Monday, 14 May 2018

*प्रेम में अधीरता* वियोगी हरि जी

*प्रेम में अधीरता*
वियोगी हरि जी

प्रेमी को धैर्य कहाँ? अरे भाई! उसकी अधीरता ही उसकी धीरता है। आत्यन्तिक विरहासक्ति में, मिलन की परमोत्कण्ठा में प्रेम की जो गहरी अधीरता होती है, उसका आनन्द विरले ही भाग्यवान् जानते हैं। उस अकथनीय अवस्था में एक क्षण एक कल्प के समान बीतता है। दिल में एक अजीब छटपटाहट पैदा हो जाती हैं, आँखें एक दर्द भरे मीठे से नशे में मस्त हो झूमने लगती हैं, मन पर अपना काबू नहीं रहता, ऐसा लगता है, मानों कहीं उड़ा सा जा रहा है। कब आयेगी वह घड़ी, कब मिलेगा वह प्रियतम, कब बुझेगी इन आँखों की तड़प भरी प्यास, कब मौज की लहर लहरायगी दिल के दरिया में आदि भावनाओं में जिस किसी का मन आतुर और अधीर हो गया उसकी प्रेम साधना सफल है, उसका जीवन धन्य है। प्रेमाधीरता में बस कब ही कब दिखायी देता है। यहाँ तक कि ‘अब’ भी उस ‘कब’ के गहरे रंग में रंग जाता है। ऊंचे प्रेमी कबीर ने प्रियतम की दर्शनोत्कण्ठा में प्रेमाधीरता का कैसा सजीव चित्र खींचकर रख दिया है। कहते हैं-

यहि तनका दिवला करौ, बाती मेलौं जीव।
लोहू सींचौं तेल ज्यों, कब मुख देखौं पीव।।

वह मिले तो मैं यह सब भी करने को तैयार हूँ। इस देह का दीपक बनाकर उसमें जीव की बत्ती रखूँगी और अपने हृदय रक्त से उस प्रेम ज्योति को सदा सींचती रहूंगी! देखूँ, इस दिये के उजेले में अपने प्रेमास्पद का मुख कब देखने को मिलता है। हा! कब तक उसकी प्रतीक्षा करूँ!
देखत देखत दिन गया, निसि भी देखत जाय।
बिरहिन पिय पावै नहीं, केवल जिय घबराय।। - कबीर

क्या करूँ, क्या न करूं! कैसे पाऊँ अपने उस प्यारे को-

जो धन आनँद ऐसी रुची तौ कहा बस है, अहा प्राननि पीरौं।
पाऊँ कहाँ हरि, हाय! तुम्हें, धरनी में धँसौं कैं अकासहिं चीरौं।। - आनन्दघन

एक व्रजांगना की प्रेमाधीरता देखते ही बनती है। एक दिन, वन में बलराम और कृष्ण को गायें चराते चराते भूख लग आयी। उस दिन मैया यशोदा ने समय पर छाक तक न भेजी। थोड़ी दूर पर कुछ ब्राह्मण यज्ञानुष्ठान कर रहे थे। सो ग्वालबालों ने श्रीकृष्ण के कहने पर उन याजकों से कुछ भोजन माँगा। पर वे कोरे कर्मठ ब्राह्मण ग्वालों के लड़कों को यज्ञ की रसोई भला देने चले? क्रोधित हो बोले- हट जाओ सामने से। क्यों अपवित्र दृष्टि डालते हो? यह रसोई हमने तुम ग्वालों के छोकरों के लिए ही तो राँधी है!

यज्ञ हेतु हम करीं रसोई। ग्वाल पहले देहि न सोई।।
बेचारे बालक निराश होकर लौट आये। श्रीकृष्ण ने कहा, भैया! तुम तो उनकी स्त्रियों से जाकर माँगों। वे अवश्य देंगी, क्योंकि-

उनके मन दृढ़भक्ति हमारी। मानि लैहिं बै बात तुम्हारी।।
हुआ भी वही। बड़े ही प्रेम से अनेक प्रकार के पकवान् ले लेकर द्विज पत्नियाँ स्वयंही राम कृष्ण को अपने हाथ से भोजन कराने चलीं।
कठोर कर्मठों ने बहुत रोका, पर उन प्रेम मूर्ति व्रजांगनाओं ने उनकी एक न सुनी। और तो सब सविनय अवज्ञा करके चली गयीं, केवल एक ब्राह्मणी अपने पतिदेव के धर्मपाश में फँस गयी। बेचारी पति के पैरों पर नाक रगड़ रगड़कर कहने लगी-

