Monday, 4 July 2016

प्रेमतत्व भाग 2

प्रेमतत्त्व 2

जैसे प्रकाश की अन्यत्र सातिशयता और व्यभिचारिता होने पर भी सूर्य में उसका व्यभिचार या सातिशयता सम्भव नहीं है, वैसे ही अन्यत्र प्रेम का व्यभिचार और सातिशयता देखी जाती है, परन्तु भगवान में व्यभिचार और सातिशयता नहीं है। पुत्र, कलत्रादिकों में कभी प्रेम, कभी बैर भी हो जाता है, कभी प्रेम की कमी, कभी अधिकता हो जाती है, परन्तु भगवान में वह सदा होता है और सर्वदा निरतिशय होता है, क्योंकि जैसे सूर्य प्रकाश के उद्गम-स्थान या प्रकाशस्वरूप ही हैं, वैसे ही भगवान ही प्रेम के उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप ही हैं। कहा जाता है कि भगवान और उनमें प्रेम प्रत्यक्ष नहीं है, फिर भगवान में अव्यभिचारी और निरतिशय प्रेम या उन्हें प्रेमस्वरूप कैसे माना जाय? परन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भगवान सर्वप्रकाशक, अखण्ड बोध रूप से, प्रत्यगात्मा रूप से प्रसिद्ध हैं। अतएव उनमें प्रेम भी प्रसिद्ध है। केवल अनिर्वचनीय आवरण मिटाने के लिये ही कुछ प्रयत्नों की अपेक्षा है।

विज्ञान से सारी वस्तुओं का व्यवहार होता है। सम्पूर्ण वस्तु, सम्पूर्ण व्यवहार बोध से ही प्रकाशित होता है। फिर बोध में क्या सन्देह? “जगत् प्रकाश्य, प्रकाशक रामू” जैसे दर्पणदर्शन के पश्चात् तदन्तर्गत प्रकाशित होती हैं-“तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।” जैसे तरंग व्यामोह से ही कह सकती है कि “जल कहाँ है? जो कुछ है, मैं ही हूँ” वैसे ही जीव व्यामोह से ही कह सकता है कि “भगवान कहाँ? जो कुछ है मैं ही हूँ।” जैसे तरंग के भीतर, बाहर, मध्य में, किं बहुना तरंग का अस्तित्व ही जल पर निर्भर हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् में, विशेषतः जीव में, उसके भीतर, बाहर, मध्य में सर्वत्र भगवान ही हैं। वस्तुतः सम्पूर्ण विश्व या जीव भगवान की सत्ता से ही सत्ता-वाले हैं, उनका पृथक् अस्तित्व ही नहीं है।

प्राणी को अपने प्राणों में, सुख में, अपनी आत्मा में स्वाभाविक प्रेम होता है, भगवान तो प्राणों के प्राण, सुख के सुख और जीवों के भी जीवन हैं। फिर उनमें प्रेम स्वाभाविक क्यों न हो? इसीलिये तो महर्षि वाल्मीकि कहते हैं-“लोके न हि स विद्येत यो न राममनुव्रतः।” अर्थात् लोक में कोई भी जन्तु या कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो राम का भक्त न हो।

वशिष्ट कहते हैं-“प्राण प्राण के, जीव के जिय तुम तजि जिनहिं सुहात गृह, तात तिनहिं विधि बाम।” अर्थात् हे तात! राघवेन्द्र रामभद्र! तुम्हीं तो प्राणों के प्राण, जीवों के जीवन और आनन्द के भी आनन्द हो। प्राण से या अपान से प्राणी नहीं जीता, किन्तु प्राणी में प्राणन शक्ति देने वाला प्राण का भी प्राण भगवान ही सबको जिलाता है। फिर तुमको छोड़कर जगत् किसे अच्छा लगे? इस दृष्टि से रावणादि भी राम के भक्त ही हैं। भला अपनी सत्ता का कौन विरोधी होगा?

नास्तिक भी अपनी और अपने सिद्धान्त की सत्ता का बाध या अपलाप नहीं चाहता या करता। हर एक व्यक्ति का निश्चय है कि और कुछ हो या नहीं, रहे या न रहे, मैं तो हूँ ही, मैं तो रहूँ हो। जैसे जल के बिना तरंग क्षणभर भी टिक ही नहीं सकती, वैसे ही सत्ता के बिना सम्पूर्ण पदार्थ असत् हो जाते हैं। सत्, चित्, आनन्द रसस्वरूप भगवान के बिना सब निःस्फूर्ति, नीरस, निरानन्द, किं बहुना असत् हो जाते हैं। उनके योग से ही-आध्यात्मिक सम्बन्ध से ही-स्फूर्तिमत्ता, सरसता, सानन्दता और अस्तित्व सिद्ध होता है। अतः उनका अमंगलमय वियोग किस सह्य होगा? जैसे गुड़ के सम्बन्ध से नीरस बेसन में मिठास आती है, वैसे ही ‘स्व’ के सम्बन्ध से-अपनेपन के सम्बन्ध से-वस्तुओं में प्रीति होती है। अपनेपन के बिना कट्टर वैष्णवों को भगवान शिव में और शैवों को विष्णु में भी प्रेम नहीं होता।

