Tuesday, 5 January 2016

विष्णुवल्लभ। "हरिहर"

विष्णुवल्लभ
यह नाम भी रामेश्वर की तरह हीं है। विष्णु के वल्लभ यानि प्रिय भगवान् सदाशिव अथवा विष्णु हैं प्रिय जिनके ऐसे शंकर। विष्णु एवं शंकर की प्रियता का क्या वर्णन किया जाए, जहाँ दोनों ही अभिन्न रूप हो जाते हैं। पुराणों में विष्णु शिव की प्रेम कथाएँ विस्तृत रूप से बिखरी पड़ी है। भगवान् शंकर के बिना विष्णु नहीं रह पाते हैं और विष्णु के बिना शंकर का रहना मुश्किल लगता है। इतना प्रगाढ़ प्रेम है कि योगीराज शंकर विवाह की मनाही कर देते हैं देवताओं के कहने पर, पर विष्णु भगवान् के आग्रह करने पर वे तुरंत मान जाते हैं। कहीं कहीं पर चिंतकों ने तो यहाँ तक चिंतन दिया है कि भगवान् विष्णु शिव का चिंतन करते हैं और शिव विष्णु का चिंतन करते हैं जैसा कि रामचरित मानस में सती के प्रसंग से ज्ञात होता है।
भगवान् शंकर भी कहते हैं– विष्णु मेरे हृदय हैं और मैं विष्णु का हृदय हूँ। जैसे हृदय के बिना शरीर की कोई सत्ता नहीं है वैसे हीं एक दूसरे के बिना दूसरे की सत्ता नहीं है क्योंकि भगवान् शिव हीं अपने अर्धांग से स्वयं विष्णु बन गए हैं और विष्णु को अपने बाएँ भाग में स्वयं धारण भी करते हैं।
विष्णु के हृदय में सदाशिव का नित्य निवास है। एक बार देवता कैलाश पर्वत पर पहुँचे, लेकिन वहाँ भगवान शंकर दिखलाई नहीं पड़े तब देवता लोग लौटकर भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और कहने लगे कि पता नहीं परमशिव कहाँ गायब हो गये हैं। हमलोगों को उनका पता नहीं चल पा रहा है। तब कमल नयन ने उनसे कहा कि भगवान् और कहीं नहीं, हमारे हृदय में विराजमान हैं और वहीं से निकाल कर देवताओं को सदाशिव के दर्शन करा दिए जैसा कि वामन पुराण कहता है–
तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम्।
सत्यं वद सुरेशान! महेशान: क्व तिष्ठति।।
ततोSव्ययात्मा स हरि: स्वहृत्पंगजशायिनम्।
दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिंगमैश्वरम्।।
विष्णु ने स्वयं ही भगवान् शंकर से दृढ़ भक्ति का वरदान मांगा है। सौरपुराण के अनुसार–
भगवन् देवदेवेश परमात्मन् शिवाव्यय।
निश्चला त्वयि मे भक्ति: भवत्विति वरो मम।।
हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर उपवास करते हुए कृष्ण ने बारह वर्ष तक तपस्या की, तब सदाशिव का उन्हें दर्शन हुआ। नम: शिवाय के जप स्वरूप शंकर ने उन्हें संतान का आशीर्वाद दिया।
भगवान् शिव से भगवान् विष्णु को इतना प्रेम है कि शिव के लिए वे हर कार्य करने के लिए तैयार हो जाते है। जब त्रिपुरासुर को मारने का कार्यक्रम बना तब पृथ्वी रथ बनी, लेकिन देवताओं से वह संभली नहीं, तब विष्णु वृषभ (साँड़) बनकर स्वयं पृथ्वीरूपी रथ के जुए में जा लगे। भगवान् शंकर के लिए अमोघ बाण चाहिए था, जिससे त्रिपुरासुर मारा जा सके, तब विष्णु बाण बनकर वृषभ वाहन के हाथ में आ गए।
शिवलिंग के आरंभ का पता लगाने के लिए, सुअर बन गए। महादेव के आग्रह पर मोहिनी रूप दिखाकर स्वयं भार्या बन बैठे। जब भगवान शंकर नृत्य की इच्छा अभिव्यक्त करते हैं, तब मुरारी हीं मृदंग बजाते हैं। हासविलासरास रस के रसिक भगवान् रासबिहारी सखी बन जाते हैं। कमल चढ़ाते–चढ़ाते स्वयं अपनी कोमल काया का कमनीय अंग नयन तक शिवचरणों में अर्पित कर देते हैं। अत: विष्णु की प्रियता का क्या बखान किया जाए। आचार्य शंकर के शब्दों में–
बाणत्वं वृषभत्वमर्धवपुषा भार्यात्वमार्यापते घोणित्वं
घोणित्वं सखिता मृदंगवहताचेत्यादिरूपंदधौ।
त्वत्पादेनयनार्पणंचकृतवांस्त्वद्देहभागोहरि:
पूज्यात्पूज्यतर:सएवहिनचेत्कोवातदन्योSधिक:।।
भास्करराय तो कहते हैं कि तपस्या करते हुए विष्णु को, चरण नख किरणों से समुत्पन्न सुदर्शन चक्र प्रदान कर उन्हें अपना आधा शरीर प्रदान कर दिया इसलिए आप विष्णुवल्लभ हैं–
वितरन् हरये तपस्यते पदरेखाजनितं सुदर्शनम्।
वपुरर्धमपि प्रियाय ते प्रथितस्त्वं भुवि विष्णुबल्लभ:।।
अध्यात्म में विष्णु को उपादान कारण स्वीकार किया गया है और शक्ति है निमिक्त कारण, शिव है इन दोनों का अधिष्ठान अर्थात् अभिन्न निमित्तोपादान कारण। अधिष्ठान को उपादान कारण अत्यधिक प्रेम करेगा हीं क्योंकि अधिष्ठान के बिना उसकी सत्ता नहीं है। उपादान की आत्मा हीं अधिष्ठान है।
विष्णु और शिव में इतनी अभिन्नता है कि चिंतन करते करते विष्णु काले और शिव गौर वर्ण के हो गये। विष्णु का सत्त्वगुण शिव में आ गया और शिव का तमोगुण विष्णु में चला गया इसलिए शिव सदा ध्यान में मग्न रहते हैं और विष्णु आराम फरमाते हैं।
जगत् की विर्वत कारणता को पहचानना हीं विष्णुवल्लभ की उपासना है।
सत्यजीत.