देखन दै वृन्दावन चंद।
हा हा कन्त, मानि बिनती यह, कुल अभिमान छाँड़ि मतिमंद।।
कहि, क्यों भूलि धरत जिय औरै, जानत नहिं पावन नँदनंद!
दरसन पाय आयहौं अबहीं, हरन सकल तेरे दुखद्वंद।। - सूर

वृन्दावन चंद्र श्यामसुंदर की झलक नेक देख आने दो। उस प्यारे गोपाललाल को यह कटोरा भर केशरिया दूध पिला आने दो। सभी सहेलियाँ तो गयी हैं। इस मिथ्या कुलाभिमान में क्या रखा है। छोड़ क्यों नहीं देते यह दम्भाचार? अरे, तुम इतने बड़े विद्वान होकर भी एक मूर्ख की भाँति बात कर रहे हो! मन में पाप विचारते हो! बालकृष्ण में मेरी पवित्र प्रीति को तुम शायद किसी और दृष्टि से देखते हो। क्या कहूँ तुम्हारी बुद्धि को! छोड़ो, जाने दो मुझे, आर्य पुत्र! उस प्राण प्यारे गोपाल का मुखचंद्र मुझे देख आने दो। हा! मैं कैसे जाऊँ। नन्द नन्दन को कैसै देख आऊँ!

रति बाढ़ी गोपाल सों।
हा हा! हरि लों जान देहु प्रभु, पद परसति हौं माल सों।।
सँग की सखी स्याम सनमुख भई, मैं हिं परी पसु पाल सों।
परबस देह, नेह अंतर्गत, क्यों मिलौं नयन बिसाल सों।। - सूर

वहाँ संग की सब सखियाँ अपने अपने हाथ से प्यारे कृष्ण और बलराम को प्रेम से भोजन करा रही होंगी, हाय! मैं ही अकेलो यहाँ इस पशुपाल के पाले पड़ी छटपटा रही हूँ। भले ही यहाँ यह पराधीन देह तड़पा करे, हृदय के भीतर तो कृष्ण प्रेम की आग जलती ही रहेगी। उस आग को कौन बुझा सकता है!
पिय, जनि रोकहि अब जान दै।।
हौं, हरि बिरह जरी जाचति हौं, इतनी बात मोहि दान दै।।
बेनु सुनौं, बिहरत बन देखौं, यह सुख हृदय सिरान दै।
पुनि जो रुचै सोई तू कीजै, साँच कहति हौं आन दै।।
जो कछु कपट किये जाचति हौं, सुनहि कथा हित कान दै।
मन क्रम वचन ‘सूर’ अपनो प्रन राखौंगी तन मन प्रान दै।।

नाथ! अब मत रोको. अब तो मुझे तुम जाने ही दो। मैं कृष्ण के विरह में हाय! कब से जल रही हूँ। तुमसे बस, एक ही दान माँगती हूँ, न दोगे क्या? वन में उस वृन्दावन विहारी गोपाल को देख और उसकी बाँसुरी सुनकर मुझे अपना हृदय ठंडा कर लेने दो। इतना ही तुमसे चाहती हूँ। फिर जो तुम्हारे मन में आवे सो करना। यह मैं निष्कपट भाव से सौगंध खाकर कहती हूँ। न जाने दोगे, तो भी अपना प्रण तो पूरी करूँगी ही। तन, मन और प्राण भी देकर मैं प्यारे मदन मोहन से तो मिलूँगी ही। हा! कब तक तुम्हें समझाऊँ। मिलन की अवधि ही टली जाती है। लो, यह देह ले लो। तुम्हारा दावा सिर्फ इसी पर है न? सो, इस चाम की देह को सँभालकर रख लो। प्राण तो मेरे उस प्राण प्रिय व्रजचंद के ही चरणों में जाकर बसेंगे-

कहँ लगि समुझाऊँ ‘सूरज’ सुनि, जाति मिलन की औधि टरी।
लेहु सँभारि देह पिय, अपनी, बिन प्राननि सब सौज धरी।।
प्रेमाधीरता रही भी यही करके-

चितवन हुती झरोखे ठाढ़ी, किये मिलन कौ साजु।
'सूरदास' तनु त्यागि छिनके में तज्यौ कंत कौ राजु॥