अनन्त ब्रह्माण्डनायक भगवान के ही जिस रूप में अपनापन, अपना उपास्यभाव, होता है, उसी में प्रेम होता है। जिसमें उपास्यबुद्धि, इष्टबुद्धि नहीं, जिसमें अपनापन नहीं, उसमें प्रेम भी नहीं। अपनापन होने से अपने क्षेत्र, वृक्ष की बाग के काँटों में भी प्रेम होता है, उनके नष्ट होने में कष्ट होता है। जिस अपनेपन के बिना ब्रह्म भी नीरस, जिस अपनेपन के सम्बन्ध से कण्टकादि में भी पे्रम, साक्षात् उस अपने में, “स्व” में प्राणी का कितना प्रेम हो सकता है? इसीलिये भगवान प्राण के प्राण, जीव के जीवन, आनन्द के आनन्द, प्रत्यक्ष स्वात्मा है, अतएव प्रेम या रसस्वरूप ही है। जो वस्तु जितनी अप्रत्यक्ष, दूर और अपने से भिन्न हैं, उसमें उतनी ही प्रेम को कमी होती है। क्षेत्र, मित्र, पुत्र, कलत्र आदि में दूरस्थ, अप्रत्यक्ष तत्वों की अपेक्षा अधिक प्रेम होता है।

देह विरुद्ध होने से उन सबका ही त्याग किया जाता है, क्योंकि उनकी अपेक्षा देह सन्निहित एवं प्रत्यक्ष है। देह से भी इन्द्रियाँ, प्राण अन्तरंग है, अतः उनमें प्रेम अधिक होता है। मन उनसे भी समीप है, अतः उसके प्रतिकूल या उसे दुःखदायी मालूम पड़ने पर देहादि का भी त्याग किया जाता है।

बुद्धि, अहमर्थ का भी निरोध आत्महित के लिये किया जाता है। “यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह, बुद्धिश्च न विचेष्टते’ इत्यादि से मनोनाश, वासना-क्षय के लिये प्रयत्न प्रसिद्ध ही है। इस दृष्टि से सर्वान्तरंग, सर्वसन्निहित, परम प्रत्यक्ष, प्रत्यगात्मस्वरूप ही भगवान हैं। आत्मा में मुख्य प्रेम और वही प्रेमस्वरूप भी है, उनसे भिन्न में प्रेम की कमी स्पष्ट है। आत्मा के लिये ही सब कुछ होता है, देवता में प्रीति भी आत्मा-कल्याण के लिये ही होती है, आत्मा-प्रतिकूल देवता की उपेक्षा ही होती है।

यदि भगवान प्रत्यगात्मस्वरूप नहीं, तब तो भगवान ‘शेष’ (अंग) हो जायेंगे, भगवान के लिये आत्मा नहीं, किन्तु भगवान आत्मा के लिये समझे जायेंगे, अतः भगवान परोक्ष होने से अस्वप्रकाश समझे जायेंगे, भगवान अनात्मा होने से बहिरंग और शेष या अंग समझे जायेंगे, यह सब अनर्थ है, क्योंकि सिद्धान्ततः वस्तुगत्या भगवान ही सर्वान्तरंग, सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सर्वशेषी हैं, सब कुछ उनके लिये, वे किसी के लिये नहीं। भगवान ही प्रत्यगात्मा होने से स्वप्रकाश और वे ही शेषी हैं, वे ही निरतिशय, निरूपाधिक परप्रेम के आस्पद हैं। इसीलिये तो जैसे सैन्धवखिल्य (सेंधानमक का टुकड़ा) अपने आपको अपने उद्गम-स्थान समुद्र में समर्पण कर समुद्ररूप हो जाता है, वैसे ही औपाधिक चैतन्यरूप जीवात्मा अपने उद्गम-स्थान परप्रेमास्पद भगवान में आत्मसमर्पण करके भगवत्स्वरूप हो जाता है।

जैसे घटाकाश घट और घटाकाश सबको ही महाकाश में समर्पण कर देता है। -“त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम्” (जब आकाश से ही वायु आदि-क्रम से घट बना, उसी से घटाकाश की प्रतीति हुई, घट पृथिव्यादि में लय क्रमेण आकाश हो गया, तब घटाकाश सुतरां आकाश हो गया, यही सच्चा आत्मसमर्पण है), वैसे ही जीवात्मा भगवान से प्रादुर्भूत अपना सर्वस्व और अपने आपको भगवान में समर्पण करके सर्वदा के लिये सर्वशेषी, सर्वान्तरंग, सर्वप्रेमास्पद, सर्वान्तरात्मस्वरूप हो जाता है।

अपने मिथ्या, काल्पनिक भाव का सर्वदा के लिये बाध कर, पारमार्थिक रूप को प्राप्त कर लेता है। इस तरह औपाधिक प्रेम सापेक्ष, सातिशय होने पर भी निरुपाधिक प्रेम भेद-निरपेक्ष, स्वप्रकाश, सर्वान्तरात्मा भगवान् का स्वरूप ही है और वह स्वतःसिद्ध है। केवल उसके प्राकटय के लिये ही प्रयत्न की अपेक्षा होती है। जैसे ब्रह्माकार वृत्ति की कोमलता, दृढ़ता से नित्यसिद्ध परमात्मस्वरूप-ज्ञान में भी कोमलता और दृढ़ता का व्यवहार होता है, वैसे ही है।

