाद वे कहते हैं—

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद् विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।
“इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान, ज्ञेय संक्षेप में कहे गये हें। इन क्षेत्र-ज्ञान-ज्ञेय को जानकर मेरा भक्त ‘मेरे भाव’ को प्राप्त होता है।”
चतुर्थ अध्याय में भगवान कहते हैं—

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।
“बहुत-से रोग-भय-क्रोध से रहित, ज्ञानरूप तप से पवित्र, मुझमें तन्मय, मेरे आश्रित पुरुष ‘मेरे भाव’ को प्राप्त हो चुके हैं।” अठारहवें अध्याय में स्पष्ट शब्दों में भगवान ने कहा है—

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्ति लभते पराम्।।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।
‘ब्रह्मभूत होकर प्रसन्नात्मा पुरुष न तो शोक करता है न आकांक्षा करता है अर्थात ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त होकर शोक-कामना से रहित प्रसन्नात्मा— आनन्दस्वरूप हो जाता है तथा सब भूतों में सम हो जाता है; तब वह मेरी पराभक्ति को प्राप्त करता है। उस भक्ति से यानी परा ज्ञाननिष्ठा से जैसा जो कुछ मैं हूँ, उस मुझको तत्त्व से जानकर तदनन्तर मुझमें प्रवेश कर जाता है।’ अभिप्राय यह कि ब्रह्मस्वरूप समदर्शी शोकाकांक्षारहित उच्च स्थिति पर पहुँच जाने पर भी भगवान के ‘यः यावान’ स्वरूप का ज्ञान और उस भावराज्य में प्रवेश शेष रह जाता है, जो पराभक्ति - प्रेमाभक्ति से ही सिद्ध होता है।
इस पराभक्ति से भगवान के जिस स्वरूप का ज्ञान होकर जिस भावराज्य की लीला में प्रवेश प्राप्त होता है, भगवान का वह स्वरूप भी अद्वय अक्षर ज्ञान तत्त्व ब्रह्म से (तत्त्वतः एक होने पर भी) असाधारण विलक्षण है। इसका भी संकेत गीता की भगवद्वाणी में स्पष्ट है—

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।[1]
‘सहस्त्रों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिये – तत्त्व ज्ञान के लिये प्रयत्न करता है। उन यत्न करते हुए सिद्ध – सिद्धि प्राप्त पुरूषों में कोई एक मुझको तत्त्व से जानता है।’ यहाँ के ‘तत्त्वतः वेत्ति’ से उपर्युक्त ‘तत्त्वतः अभिजानाति’ का और यहाँ के ‘सिद्धि’से उपर्युक्त श्लोक के ‘ब्रह्मभूत’ का सर्वथा साम्य है। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान तत्त्व ब्रह्म की अपेक्षा ‘माम्’ शब्द के वाच्य भगवान विलक्षण हैं।
पंद्रहवें अध्याय में दो प्रकार के पुरुषों का वर्णन करते हुए भगवान अपने को ‘क्षर’ पुरुष से अतीत और ‘अक्षर’ पुरुष से उत्तम ‘पुरुषोत्तम’ बताते हैं और इस कथन को ‘गुह्यतम’ कहते हैं। ‘अक्षर’ क्या है, यह भगवान के शब्दों से ही स्पष्ट है - ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’[2] - परम ब्रह्म अक्षर है। इससे भी अत्यन्त स्पष्ट भगवान की उक्ति है—

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।[3]
‘अव्यय ब्रह्म, अमुत, नित्य धर्म और ऐकान्तिक सुख (- ये चारों ब्रह्म के वाचक हैं) की मैं ही प्रतिष्ठा हूँ।’
इससे सिद्ध है कि ज्ञान राज्य से यह महा ‘भावराज्य’ विलक्षण है और ज्ञान गम्य ज्ञानतत्त्व ‘ब्रह्म’ से भगवान श्रीकृष्ण विलक्षण हैं। क्रमश: ...