कार्तिकेय

कार्तिकेय या मुरुगन (तमिल: முருகன்), एक लोकप्रिय हिन्दु देव हैं और इनके अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिल नाडु में की जाती है इसके अतिरिक्त विश्व में जहाँ कहीं भी तमिल निवासी/प्रवासी रहते हैं जैसे कि श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी यह पूजे जाते हैं। इनके छ: सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिल नाडु में स्थित हैं। तमिल इन्हें तमीज़ कादुवुल यानि कि तमिलों के देवता कह कर संबोधित करते हैं। यह भारत के तमिल नाडु राज्य के रक्षक देव भी हैं।

कार्तिकेय जी भगवान शिव और भगवती पार्वती के पुत्र हैं तथा सदैव बालक रूप ही रहते हैं। परंतु उनके इस बालक स्वरूप का भी एक रहस्य है।

भगवान कार्तिकेय छ: बालकों के रूप में जन्मे थे तथा इनकी देखभाल कृतिका (सप्त ऋषि की पत्निया) ने की थी, इसीलिए उन्हें कार्तिकेय धातृ भी कहते हैं।

बालक स्वरूप से संबंधित कथा
एक बार भगवान शंकर ने माता पार्वती के साथ द्युत (जुआ) खेलने की अभिलाषा प्रकट की। खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तो के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय जी को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएँ वापस लेने आए। इस बार खेल में पार्वती जी हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। अब इधर पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए। पार्वती जी ने अपनी व्यथा अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताई तो मातृ भक्त गणोश जी स्वयं खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे। गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर पार्वती बोलीं कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेश जी फिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोले नाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे। पार्वती से नाराज भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। भोलेनाथ के भक्त रावण ने गणेश जी के वाहन मूषक को बिल्ली का रूप धारण करके डरा दिया। मूषक गणेश जी को छोड़कर भाग गए। इधर भगवान विष्णु ने भोलेनाथ की इच्छा से पासा का रूप धारण कर लिया था। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को कह सुनाई। इस पर भोलेनाथ बोले कि हमने नया पासा बनवाया है, अगर तुम्हारी माता पुन: खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूं।

गणेश जी के आश्वासन पर भोलेनाथ वापस पार्वती के पास पहुंचे तथा खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती हंस पड़ी व बोलीं ‘अभी पास क्या चीज है, जिससे खेल खेला जाए।’ यह सुनकर भोलेनाथ चुप हो गए। इस पर नारद जी ने अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हें दी। इस खेल में भोलेनाथ हर बार जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए तथा उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया। सारी बात सुनकर पार्वती जी को क्रोध आ गया। रावण ने माता को समझाने का प्रयास किया, पर उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तथा क्रोधवश उन्होंने भोलेनाथ को श्राप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ उनके सिर पर रहेगा। नारद जी को कभी एक स्थान पर न टिकने का अभिषाप मिला। भगवान विष्णु को श्राप दिया कि यही रावण तुम्हारा शत्रु होगा तथा रावण को श्राप दिया कि विष्णु ही तुम्हारा विनाश करेंगे। कार्तिकेय को भी माता पार्वती ने कभी जवान न होने का श्राप दे दिया।

इस पर सर्वजन चिंतित हो उठे। तब नारद जी ने अपनी विनोदपूर्ण बातों से माता का क्रोध शांत किया, तो माता ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। नारद जी बोले कि आप सभी को वरदान दें, तभी मैं वरदान लूंगा। पार्वती जी सहमत हो गईं। तब शंकर जी ने कार्तिक शुक्ल के दिन जुए में विजयी रहने वाले को वर्ष भर विजयी बनाने का वरदान मांगा। भगवान विष्णु ने अपने प्रत्येक छोटे- बड़े कार्य में सफलता का वर मांगा, परंतु कार्तिकेय जी ने सदा बालक रहने का ही वर मांगा तथा कहा, ‘मुझे विषय वासना का संसर्ग न हो तथा सदा भगवत स्मरण में लीन रहूं।’ अंत में नारद जी ने देवर्षि होने का वरदान मांगा। माता पार्वती ने रावण को समस्त वेदों की सुविस्तृत व्याख्या देते हुए सबके लिए तथास्तु कहा।