प्रेम में भी कोमलता, दृढ़ता से नित्य सिद्ध परमात्मस्वरूप-ज्ञान में भी कोमलता और दृढ़ता का व्यवहार होता है। प्रेम में भी कोमलता, दृढ़ता और उत्पत्ति का उपचार ही है। आमाम्र (कच्चा आम) पक्वाम्र का हेतु समझा जाता है, वैसे ही साधनावस्था का प्रेम साध्यावस्था के प्रेम का साधन माना जाता है। उसमें रक्षा की भी बड़ी अपेक्षा समझी जाती है।

भावुकों ने कहा है कि जैसे दीप बुझ जाता है, वैसे प्रेम के बुझ जाने का भी भय रहता है। जैसा कि किसी की उक्ति है-

“प्रेमाद्वयी रसिकयोरपि दीप एव हृद्वेश्म भासयति निश्चलमेव भाति।
द्वारादयं वदनतस्तु बहिष्कृतश्चेन्निर्वाति शीघ्रमथवा लघुतामुपैति।।”

अर्थात दोनों रसिकों के हृदय में रहने वाला प्रेम एक दीप है, वही हृदय-भवन का प्रकाशन करता है और निश्चल होकर स्वयं देदीप्यमान होता है। यदि वह मुखरूप द्वार से बाहर किया गया, तो या तो बुझ जाता है अथवा उसमें लघुता आ जाती है।

वैसे प्रेमतत्व निष्कारण बतलाया जाता है-

“आविर्भावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि,
क्षीयेताऽपि न चापराधविधिना नत्या न यो वर्द्धते।
पीयूषप्रतिवेदिनस्त्रिजगती दुःखद्रुहः साम्प्रतम्,
प्रेम्णस्तस्य गुरोः किमद्य करवै वाङ्निष्ठता लाघवम्।।”

अर्थात प्रेमदवे ने अपने प्रादुर्भाव के दिन किसी सूक्ष्मतम हेतु की भी अपेक्षा नहीं की, किसी भी अपराध के कारण उनका हृास नहीं होता और बहुत नमस्कार से उनकी वृद्धि भी नहीं होती।

पीयूष के प्रतिस्पर्धी, त्रिजगती-दुःख के द्रोही, परम गुरु प्रेम देवता को वाग्गोचर करके लघु कैसे बनाया जाय? यद्यपि लोक में प्रेम त्रिदल होता है-एक आश्रय, दूसरा विषय और तीसरा प्रेम, तथापि अन्तरंग-स्थिति में तीनों एक ही वस्तु हैं, एक ही में औपाधिक त्रैविध्य की कल्पना होती है, जैसे जल और तरंग में वास्तविक भेद न होने पर भी काल्पनिक भेद को लेकर व्यवहार होता है-

“गिरा अर्थ जल-बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न।
बन्दौं सीताराम-पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।।”

श्री भगवान् की आह्लादिनी शक्तिरूपा श्री जनकनन्दिनी तो इतनी अन्तरंग हैं, जैसे अमृत में माधुर्य। परमानन्द सुधासिन्धु भगवान् में माधुर्य सार सर्वस्व हो उनकी आह्लादिनी शक्ति है। उन्हीं का प्रेम वास्तविक प्रेम है।

प्रेमतत्व भाग 1

प्रेमतत्त्व

प्रेमतत्त्व को रसिक लोग मूकरसास्वादनवत् कहते हैं। कोई तो आन्तर मधुर वेदना को ही ‘प्रेम’ कहते हैं। कोई स्नेहात्मक अन्तःकरण की वृत्ति को ही प्रेम कहते हैं। यद्यपि वधू आदि में ‘राग’, यागादि में ‘श्रद्धा’, गुरु आदि में ‘भक्ति’, सुखादि की इच्छा, ये सभी प्रेम के ही रूप हैं, तथापि सुखमात्र का अनुवर्तन करने-वाली अन्तःकरण की सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है। यह प्राप्त, अप्राप्त और नष्ट में भी रहती है। इच्छा नष्ट और प्राप्त में नहीं होती।

प्रेम-रसज्ञ लोग रसस्वरूप परमात्मा को ही प्रेम कहते हैं। इसीलिये द्रवीभूत अन्तःकरण पर अभिव्यक्त रसस्वरूप परमात्मा ही प्रेम के रूप में प्रकट होता है। अतएव आचार्यों ने कहा है-

“भगवानृ परमानन्दस्वरूपःस्वयमेव हि।
मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलाम्।।”

अस्पृष्ट दुःख निरुपम सुखसंवित्-स्वरूप परमात्मा ही प्रेम है। यह भी कहा गया है-

“निरुपमसुखसंविद्रूपमस्पृष्टदुःखं तमहमखिलतुष्टयै शास्त्रदृष्टया व्यनज्मि।”