धन्य प्रेमसूति व्रजाड्ड़्ने |

आत्यंतिक विरहासक्ति में धैर्यका भी धैर्य छूट जाता है । यह अवस्था ही कुछ ऐसी होती है। शरत्पूर्णिमाको, जब कालिंदी-कूलपर श्रीकृष्ण ने बासुरी बजायी थीं, ऐसी कौन ब्रजवनिता थीं जो स्वजन-परिजनों के लाख रोकने पर भी वहाँ जाने से रूकी हो? अहो! वह प्रेमाधीरता |

श्रीब्रज-रत्न प्राणघान हरिका,चल सखी ! चल देखें सत्वर ।
है कदम्बके तले नाचते,बेणु बजाते राधावर्॥
घनश्याम की ध्वनि सुन क्योंकर मै चातकी धैर्य धारूं?
क्यों न प्राण-प्यारेके ऊपर अपना तन-मन, धन वारूँ ?॥ -मधुप
कैसी खिंची जा रही हैं ब्रजबालाएँ उस ओर्।
सुनत चली ब्रज-वधु गीत-धुनि कौ मारग गहि।
भवन-भीत, द्रुम-कुंज-पुंज कितहुँ अटकी नहीं॥
ते पुनि तेहि मग चलीं रँगीली तजि गृह-संग्रम।
जनु पिंजरन तै उडे, छुड़े नव-प्रेम विहंगम्॥
साधन सरित न रुकै करो जो जतन कोउ अति।
कृष्ण हरे जिनके मन, ते क्यों रुकैं अगम गति?- नन्ददास

और निर्दय निठुर स्वजन संबंधियों ने जिन व्रजबालाओं को किसी तरह काल कोठरियों में बंदकर रोक रखा था, उनकी दशा यह हुई-

जे रुकि गई घर अति अधीर गुनमय सरीर बस।
पुन्य पाप प्रारब्ध रच्यो तन नाहिं पच्यो रस।।
परम दुसह श्रीकृष्ण विरह दुख व्याप्यौ जिनमें।
कोटि बरस लगि नरक भोगि अघ भुगते छिनमें।।
पुनि रंचक धरि ध्यान पीय परिरंभन दिय जब।
कोटि स्वर्ग सुख बोगि छिनहिं मंगल कीनों सब।। - नन्ददास

उस एक क्षण की विरह व्याकुलता का तनिक ध्यान तो करो। करोड़ों वर्षों के दुखों का लय हो जाता है उस मिलन उत्कण्ठा में, उस अतुलनीय प्रेमाधीरता में। आह कैसी होती होगी वह आतुरता! कितने प्रेमियों के प्राण पक्षी न उड़ा दिये होंगे उस दयाहीना अधीरता ने। पर प्रेमी तो बलि होने के अर्थ ही जीवन धारण करते हैं। ऐसे अधीर प्रेमातुर प्राण कब तक जीवित रह सकते हैं? व्यर्थ ही प्रेमातुरों को दोष देते हो। कहाँ तक बेचारे धैर्य धारण किये रहें। धैर्य की भी कोई हद होती है। बेचारे विरही अपने प्राण विहंगमों को कब तक बाँधकर रखे रहें। क्यों न उनके हाथों से छूट कर उड़ जायँ उनके छटपटाते हुए प्राण पक्षी-
बहुत दिनान की अवधि आस पास परे
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान कों;
कहि कहि आवन छबीले मन भावन कौ,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान कों।
झूठी बतियान की पत्यानी तें उदास ह्वैकैं,
अब ना घिरत ‘घनआनंद’ निदान कों;
अधर लगे हैं आनि करिकैं पयान प्रान,
चाहते चलन ए संदेशो लै सुजान कों।।

इतना धीरज क्या कुछ कम है, जो इस बेचारी कृष्णानुरागिणी गोपिका ने वहाँ तक संदेसा ले जाने के लिए अपने आतुर प्राणों को ओठों पर कुछ देर तो ठहरा लिया? अरे भाई! प्रेमातुरों को इतना ही बहुत है। अब भी प्रियतम चाहें तो उस अभागिनों को इतना ही बहुत है। अब भी प्रियतम चाहें तो उस अभागिनी के प्राणों को अधरों से लौटाकर उसके हृदय में पुनः बसा सकते हैं! प्यारे कृष्ण! तनिक सुनो तो, वह क्या कह रही है। हाय री, प्रीति!