विविध
षण्मुख, द्विभुज, शक्तिघर, मयूरासीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित हैं ये ब्रह्मपुत्री देवसेना-षष्टी देवी के पति होने के कारण सन्तान प्राप्ति की कामना से तो पूजे ही जाते हैं, इनको नैष्ठिक रूप से आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय भी है।
तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित देवताओं पर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने पार्वती जी का पाणिग्रहण किया। भगवान शंकर भोले बाबा ठहरे। उमा के प्रेम में वे एकान्तनिष्ठ हो गये। अग्निदेव सुरकार्य का स्मरण कराने वहाँ उज्ज्वल कपोत वेश से पहुँचे। उन अमोघ वीर्य का रेतस धारण कौन करे? भूमि, अग्नि, गंगादेवी सब क्रमश: उसे धारण करने में असमर्थ रहीं। अन्त में शरवण (कास-वन) में वह निक्षिप्त होकर तेजोमय बालक बना। कृत्तिकाओं ने उसे अपना पुत्र बनाना चाहा। बालक ने छ: मुख धारण कर छहों कृत्तिकाओं का स्तनपान किया। उसी से षण्मुख कार्तिकेय हुआ वह शम्भुपुत्र। देवताओं ने अपना सेनापतित्व उन्हें प्रदान किया। तारकासुर उनके हाथों मारा गया।
स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) ही हैं। समस्त भारतीय तीर्थों का उसमें माहात्म्य आ गया है। पुराणों में यह सबसे विशाल है।
स्वामी कार्तिकेय सेनाधिप हैं। सैन्यशक्ति की प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन इनकी कृपा से सम्पन्न होता है। ये इस शक्ति के अधिदेव हैं। धनुर्वेद पद इनकी एक संहिता का नाम मिलता है, पर ग्रन्थ प्राप्य नहीं है।
कार्तिकेय के नाम
संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार कार्तिकेय के निम्न नाम हैं:

1. कार्तिकेय
2. महासेन
3. शरजन्मा
4. षडानन
5. पार्वतीनन्दन
6. स्कन्द
7. सेनानी
8. अग्निभू
9. गुह
10. बाहुलेय
11. तारकजित्
12. विशाख
13. शिखिवाहन
14. शक्तिश्वर
15. कुमार
16. क्रौञ्चदारण
परिवार
पिता - भगवान शिव
माता - भगवती पार्वती
भाई - गणेश (छोटे भाई)
बहन - अशोक सुन्दरी
पत्नि - देवसेना (कुमारी)
वाहन - मोर (संस्कृत - शिखि)

बालपन में इनकी देखभाल कृतिका (सप्तर्षि की पत्नियाँ) ने की थी। सत्यजीत

राम का धनुष भेदन

सुबह एक विचार आया ...
कष्ट हो तो क्षमा करियेगा ...
श्री हरि शिव के परम् भक्त रूप में परशुराम हुये |
इतने परम् कि जब श्री हरि स्वरूप ही श्रीराम
ने धनुष पर प्रत्यंचा चढाने का प्रयास किया
तो वह जब टुट गया तो उसी सभा में कई परम्
शिव भक्त थे जैसे ... जनक , वशिष्ठ , विश्वामित्र ,
रावण आदि पर परशुराम को वहाँ ना होते हुये भी
भान हो गया | तत्क्षण वह आ ही गये | ...
क्या लीला थी हरि का किया हरि को अखरा ...
इसके आगे औपचारिक लीलायें हुई जैसे
परशुराम का महाक्रोध और ठीक विपरित
श्री राम की विनम्रता पुर्ण उस समय के समत्व
भाव | कुछ ना कहना ... फिर अपने स्वामि का
विरोध ना सह पाने से श्री शेषावतार का अपने ही
स्वामि के अन्य रूप का भावावेश उत्तर ...
अद्भुत | हरि - हर को समझने हेतु यें मार्मिक प्रसंग
है | कितने परम् भक्त रहे श्री परशुराम ... श्री हरि ..
हर के |
क्षमा चाहुगाँ पर मेरे विचार से शिव का दिव्य प्रसाद स्वरूप
धनुष राम ने तोडा ही नहीं ... उनके स्पर्श को पा कर शिव ने
उसका खण्डन किया | राम की शरण में यें समर्पण रहा होगा |
वरन् राम परम् करुणामय है | शिवउपासक भी ... परन्तु शिव यहाँ
भावमय हो गदगद हो गये | और जब जनक जी को हरि जमाता रूप में
मिल रहे है तो वह भी शिव-भक्ति के प्रसाद स्वरूप ...
श्री जनक नन्दिनी की सेवा में रहा वह धनुष अब वहाँ वियोग में ना रह पाता
सो जानकी की रक्षा हेतु श्रीराम के धनुष में ही तत्व रूप में लीन हो गया | ...
हरि और हर विपरित उपासक और उपास्य मान सदा रहे है यें मेरा मत है |
नर - नारायण में भी मुझे वहीं दर्शन हुये है | भक्ति में होने वाला रुदन शिवकृपा
से ही सम्भव है || ... जय जय श्री युगल सरकार || जय जय युगल अवतार |
आपका क्या विचार है ? जरुर दें ... सत्यजीत !!