प्रेमियों का कहना है कि चित लाक्षा(लाख) के समान कठोर द्रव्य है। वह तापक द्रव्य के योग से कोमल या द्रवीभूत होता है। जैसे द्रवीभूत लाक्षा में निःक्षिप्त हिंगल, हरिद्रा आदि रंग स्थायीभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही द्रवीभूत अन्तःकरण पर अभिव्यक्त भगवान ही ‘भक्ति’ कहे जाते हैं। भगवान के गुणगणश्रवण से चरित्रनायक पूर्णतम प्रभु का स्वरूप प्रकट होता है। पुनश्च उनके प्रति स्नेहादि का प्रादुर्भाव होता है। स्नेहादि से चित्त में द्रवता होती है। स्नेहास्पद पदार्थ के दर्शन से उसमें संस्कार उत्पन्न होता है, अतएव पुनः-पुनः उसका स्मरण होता है। उपेक्षणीय वस्तु के संस्कार नहीं होते, इसका कारण यही है कि राग के आस्पद या द्वेष के आस्पद पदार्थ को ग्रहण करता हुआ चित्त रागादि से द्रवीभूत हुआ है, इसीलिये उसके संस्कार हो जाते हैं। उपेक्षणीय तत्व के ग्रहण-समय में चित्त द्रवीभूत नहीं होता, क्योंकि वह तापक भाव नहीं है।
प्रेमी कहते हैं कि भगवान् के उत्कट स्नेह से चित्त को इतना द्रुत करे कि वह गंगाजल के समान निर्मल, कोमल तथा द्रवीभूत हो जाय। फिर उसमें भगवान् का स्थायी रूप से प्राकटय होता है-
“मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।
मनोगतिरविच्छिन्ना तथा गंगाम्भसोऽम्बुधौ।।”
अर्थात् भगवान् के गुणों के श्रवण से भगवान् में द्रवीभूत चित्त की वृत्तियों का ऐसा प्रवाह चलता है, जैसे-कोमल, निर्मल, द्रवीभूत गंगाजल का प्रवाह समुद्र की ओर चलता है। जिस समय द्रवीभूत चित्त में पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु का प्राकटय होता है, उस समय ही स्थिर भक्ति कही जाती है।

जैसे लाक्षा के कठोर रहने पर उसमे रंग स्थिर नहीं होता, लाख की टिकिया पर मुहर का अक्षर अंकित करने के लिये भी अग्नि के सम्बन्ध से उसे कुछ कोमल किया जाता है, क्योंकि कठोर लाख पर मुहर के अक्षर अंकित नहीं होते, वैसे ही कठोर, अद्रुत चित्त पर भगवान् का स्वरूप, चरित्र, गुण तथा अन्यान्य सदुपदेश अंकित नहीं होता। परन्तु गंगाजल के समान कोमल, द्रवीभूत अन्तःकरण में भगवान् का प्राकटय होने से फिर भगवान् भी निकलने में समर्थ नहीं होते। जैसे लाक्षा के साथ एकदम मिला हुआ रंग उसमें से निकलने में समर्थ नहीं होता, लाख चाहे तो भी रंग से वियुक्त नहीं हो सकती, वैसे ही यदि भगवान् चाहें, तो भी भक्त के द्रवीभूत चित्त से निकल नहीं सकते।

भक्त भी यदि चाहे, तो भी वह भगवान् से वियुक्त नहीं हो सकता, भगवान् को अपने अन्तःकरण से निकाला नहीं जा सकता।
“विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात् हरिरवशाभिहतोऽप्यघौघनाशः।
प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः।।”

अर्थात जिसके हृदय की प्रणय-रशना से बँधे हुए भगवान् अपने को न छुड़ा सकें, वही प्रधान भक्त है।

कितने स्थलों में भक्त भगवान से कहते हैं कि यदि आप हमारे हृदय से निकल जायें, तो हम देखें आपकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता। कहीं-कहीं भक्त भी हृदय से भगवान को निकालना चाहते हैं, भगवान में दोषानुसन्धान करते हैं, परन्तु असफल होते हैं-

“प्रत्याहृदत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनोधित्सति,
वालाऽसौ विषयेषु धित्सति मनः प्रत्याहरन्ती मनः।
यस्यस्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते,
मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति।।”

अतएव कुछ लोग द्रवता को ही प्रेम कहते हैं।
यद्यपि द्रवता की अपेक्षा अवश्य है, तथापि प्रेम का स्वयं स्वरूप द्रवता नहीं है, प्रेम का निजी रूप तो रसस्वरूप परमात्मा ही है। अतएव आचार्यों ने उसे निरूपम सुखसंविद्रूप बतलाया है। जिस तरह सच्चिदानन्द ब्रह्म विश्व का कारण है, अतएव उसके सदेश, चिदेश की सर्वत्र अनुवृत्ति दिखाई देती है। ‘घटःसन्’, ‘पट.सन्’ इत्यादि रूप से सद्विशेष घटादि प्रपंच में सत् की व्याप्ति है। वैसे ही “आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि” के अनुसार आनन्द रस से भी सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है, अतएव सर्वत्र उसकी अनुवृति या व्याप्ति होनी चाहिये। इसीलिये हर एक जन्तु में, हर एक परमाणु में आनन्द, रस या रसस्वरूपभूत प्रेम की भी व्याप्ति है। बिना प्रेम या रस के एक दूसरे से मिलना नहीं हो सकता। पुत्र, कलत्र, मित्र आदि का मिलन भी रस या स्नेह से है।