एक विसास की टेक गहैं लगि आस रहे बसि प्रान बटोही।
हौ घनआनँद जीवन भूरि दई कित प्यासन मारत मोही।।
बस, अब और क्या कहूँ!
हरीचन्द एक व्रत नेम प्रेम ही कौ लीनों,
रूप की तिहारे, व्रज भूप! हौं उपासी हौं।
ज्याय लै रे प्राननि बचाय लै लगाय अंक,
एरे नन्दलाल! तेरी मोल लई दासी हौं।।
---   वियोगी हरि

Saturday, 12 May 2018

प्रदक्षिणा क्यों की जाती है..... मंजु दीदी

प्रदक्षिणा क्यों की जाती है.....

‘प्रगतं दक्षिणमिति प्रदक्षिणं’ के अनुसार अपने दक्षिण भाग की ओर गति करना प्रदक्षिणा कहलाता है। प्रदक्षिणा में व्यक्ति का दाहिना अंग देवता की ओर होता है। इसे परिक्रमा के नाम से प्राय: जाना जाता है। ‘शब्दकल्पद्रुम’ में कहा गया है कि देवता को उद्देश्य करके दक्षिणावर्त भ्रमण करना ही प्रदक्षिणा है।प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रात: पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है, उसी प्रकार वैदिक विचारकों के अनुसार अपने धार्मिक कृत्यों को बाधा विध्नविहीन भाव से सम्पादनार्थ प्रदक्षिणा करने का विधान किया गया। शतपथ ब्राह्मण में प्रदक्षिणा मंत्र स्वरूप कहा भी गया है, सूर्य के समान यह हमारा पवित्र कार्य पूर्ण हो।

इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्ष‍त्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया। भगवान में ही सारी सृष्टि समाई है, उनसे ही सब उत्पन्न हुए हैं, हम उनकी परिक्रमा लगाकर यह मान सकते हैं कि हमने सारी सृष्टि की परिक्रमा कर ली है।

- हर गोल घुमने वाली वस्तु के घूमने से आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है।
- इस ब्रम्हांड में सभी ग्रह सूर्य की प्रदक्षिणा कर रहे हैं जिससे उनमे आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है।
- पृथ्वी और सभी ग्रह अपने इर्द गिर्द ही प्रदक्षिणा कर रही है।
- हर अणु में इलक्ट्रोन भी प्रदक्षिणा कर रहें हैं।
- तक्र से माखन बिलोते समय भी उसे गोल गोल घुमाने से उसमे ब्रम्हांड में मौजूद शक्ति आकर्षित होती है।
- इस शक्ति को अनुभव करना हो तो अपने हाथों को इस तरह रखे जैसे उसमे गेंद पकडे हो।अब हाथों को कंधे तक उठाकर उन्हें ऐसे घुमाए जैसे डमरू बजा रहे हो।थोड़ी ही देर में उँगलियों में भारीपन महसूस होगा।यहीं ब्रह्माण्ड से आकर्षित शक्ति का अनुभव है।अब हलकी सी ताली बजाते हुए इसे अपने अन्दर समाहित कर लें।
- इसी प्रकार जब हम ईश्वर के आस पास परिक्रमा करते है तो हमारी तरफ ईश्वर की सकारात्मक शक्ति आकृष्ट होती है और जीवन की नकारात्मकता घटती है।कई बार हम स्वयं के इर्द गिर्द ही प्रदक्षिणा कर लेते है।इससे भी ईश्वरीय शक्ति आकृष्ट होती है।नकारात्मकता से ही पाप उत्पन्न होते है।तभी तो ये मन्त्र प्रदक्षिणा करते समय बोला जाता है --
यानी कानी च पापानि , जन्मान्तर कृतानि च।
तानी तानी विनश्यन्ति , प्रदक्षिण पदे पदे।।

- तीर्थ स्थलों की,प्राण प्रतिष्ठित ईश्वरीय प्रतिमा की, पवित्र वृक्ष की, यज्ञ या हवन कुंड की परिक्रमा की जाती है जिससे उसकी सकारात्मक शक्ति हमारी तरफ आकृष्ट हो।सूर्य को देखकर या मूर्ति के सामने हम अपने इर्द गिर्द ही घूम लेते हैं।