प्रश्नोत्तरी-1 और सत्संग

प्रश्नोत्तरी और सत्संग --

भगवान मीठे कैसे लगे ?
- भगवान मीठे लगेंगे संसार खारा लगने से ।

भगवान में प्रेम कैसे बढ़े ?
- हम केवल भगवान के ही अंश हैं , अतः वे ही अपने है । उनके सिवाय और कोई भी अपना नहीँ है । इस प्रकार भगवान में अपनापन होने से प्रेम स्वतः बढेगा । इसके सिवाय भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए कि " हे नाथ ! आप मीठे लगो , प्यारे लगो । " भगवान का गुणगान करने से उनका चरित्र पढ़ने से , उनके नाम का कीर्तन करने से उनमें प्रेम हो जाता है । भगवान के चरित्र से भी भक्त-चरित्र पढ़ने का अधिक माहात्म्य है ।

यदि हम निष्काम भाव से किसी व्यक्ति से प्रेम करें तो उसका क्या परिणाम होगा ?
- कामना के कारण ही संसार है । कामना न हो तो सब कुछ परमात्मा ही है ,  संसार है ही नहीँ । निष्काम प्रेम होने पर संसार नहीँ रहेगा । कामना गयी तो संसार गया । इसलिए निष्काम भाव से किसी के भी साथ प्रेम करें तो वह भगवान् में ही हो जायेगा ।

भगवान में प्रेम की भूख क्यों है ?
भगवान में अपार प्रेम है इसलिए उनमें प्रेम की भूख है , जैसे मनुष्य के पास जितना ज्यादा धन होता है , उतनी ही ज्यादा धन की भूख होती है । भगवान में प्रेम की कोई कमी नहीँ है , पर प्रेम की भूख है ।

भक्ति और भक्तियोग में क्या अंतर है ?
- सकाम भाव होने पर भक्ति होती है और निष्कामभाव होने पर भक्तियोग होता है । योग निष्कामभाव होने पर ही होता है ।
- स्वामी रामसुखदास जी ।

शारीरिक कष्टों को कैसे भूला जाये ?
- भुला न जाएं  , सहा जाए , चिंता-विलाप से रहित होकर । यह तप है । तप से शक्ति बढ़ती है । भूलने से तो जड़ता आवेगी । शरीर से तितिक्षा होनी चाहिए । तितिक्षा का अर्थ है हर्ष पूर्वक कष्ट को सहन करना ।

आसक्ति रहित होकर कार्य करने से क्या तात्पर्य है ?
- जिस कार्य को करने में अपना सुख निहित नहीँ होता , जो सर्वहितकारी दृष्टि से किया जाता है , वह आसक्ति रहित कार्य कहलाता है ।

भगवत्प्राप्ति में विघ्न क्या है ?
- संसार को पसन्द करना ही सबसे बड़ा विघ्न है ।

भगवान छिपा क्यों रहता है ?
- भगवान के प्रति आस्था, श्रद्धा, विश्वापूर्वक आत्मीयता और प्रियता जाग्रत नहीँ हुई ।

मन में गहरे विकार पैदा होते रहते हैं, क्या करुँ ?
- गहरी वेदना होनी चाहिये ।

होली का क्या महत्व है ?
- राग-द्वेष को अग्नि में जला दो , देहाभिमान को मिट्टी में मिला दो और प्रेम के रंग में रंग जाओ ।