पशु-पक्षियों में, पिता-माता, पुत्र, पुत्रवधू में प्रीति, स्नेह होता है। किं बहुना एक परमाणु का दूसरे परमाणु से मिलना भी बिना स्नेह के नहीं हो सकता। इस तरह प्रेम तत्व आनन्द या रसस्वरूप होने से विश्व का कारण है, इसलिये उसकी व्याप्ति है। वह सर्वत्र और सबके पास है। उसका दुरुपयोग करने से अर्थात् केवल सांसारिक वस्तुओं में ही प्रेम करने से, दुःख होता है। भगवान में उसका सम्बन्ध जोड़ते ही सारा विश्व आनन्दमय, मंगलमाय हो जाता है। इसीलिये प्रेमियों ने चाहा है कि संसार से प्रेम हटकर भगवान में ही हो जाय-“नाते नेह जगत् के सब रे बटुरि होंहु इक ठाईं। यह बिनती रघुबीर गुसाई।”

जैसे किसी के पास कोई दिव्यशक्तिसम्पन्न क्षेत्र हो, परन्तु वह उसमें दौर्गन्ध्य-विष-कण्टकादिपूर्ण विष-वृक्ष को लगाकर दौर्गन्ध, विष, कण्टकादि से दुःख पाता है, यदि हिम्मत बाँधकर सावधानी से वृक्ष को काटकर सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्यपूर्ण आम्र फल या कल्पवृक्ष को लगाये, तो अवश्य सुखी हो जाय। ठीक वैसे ही प्रेम को संसार के साथ जोड़कर, प्रेम में लौकिक भावों को जोड़कर, प्राणी दुःखी होता है। प्रेम के साथ भगवान् का सम्बन्ध जोड़ते ही सर्वत्र आनन्द ही आनन्द हो जाता है। जैसे कोई कल्याणमयी, करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशु को कहीं भेजती हुई उसे ऐसे पाथेय का अवश्य प्रदान करती है, जिसके सहारे वह पुनः अपनी अम्बा के पास आ जाय, यदि ऐसा न ध्यान रखे, तो उसे “करुणामयी” नहीं कहा जा सकेगा।

वैसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड जननी कृष्णाभिधाना माँ ने भी जीवों को प्रेम तत्त्व साथ में ही दे रखा है। उसे भूल जाने से या उसका दुरुपयोग करने से जीव दुःख पाता है। परन्तु उसको याद कर उसका सदुपयोग करते ही अर्थात् गुरुजनों, शास्त्रों एवं भगवान् में प्रेम का उपयोग करने से जीव कृतकृत्य होकर अपनी कृष्णाभिधाना माँ के अंक (गोद) में जा पहुँचता है, सर्वदा के लिये कृतकृत्य हो जाता है। कहा जा सकता है कि यदि रस, प्रेम और भगवान् एक हैं और नित्य सिद्ध ही है, तो भगवान् में प्रेम को ‘प्रेम’ और अन्य प्रेमास्पद में विषय-विषयीभाव-कल्पना की क्या अपेक्षा है? इससे तो मालूम पड़ता है कि प्रेम के लिये भेदभाव की ही अपेक्षा है। बिना दो के प्रेम नहीं होता, अतएव प्रेम और भगवान् भी दो वस्तु होनी चाहिये।

परन्तु गम्भीरता से विवेचन करें, तो मालूम होगा कि आरम्भकाल में औपाधिक प्रेम के लिये अवश्य ही दो की अपेक्षा किंवा अभिव्यक्ति के लिये साधन की अपेक्षा है, परन्तु स्वभावतः प्रेम अभेद में या अत्यन्त सन्निहित प्रत्यगात्मा में ही होता है और वह स्वतः सिद्ध भी है। जैसे स्वप्रकाश ब्रह्म के प्राकटयार्थ भी महावाक्यजन्य परब्रह्माकाराकारित वृत्ति की अपेक्षा होती है, वैसे ही भगवत्स्वरूप, स्वतः सिद्ध प्रेम के भी प्राकटय के लिये भगवदाकाराकारित स्निग्ध मानसी वृत्ति अपेक्षित है। उस प्राकटय के लिये ही सद्धर्म, सत्कर्म आदि साधनों की अपेक्षा है। प्राकटय-भेद से ही उसके अणु, मध्यम, महत् एवं परममहत्परिमाण-भेद से अनेक भेद भी होते हैं। साधनकाल में ही भेदभाव की अपेक्षा होती है। अज्ञान के कारण ही भगवान् में प्रेम ने होकर विश्व में हेाता है। या यों समझिये कि नीरस, निःसार संसार में रसस्वरूप भगवान् के सम्बन्ध से ही सरसता की प्रतीति होती है, अतः सरसत्वेन प्रतीयमान विश्व में प्रेम होता है।