भगवान की परिक्रमा का धार्मिक महत्व तो है ही, भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है, सुरक्षा प्राप्त होती है और पापों का नाश होता है। पग-पग चलकर प्रदक्षिणा करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। सभी पापों का तत्क्षण नाश हो जाता है। प्रदक्षिणा करने से तन-मन-धन पवित्र हो जाते हैं व मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। जहां पर यज्ञ होता है वहां देवताओं साथ गंगा, यमुना व सरस्वती सहित समस्त तीर्थों आदि का वास होता है।प्रदक्षिणा या परिक्रमा करने का मूल भाव स्वयं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से भगवान के समक्ष समर्पित कर देना भी है।

परिक्रमा करने का व्यावहारिक और वैज्ञानिक पक्ष वास्तु और वातावरण में फैली सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा है। दरअसल, भगवान की पूजा-अर्चना, आरती के बाद भगवान के उनके आसपास के वातावरण में चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित हो जाती है इस सकारात्मक ऊर्जा के घेरे के भीतर चारों और परिक्रमा करके व्यक्ति के भीतर भी सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता और नकारात्मकता घटती है। इससे मन में विश्वास का संचार होकर जीवेषणा बढ़ती है।

भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों....
शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है, वह इसलिए कि शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

'अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत इति वाचनान्तरात।'

शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।
सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करने का शास्त्र का आदेश है।शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए सोमसूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है, लेकिन ‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बाईं ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जलस्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।

Monday, 5 March 2018

अनहद नाद । कृपाशंकर जी

किसी भी मंदिर में जहाँ ठाकुर जी की आरती विधि विधान से होती है वहाँ नियमित रूप से आरती के समय जाने पर ह्रदय में भक्ति निश्चित रूप से जागृत होती है| आरती के समय बजाये जाने वाले घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व शंख आदि की ध्वनि अनाहत चक्र पर चोट करती है| अनाहत चक्र से ही आध्यात्म का आरम्भ होता है और वहीं भक्ति का जागरण होता है| अनाहत चक्र का स्थान है मेरु दंड में ह्रदय की पीछे थोडा सा ऊपर पल्लों (shoulder blades) के बीच में| जो साधक नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें अनाहत चक्र के जागृत होने पर ऐसी ही ध्वनि सुनती है जो ह्रदय में दिव्य प्रेम की निरंतर वृद्धि करती है| उसी ध्वनी की ही नक़ल कर भारत में आरती के समय मंदिरों में घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व टाली आदि बजाने की परम्परा आरम्भ की गयी| मंदिरों में होने वाली घंटा ध्वनि भी अनाहत चक्र को आहत करती है| फिर मंदिरों के शिखर आदि के बनाने की शैली भी ऐसी होती है कि वहां दिव्य स्पंदन बनते हैं और खूब देर तक बने रहते है| वहां जाते ही शांति का आभास होता है|

Wednesday, 21 February 2018

ब्रह्मचर्य - वीर्य रक्षण - योग-साधना

ब्रह्मचर्य - वीर्य रक्षण - योग-साधना"।

-----------------------

1. वीर्य के बारें में जानकारी -

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है।
40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है।
एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है । जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है।

सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते है ।।
--------------------------

2. वीर्य को पानी की तरह रोज बहा देने से नुकसान -

शरीर के अन्दर विद्यमान ‘वीर्य’ ही जीवन शक्ति का भण्डार है।
शारीरिक एवं मानसिक दुराचर तथा प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक मैथुन से इसका क्षरण होता है। कामुक चिंतन से भी इसका नुकसान होता है।

मैथून के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है।
रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है। ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। खोखला होता जाता है इन्सान ।

स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है -
1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना।
२. सविलास की क्रीड़ा करना।
3. स्त्री के रुप यौवन की प्रशंसा करना।
4. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना।
5. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया।

इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया आदि इसमें शामिल है।
शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगते हैं और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है।
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है। अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता।
धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तानोत्पत्ति और बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है।

मैथुन क्रिया से होने वाले नुकसान निम्रानुसार है-
* शरीर की जीवनी शक्ति घट जाती है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
* आँखो की रोशनी कम हो जाती है।
* शारीरिक एवं मानसिक बल कमजोर हो जाता है।
* जिस तरह जीने के लिये ऑक्सीजन चाहिए वैसे ही ‘निरोग’ रहने के लिये ‘वीर्य’।
* ऑक्सीजन प्राणवायु है तो वीर्य जीवनी शक्ति है।
* अधिक मैथुन से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाता है।
* चिंतन विकृत हो जाता है।