मोह निवृति का उपाय बताईये ?
- मोह की निवृत्ति तो कई प्रकार से होती है -
१ आस्था के आधार पर - केवल प्रभु मेरे अपने हैं ।
२ ज्ञान के आधार पर - आसक्ति छोड़ने से ।
३ सेवा के आधार पर - सेवा करें, कुछ न चाहे ।

सम्मान के सुख से नुकसान क्या है ?
- सम्मान के सुख इतना भयंकर विष है कि विष खाने से तो मनुष्य एक ही बार मरता है , परन्तु सम्मान के सुख भोगने से कई बार जीता-मरता है ।

बन्धन क्या है ?
- लेना बन्धन है । लेना बन्द करके , देना शुरू करने पर बन्धन जैसी चीज़ नहीँ रहती ।

लेने में क्या बुराई है ?
- लेने की रूचि ही नए राग की जननी है , जो पूरी न होने पर क्रोधित कर देती है । क्रोधित होने पर कर्तव्य की , निज स्वरूप की एवम् प्रभु की विस्मृति हो जाती है ।

मन भटकता रहता है ?
- मन कहीँ नहीँ भटकता । तुम संसार को चाहते हो , उसकी याद आती है । यह दोष अपना है ।

सुख और आनन्द में क्या अंतर है ?
- सुख से दुःख दब जाता है , दुःख मिटता नहीँ , केवल दबता है । आनन्द से दुःख मिट ही जाता है ।

जड़ क्या है ?
- जो दूसरों की सत्ता से प्रकाशित हो , जो स्वाधीन न हो , और जो पराधीन हो वह जड़ है ।

चेतना क्या है ?
- चेतना सूर्य के समान है जो स्वयं प्रकाशित है और जिससे जड़ पदार्थ प्रकाशित होते हैं ।

आनन्द क्या है ?
- जो होकर कभी भी नहीँ मिटे , जिसके मिलने पर फिर और कुछ पाने की इच्छा न रहे , जहाँ सदा बहती रस धारा हो । जिसका विराम न दीखता हो , वहीँ आनन्द है ।
- शरणानन्द जी ।।

सत्संगी ने संत से पूछा -- ' महात्मन् ! यदि हमारे अंदर भगवान के लिए व्याकुलता नहीँ हो , तो क्या वें हमें नहीँ मिलेगें ?
महात्मा - क्यों नहीँ मिलेंगे ! अवश्य मिलेंगे ! मिलना ही उनका जीवन है  , मिलना ही उनका जीवन मत है । बिना मिले वें रह ही नहीँ सकते । ऐसा क्यों , वें तो प्रतिदिन हज़ारो रूपों में हमसे मिलते भी है । हम उन्हें पहचानते नहीँ, इसी से उनके मिलने के आनन्द से वंचित रह जाते है । परन्तु हमारे न पहचानने से उनकी छिपने की लीला तो पूरी होती ही है , वें हमारे इस भोलेपन का आनन्द भी लेते है ।

सत्संगी - ' तब कटा हमें ही पहचानना पड़ेगा । यदि उनके मिलने पर भी हम उन्हें नहीँ पहचान सकते तो हमारे जीवन में इससे महत्वपूर्ण कौनसी घटना घटेगी कि हम उनको पहचानकर उनके आलिंगन का सुख प्राप्त कर सकेंगे ?
-- यह तो उनकी एक लीला है । जब तक वें आँख मिचौनी खेल रहे हैं , उनकी इच्छा अपने को पहचान में लाने की नहीँ हैं , तब तक किसका सामर्थ्य है कि उन्हें पहचान सकें ! परन्तु वें कब तक छिपेगे ? वे जैसे नचावैं, नाचते जाओ । कभी तो रीझेंगे ही । यदि रिंझकर उन्होंने अपना पर्दा-बनावटी वेश दूर कर दिया , तब तो कहना ही क्या है ? और यदि छिपे ही रहे तो भी हम उनके सामने ही तो नाच रहे हैं । हम चाहे उन्हें न देंखें, वे तो हमे देख रहे है न ? बस, वें हमें और हमारी प्रत्येक चेष्टा को देख रहे है और उनकी प्रसन्नता के लिए मैं रंगमंच में नाच रहा हूँ -इतना भाव रखकर, जैसे रखें, रहो । अभिनय सुंदर रहे और भीतर उनसे आत्मसात करें तो वें अवश्य तुम्हें अपनी पहचान बताएंगे, मिलेंगें ।  सत्यजीत तृषित -- 
*** जयजय श्यामाश्याम ***