Sunday, 3 July 2016

भजन की नित्यता

*हरे कृष्ण💐*

*एक हाथी है उसे नहला धुला कर छोड़ दो तब फिर वह क्या करेगा ? मिट्टी में खेलेगा और अपने शरीर को फिर गन्दा कर लेगा, कोई उस पर बैठे तो उसका शरीर भी गन्दा अवश्य होगा । लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद पक्के बाड़े में बाँध दिया जाये ?-तब फिर हाथी अपना शरीर गन्दा नहीं कर सकेगा ।*

*मनुष्य का मन भी हाथी के समान है एक बार ध्यान साधन और भगवान् के भजन से वह शुद्ध हो गया तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिये । इस संसार में पवित्रता भी है, मन का स्वभाव है वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा इसलिये उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिये एक बाड़े की जरूरत होती है जिसमें वह घिरा रहे । गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके ।*

*ईश्वर का भजन उसका निरन्तर ध्यान एक बाड़ा है जिसमें मन को बन्द रखा जाना चाहिये, तभी साँसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव सम्भव है। भगवान् को बार-बार याद करते रहोगे तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी । उस समय दूषित वासनाओं में पड़ने से स्वतः भय उत्पन्न होगा और मनुष्य उस पापकर्म से बच जायेगा जिसके कारण वह बार-बार अपवित्रता और मलिनता उत्पन्न कर लिया करता है ।*
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भावों की विभिन्न दशाएं

भावो की विभिन्न दशाएँ
.
भावो की चार दशा बताई गई है – १.भावोदय, २.भावसन्धि, ३.भावशावल्य और ४.भावशान्ति

१. - किसी कारण विशेष से हृदय में जो भाव उत्पन्न होता है उसे ‘भावोदय’ कहते है.

२. - हृदय में जब दो भाव आकर मिल जाते है तो उसे ‘भावसन्धि’ कहते है.

३.- बहुत से भाव जब एक साथ उदय हो जाये तब उसे ‘भावशावल्य’ कहते है .

४. - इसी प्रकार जब इष्ट वस्तु के प्राप्त हो जाने पर जो एक प्रकार की संतुष्टी हो जाती है उसे ‘भावशान्ति’ कहते है.जैसे रास में अन्तर्धान हुए श्रीकृष्ण सखियों को सहसा मिल गये उस समय उनके अदर्शन से जो विरहभाव था वह शांत
हो गया.

इन सब बातो का असली तात्पर्य यही है कि हृदय में किसी की लगन लग जाये . दिल में कोई धस जाये, किसी की रूप माधुरी आँखो में समा जाये, एक बार उस प्यारे की लगन लगनी चाहिये.  फिर भाव, महाभाव अधिरुढभाव तथा सात्विक विकार और विरह की दशाएँ तो अपने आप उदित होगी. उस तडफडाहट के लिये प्रयत्न ना करना होगा. किन्तु हृदय किसी को स्थान दे तब न, उसमे तो काम क्रोधादि चोरों को स्थान दे रखा है .

इन सब बातो का असली तात्पर्य यही है कि हृदय में किसी की लगन लग जाये . दिल में कोई धस जाये, किसी की रूप माधुरी आँखो में समा जाये, एक बार उस प्यारे की लगन लगनी चाहिये फिर भाव, महाभाव अधिरुढभाव तथा सात्विक विकार और विरह की दशाएँ तो अपने आप उदित होगी. उस तडफडाहट के लिये प्रयत्न ना करना होगा. किन्तु हृदय किसी को स्थान दे तब न, उसमे तो काम क्रोधादि चोरों को स्थान दे रखा है.

भक्ति के भी बहुत से प्रकार होते है.आंरभ में साधन भक्ति होती है, साधन भक्ति से रति भक्ति होती है और रति भक्ति से शुद्धा भक्ति या प्रेम रूपा भक्ति होती है .

रति भक्ति के पाँच भेद बताये गये है–

१.शान्ति रति

२.दास्य रति

३.सख्य रति

४.वात्सल्य रति

५.मधुर रति


१.शान्ति रति – शांत रस के उपासको में शुकदेव जी और जनक जी है,शान्ति रस में अपने को छोटा  मानने की भावना होती है .


२.दास्य रति – दास्य रति में अपने को छोटा समझकर विविध प्रकार से अपने सेव्य की सेवा चाकरी  करने की इच्छा होती है.


३.सख्य रति - सख्य रति का उपासक अपने को छोटा मानता है सेवा भी करता है, किन्तु उपास्य के  सन्मुख निसंकोच भाव से बर्ताव करता है,वह शांत और दास्य उपासको की भाँती डरता नहीं है.


४.वात्सल्य रति - वात्सल्य रूप से उपासना करने वाले मन ही मन में अपने प्रिय को ही श्रेष्ट समझते  है. ऊपर से व्यक्त नहीं करते, सेवा भी करता,और निसंकोच भी रहते है.उनमे इन तीनो उपासको की अपेक्षा अपने सेव्य के प्रति एक स्वाभाविक ममता भी होती है,यही इस रस में विशेषता है .