वीर्यक्षय से विशेषकर तरूणावस्था में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं -

चेहरे पर मुँहासे , नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखाएँ, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, दुर्बलता, आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, शिरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्नदोष व मानसिक अशांति।

अगर ग्रुप में किसी भाई को ये समस्याएँ हैं तो उपाय भी लिख रहा हूँ -

लेटकर श्वास बाहर निकालें और अश्विनी मुद्रा अर्थात् 30-35 बार गुदाद्वार का आकुंचन-प्रसरण श्वास रोककर करें।
ऐसे एक बार में 30-35 बार संकोचन विस्तरण करें। तीन चार बार श्वास रोकने में 100 से 120 बार हो जायेगा।
यह ब्रह्मचर्य की रक्षा में खूब मदद करेगी। इससे व्यक्तित्व का विकास होगा ही, व ये रोग भी दूर होंगे समय के साथ ।।
---------------------------

3. वीर्य रक्षण से लाभ -

शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है।
ऐसे व्यक्ति को जल्दी से कोई रोग नहीं होता है उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है ।

पहले के जमाने में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। और उस वक्त में यहाँ वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए ।

भगवान बुद्ध ने कहा है - ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’

स्वामी रामतीर्थ ने कहा है - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।

पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन होने पर योगी पश्चाताप करता है।

भगवान शंकर ने कहा है-
'इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान महिमा हुई है।'

कुछ उपाय -

ब्रह्मचर्य जीवन जीने के लिये सबसे पहले ‘मन’ का साधने की आवश्यकता है।
भोजन पवित्र एवं सादा होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए।
----
1. प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएँ।
2. तेज मिर्च मसालों से बचें। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन करें।
3. सभी नशीले पदार्थों से बचें।
4. गायत्री मन्त्र या अपने ईष्ट मन्त्र का जप व लेखन करें।
5. नित्य ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करें।
6. मन को खाली न छोड़ें किसी रचनात्मक कार्य व लक्ष्य से जोड़ रखें।
7. नित्य योगाभ्यास करें। निम्न आसन व प्राणायाम अनिवार्यत: करें-
आसन-पश्चिमोत्तासन, सर्वांगासन, भद्रासन प्राणायाम- भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम विलोम।

जो हम खाना खाते हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है।खाना खाने के बाद रस बनता है जो कि नाडियों में चलता है।फिर बाद में खून बनता है।इस प्रकार से यह क्रम चलता है और अंत में वीर्य बनता है।
वीर्य में अनेक गुण होतें हैं।
क्या आपने कभी यह सोचा है कि शेर इतना ताकतवर क्यों होता है?वह अपने जीवन में केवल एक बार बच्चॉ के लिये मैथुन करता है।जिस वजह से उसमें वीर्य बचा रहता है और वह इतना ताकतवर होता है।
जो वीर्य इक्कठा होता है वह जरूरी नहीं है कि धारण क्षमता कम होने से वीर्य बाहर आ जायेगा।वीर्य जहाँ इक्कठा होता है वहाँ से वह नब्बे दिनों बाद पूरे शरीर में चला जाता है।
फिर उससे जो सुंदरता,शक्ति,रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि बढती हैं उसका कोई पारावार नहीं होता है।
-------------------------

4. पत्नी का त्याग नहीं करना है -

ब्रह्मचर्य में स्त्री और पुरुष का कोई लेना देना ही नहीं है।
प्राचीन काल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे, ऋषि पत्नियां भी बहुत जागृत और ग्यानी होती थी। आत्मसाक्षात्कार का जितना अधिकार पुरुषो को था उतना ही स्त्रियों को भी था।
ब्रह्मचर्य को पूर्ण गरिमा प्राचीन काल में ही मिली थी। मैंने एक कथा सुनी थी, एक ऋषि ने अपने पुत्र को दुसरे ऋषि के पास सन्देश लेकर भेजा था, पुत्र ने पिता से कहा की राह में एक नदी पड़ती है, कैसे पार करूँगा।
ऋषि ने कहा जाकर नदी से कहना,अगर मेरे पिता ने एक पल भी ब्रह्मचर्य का व्रत ना त्यागा हो, स्वप्न में भी नहीं, तो हे नदी तू मुझे रास्ता दे दे।
कथा कहती है की नदी ने रास्ता दे दिया। कैसा विरोधाभास है, एक पुत्र का पिता और ब्रह्मचारी , कैसे ?
जाहिर है कि संभोग एक बार सन्तानोपत्ति के लिए किया गया था , आनंद के लिए नहीं ।
बुद्ध और महावीर के बाद हज़ारों युवक अपनी पत्नियों को घर को छोड़ कर भिक्षु बन गए , तब ब्रह्मचर्य का अर्थ सिर्फ स्त्री निषेध बन गया।

नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग के बिना सृष्टि का व्यवस्थाक्रम नहीं चल सकता।
दोनों का मिलन कामतृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होता, वरन घर बसाने से लेकर व्यक्तियों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवित्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही सम्भव होता है।

अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों की, पाप-पतन की जड़ है।
इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
इस सनक में लोग घर छोडक़र भागने में, स्त्री बच्चे को बिलखता छोडक़र भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े।

तंत्र के पथिको ने आज्ञा चक्र में अर्ध नारीश्वर की कल्पना की है, यह कल्पना नहीं यथार्थ है, विज्ञान भी स्वीकारता है, की, हर स्त्री में एक पुरुष विद्यमान है और हर पुरुष में एक स्त्री।

जब साधक या साधिका की चेतना आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है, जब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र का भेदन करती है तो काम ऊर्जा राम ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है, साधक जीव संज्ञा से शिव संज्ञा में प्रविष्ट हो जाता है।
आज्ञा चक्र में पुरुष साधक को अपने भीतर की स्त्री का दर्शन होता है और स्त्री साधक को अपने भीतर के पुरुष का, जैसे ही यह दर्शन मिलता है, वैसे ही बाहर की स्त्री या पुरुष विलीन हो जाता है, खो जाता है।
बाहर की स्त्री या पुरुष में रस ख़त्म हो जाता है, आप अपने भीतर के पुरुष या स्त्री को पा लेते हैं, और साथ ही आप आतंरिक या आध्यात्मिक सम्भोग के रहस्य को जान लेते हैं, जो पंचमकार का एक सूक्ष्म मकार है।
यह बिलकुल उसी तरह होता है , जैसे खेचरी मुद्रा में साधक ललना चक्र से टपकने वाली मदिरा का पान करके आनंद में रहता है। जैसे ही आपको भीतर का सौंदर्य मिलता है, बाहर का सौंदर्य खो जाता है ।
संसार की स्त्री या पुरुष में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है, कोई रस नहीं रह जाता है, यही वो घडी है, जब ब्रह्मचर्य आपके भीतर से प्रस्फूटित होता है. अब आप वो नहीं रहे आप रूपांतरित हो जाते हैं, यही वो जगह है जहाँ शिवत्व घटता है ।

5. कमेन्टस में चर्चा -

एक बात ध्यान रखना है चर्चा में कि यहाँ माता-बहने भी हैं तो शब्दों का ख्याल रखना है , कामुक या गंदे शब्दों से परहेज करना है जहां तक हो सके ।

शादीशुदा व्यक्ति पूर्ण ब्रह्मचर्य ना रख सकें तो भी संयमित जीवन अवश्य व्यतीत करना चाहिए ।

अगर कोई कहता है कि यौन इच्छाओं को दबाने से नपुंसकता आ जाएगी या दबाने से अच्छा है भोग लो , तो भाई ऐसा है कि उपर लिखी दिनचर्या अपनाओगे तो यौन इच्छाएँ पैदा ही नहीं होगी ,
मन निर्मल तो तन निर्मल ।।

अगर कोई कहे कि संभोग 8-10 दिन इतना ज्यादा करो कि घृणा हो जाए , तो भाई ऐसा है कि नसें उभर आएंगी , पीड़ा भी महसूस करोगे , संभोग से मन उचट भी जाएगा , परन्तु .....
महिने 2-3 में वीर्य बनने पर , कामुक साहित्य , नेट पर अशलील चीजें देखने पर , नारी को गलत भावना से देखने पर फिर से काम वेग उठेगा , तुम फिर बह जाओगे।

इसलिए ये सोचना बिल्कुल गलत होगा कि 8-10 दिन जमकर करो तो घृणा हो जाएगी सदा के लिए । ।

साधना पर भी प्रभाव पडेगा , जो व्यक्ति कामुक है , उसके विचार भी वैसे चलेंगे , ज्यादा वीर्य नष्ट करने से शरीर में शक्ति का संचार कम होगा , वह 1 घण्टे तक ज्ञान मुद्रा में ही नहीं बैठ पाएगा ।