Sunday, 3 January 2016

धर्म से मोक्ष तक की यात्रा करनी है , अर्थ काम गौण है

¤¤¤¤ चार पुरुषार्थो मे पहले धर्म और अन्त मे मोक्ष । बीच मे अर्थ और काम । इसका भाव है कि अर्थ और काम को धर्म और मोक्ष के अनुसार प्राप्त करना है ।
¤¤¤¤ धर्म और मोक्ष मुख्य है अर्थ और काम गौण । धर्म के विपरीत कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नही होता ।
¤¤¤¤ धर्मानुसार अर्थ और काम की प्राप्ति करनी है ।
धन नही धर्म मुख्य है । मानव जीवन मेँ धर्म ही प्रधान है । धन से सुख नहीँ मिलता । सुख मिलता है अच्छेसंस्कारो से , संयम और सदाचार से । प्रभु भक्ति औरत्याग से सुख मिलता है । धर्म से धन कभी भी श्रेष्ठ नहीँ हो सकता । धर्म इस लोक मे और परलोक मे सुख देता है । मरने के बाद धन नहीँ धर्म ही साथ जाता है । अतः धन की अपेक्षा धर्म श्रेष्ठ है । जब से लोग अर्थ को महत्व देने लगे हैँ तब से जीवन बिगड़ गया है । ¤¤¤¤ श्रीशंकराचार्य जी ने कहा है
" अर्थ अनर्थ भावय नित्यम्"
अर्थ को धर्मानुकूल रखना चाहिए । ¤¤¤¤
¤¤¤¤ जो अर्थ धर्मानुकूलनहीँ होता वह अनर्थ होता है। देश को सम्पत्ति की जितनी जरुरत है , उससे अधिक अच्छे संस्कारो की जरुरत है। जीवन मे धर्म को सबसे पहले स्थान देना चाहिए । जबकामसुख और अर्थ गौण बनता हैतभी जीवन मेँ दिव्यता आती है । दिव्यता का अर्थ है देवत्व ।
¤¤¤¤ धर्म की गति सूक्ष्म है । धर्म भी अनेको बार अधर्म बनजाता है । सद्भावना के अभावमेँ किया गया धर्म सफल नहीँहोता । सत् का अर्थ है ईश्वर । ईश्वर का भाव जो मन मेँ प्रत्यक्ष सिद्ध करे उसी का धर्म सफल होता है ।
मनुष्यो के शत्रु बाहर नही अपितु मन के अन्दर ही है । काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सरआदि शत्रु ही तो है जो हमारे मन मे बसे है इनको मार देने से बाहरी जगत मे कोई भी शत्रु नही रहेगा ।
धर्म क्रिया बिना सदभाव के सफल नहीँ होती । जगत के किसी भी जीव के प्रति कुभावनही रखना चाहिए ।
सभी क्षेत्रो मेँ क्षेत्रज्ञरुप मे परमात्माही बसे हुए हैँ । इसलिए किसी भी जीव के प्रति कुभाव रखना ईश्वर के प्रति कुभाव रखने के बराबर है । शास्त्रो मे कहा गया है जीवही नही जड़ पदार्थो के प्रतिभी कुभाव नही रखना चाहिए। " सुहृदः सर्वभूतानाम्" कहा गया है न कि ¤¤¤¤
"सुहृदः सर्वजीवानाम" ।
जड़ पदार्थो के साथ भी प्रेमकरना है । सबमे सदभाव रखना है अर्थात् जड़ पदार्थो के प्रति भी प्रेम रखना है ।।