५.मधुर रति – कान्त भाव में ये पाँच बाते होती है 

१. अपने सेव्य को मन से बड़ा भी मानते है .

२. सेवा करने की भी उत्कट इच्छा रहती है .

३. उसके सन्मुख किसी प्रकार का संकोच भी नहीं होता .

४. प्रगाण  ममता भी होती है .

५. अपने शरीर तथा शरीर की सम्पूर्ण चेष्ठाओ,क्रियाओं को प्यारे के ही लिये   समर्पित कर दिया जाता है . इसलिए कान्त भाव ही सर्वश्रेष्ठ है . 

इन उपासना के उपासक करोडो़ में तो क्या असंख्यो में भी कोई एक होता है. शांत सख्य,आदि के उपासकही जब दुर्लभ है तब कान्त भाव के उपासको के लिये तो कहना ही क्या .

"जय जय श्री राधे "

पलटू सोइ सुहागनी, हीरा झलके माथ , कृपाशंकर जी

पलटू सोइ सुहागनी, हीरा झलके माथ .....
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संत पलटूदास जी कह रहे हैं कि सुहागन वो ही है जिसके माथे पर हीरा झलक रहा है| अब यह प्रश्न उठता है कि सुहागन कौन है और माथे का हीरा क्या है ?
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वह हीरा है ब्रह्मज्योति का जो हमारे माथे पर कूटस्थ में देदीप्यमान है|
सुहागन है वह जीवात्मा जो परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित है|
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"मन मिहीन कर लीजिए, जब पिउ लागै हाथ .....
जब पिउ लागै हाथ, नीच ह्वै सब से रहना |
पच्छापच्छी त्याग उंच बानी नहिं कहना ||
मान-बड़ाई खोय खाक में जीते मिलना |
गारी कोउ दै जाय छिमा करि चुपके रहना ||
सबकी करै तारीफ, आपको छोटा जान |
पहिले हाथ उठाय सीस पर सबकी आनै ||
पलटू सोइ सुहागनी, हीरा झलकै माथ |
मन मिहीन कर लीजिए, जब पिउ लागै हाथ ||"
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परमात्मा को पाना है, तो उसी मात्रा में परमात्मा मिलेगा जिस अनुपात में हमारा मन सूक्ष्म होगा| सूक्ष्म यानी अहंकार के मिट जाने की दिशा में यात्रा|
जिस दिन मन पूरा शून्य हो जाता है, उसी से दिन हम परमात्मा हैं| फिर प्रेमी में और प्यारे में फर्क नहीं रह जाता, भक्त और भगवान में फर्क नहीं रह जाता|
फर्क एक शांत झीने से धुएँ के पर्दे का है, मगर हम अपने अंतर में कोलाहल रूपी बड़ा मोटा लोहे का पर्दा डाले हुए हैं, और उसमें बंदी बनकर चिल्लाते हैं कि भगवान तुम कहाँ हो| उस कोलाहल को शांत करना पड़ेगा|
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जब गंगाजल मिल सकता हो तो तुम क्यों किसी गंदी नाली का जल पीते हो?
नृत्य ही देखना हो अपने अंतर में तो मीरां का नृत्य देखो, भगवन नटराज का नृत्य देखो|
गीत ही सुनना हो तो किसी भक्त कवि का गीत सुनो|
जब तक मनुष्य अपने अहंकार अर्थात अपनी 'मैं' को नहीं त्यागता तब तक उसे परमात्मा कि प्राप्ति नहीं हो सकती|
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हमें सुहागन भी बनना है और माथे पर हीरा भी धारण करना है| हमारा सुहाग परमात्मा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

धन्य है श्रीकृष्ण की लीला , करपात्री जी

भक्तों को भगवत्प्रेम का उन्माद, वियोग-संयोग दोनों अवस्थाओं में होता रहता है। भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहने वाली, श्रीकृष्ण से विहार करने वाली द्वारिका की श्रीकृष्ण-पत्नियों का मन भगवान की लीला में इतना तन्मय हो जाता है कि उन्हें स्मरण ही नहीं रहता कि हम श्रीकृष्ण के समीप हैं। एक ही समय उन्हें कभी दिन को प्रतीत होती है, कभी रात्रि की। वे न जाने क्या-क्या बोल रही हैं- हे पक्षी! तू इस समय इस नीरव नीशीथ में क्यों जग रहा है? इस विलाप का क्या अर्थ है? क्या श्रीकृष्ण को मुसकान और चितवन ने तुझ पर भी जादू डाल दिया है?
हे चकती! तू आँखे बन्द करके किसे प्रणय का आमन्त्रण दे रही है? क्या तू भी हमारे समान ही श्रीकृष्ण के चरणों पर समर्पित की हुई पुष्पमाला को पहनना चाह रही हो? रे समुद्र! तू क्यों गरज रहा है? दिग्दिगन्त को प्रतिध्वनित कर देनेवाली तुम्हारी गम्भीर ध्वनि का क्या तात्पर्य है? क्या श्रीकृष्ण ने हमारी ही भाँति तुम्हारा भी कुछ छीन लिया है? अरे चन्द्रमा! तेरी क्या दशा हो रही है? आज रतनी को तू अपने करों से रंग उड़ेलकर क्यों नही रँग देता? क्या तू भी श्रीकृष्ण की मीठी-मीठी बातों में आकर अपना सर्वस्व खो चुका है? हे मलयानिल! हमने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है। फिर भी तुम हमारे अंग-प्रत्यंग का स्पर्श करके हृदय को क्यों गुदगुदा रहे हो? उसे तो यों ही श्रीकृष्ण की तिरछी चितवन ने टूक-टूक कर दिया है। अने घनश्याम के समान श्यामल मेघ! तू तो उसका सखा है न? उनका ध्यान करते-करते तू भी ऐसा ही हो गया है। ये तेरी बूँदें नहीं, तेरे प्रेम के तेरे आँसू हैं। अब क्यों रोता है? उनसे प्रेम करने का फल भोग ले। अरे पर्वत! तुम्हारे इस गम्भीर, मौन और अचन्चल स्थिरता का यही अर्थ है न, कि तुम हमारी ही भाँति अपने शिखरों पर उनके चरणों का स्पर्श चाह रहे हो? नदियो! क्या तुम वियोगिनी हो? हाँ, तभी तो तुम हमारी ही भाँति कृश हो रही हो। अरे हंस! आओ, आओ, तुम्हारा स्वागत है। इस आसन पर बैठो, दूध पीयो, कहो उनका कुशल-मंगल अच्छे तो हैं? वे क्या कभी हमारा स्मरण करते हैं? हम वहाँ नहीं जायेंगी। क्या वे हमारे पास नहीं आयेंगे? उसी तरह गोपियों का हृदय और उनका प्रेम अनिर्वचनीय है। वे गोपियाँ प्रेममय हैं, श्रीकृष्णमय हैं, अमृतमय हैं। उनका हृदय, उनका प्रेम, उनके भाव का अमृतमय स्त्रोत कभी-कभी स्वयं वाणी के द्वारा बाहर निकल आता है। वे जब बोलना चाहती हैं, तब बोला नहीं जाता, जब मौन रहना चाहती हैं, तब बोल जाती हैं। उनके दिव्य भाव दर्शनीय ही हैं-

हे सखी! जब सायंकाल हो जाता है, गायें व्रज में आने लगती हैं, उनके पीछे-पीछे ग्वाल-बालों के साथ बाँसुरी बजाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम व्रज में प्रवेश करते हैं, तब उनकी स्नेहभरी चितवन का रस जो लेता है, उसी का जीवन सफल है। उसी की आँखे धन्य हैं। कितना विचित्र वेष रहता है उनका-आम्र-मंजरियाँ, कोमल-कोमल पल्लव, पुष्पों के स्तबक और कमलों की माला! गोप-बालकों के बीच में गाते हुए वे एक श्रेष्ठ नट के समान जान पड़ते हैं।
गोपियों! जिस वंशी की ध्वनि सुनकर वापियों को रोमान्च हो आता है, उनमें कमल खिलने लगते हैं, वृक्षों कसे आँसू बहने लगते हैं, उनसे मद की धारा बहने लगती है। उस बाँसुरी ने कौनसी तपस्या की है? उलटे वह तो गोपियों को अधिकार छीन लेती हैं, अर्थात श्रीकृष्ण के अधरों की सुधा पी जाती है। हो-न-हो, उसका कोई महान् पुण्य अवश्य है। जब श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, तब उसी के स्वर में ताल मिलाकर मयूर नृत्य करने लगते हैं, वन्य हिंसक जीव भी अपना स्वभाव त्यागकर प्रेम में मुग्ध हो जाते हैं। उनके चरण-चिन्हों से चर्चित वृन्दावनधान सम्पूर्ण भूमण्डल के यश का विस्तार कर रहा है। जब श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, तब हरिनियाँ अपने पतियों के साथ प्रेमभरी चितवन से उनके विचित्र वेष को देखकर सम्मान करती हैं। वे पशु होने पर भी धन्य हैं। उनका मधुमय संगीत और उनके मधुर मनोहर रूपलावण्य का अवलोकन कर दिव्य देवांगनाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती हं, मूच्छ्रित हो जाती हैं। गौएँ अपने कानों को खड़ा करके उस पीयूषरस का पान करती हैं। बछड़े अपने मुँह में लिये दुए दूध को न उगल पाते हैं और न निगल ही सकते हैं, उनके हृदय में होते हैं-श्रीकृष्ण और आँखों में आँसू। वन के पक्षी लतावेष्टित तरुओं की रुचिर शाखाओं पर बैठे-बैठे आँखें बन्द करके मूक होकर श्रीकृष्ण की बाँसुरी सुना करते हैं। नदियाँ कमलों के उपहार के साथ उनके चरणों का स्पर्श करती हैं। मेघ लबिन्दुओं से पुष्पवर्षा करता हुआ उनका छत्र बन जाता है। गोवर्धन आन्दोद्रेक से फूलकर उनकी सेवा करता है। चर अचर हो जाते हैं और अचर चर हो जाते हैं। धन्य है श्रीकृष्ण की लीला!