Saturday, 2 January 2016

रहस्य भाव 75

हाथ जोडकर मस्तक नवाकर वन्दना करना >
हाथ क्रिया शक्ति का प्रतीक है । हाथ जोड़ने का तात्पर्य है कि मैँ अपने इन हाथोँ से सत्कर्म करुँगा ।
मस्तक नवाने का अर्थ है कि मैँ अपनी बुद्धि शक्ति को हे प्रभू ! आपको अर्पित करता हूँ ।
वन्दना करने का अभिप्राय है कि अपनी क्रिया शक्ति को और बुद्धि शक्ति को श्रीभगवान को अर्पित करना ।
श्री भगवान को वन्दन करने से पाप ताप का नाश होता है। निर्भयता प्राप्त करने के लिए प्रेम पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण , श्रीराम या भगवान आशुतोष शिव की वन्दना करनी है । प्रभू दयानिधि है। केवल वाणी और शरीर से ही नहीँ , बल्कि हृदय से भी भगवान की वन्दना करना चाहिए। हृदय से वन्दना करने से प्रभू के साथ ब्रह्म सम्बन्ध होता है । प्रेम से परमात्मा को प्रणाम करने से प्रभू प्रसन्न होँगे । प्रभू के मुझ पर अनन्त उपकार हैँ । बोलने को जीभ , सुनने को कान , देखने को आँख, विचार करने हेतु मन , बुद्धि एवं विचारशक्ति परमात्मा ने ही दी है । ईश्वर के उपकारोँ को याद करते हुए यह कहे कि हे प्रभू मैँ आपका ऋणी हूँ । हे प्रभू आपकी कृपा से मैँ सुखी हूँ। मेरे पाप अनन्त हैँ , परन्तु हे नाथ आपकी कृपा भी अनन्त है ।
इसप्रकार वन्दन करने से अभिमान नष्ट होता है ।
जीभ से भगवान के पवित्र नामोँ का संर्कीतन करेँ , आँखो से भगवान की मंगलमय दिव्य झाँकी का सर्वत्र दर्शन करेँ, प्रभू की दिव्य लीलाओ का श्रवण करेँ , मन मेँ किसी के प्रति कुविचार का चिन्तन न करेँ , बुद्धि से किसी का अहित न हो ऐसा कार्य करेँ । तभी प्रभू प्रसन्न होगे !!

Friday, 1 January 2016

रहस्य भाव 74

<   शंख  >
¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤
1. श्रीकृष्ण के शंख का नाम "पाञ्जन्य" था ।
2. युधिष्ठिर के शंख का नाम "अनन्त विजय " था ।
3. भीमसेन के नाम भीमकर्मा एवं वृकोदर थे इनके शंख का नाम "पौण्ड्र" था ।
4. अर्जुन के शंख का नाम "देवदत्त"था ।
5. नकुल के शंख का नाम "सुघोष"था ।
6. सहदेव के शंख का नाम "मणिपुष्पक" था ।
>>> गाण्डीव >>>
अर्जुन के दिव्य धनुष का नाम गाण्डीव था जिसका आकार तालवृक्ष के समान था । इसे ब्रह्मा जी ने 100 वर्ष , प्रजापति ने 503 वर्ष , इन्द्र ने 85 वर्ष , चन्द्रमा ने 500 वर्ष , और वरुणदेव ने 100 वर्ष तक अपने पास रखा था । इसे अग्निदेव ने अर्जुन को खाण्डववन जलाते समय वरुणदेव से दिलवाया था ।।
(महाभारत आदिपर्व 225 )