Thursday, 11 April 2019

शरणागति _ करपात्री जी

शरणागति करपात्री जी

*शरणागति*

‘मामेकं शरणं ब्रज’= मामेकमद्वितीयं शरणमाश्रयं व्रज निश्चिनु, यथा घटाकाशस्याश्रयो महाकाशः तरंगस्याश्रयो महासमुद्रः।

सब धर्मां का परित्याग करके मूल एक अद्वितीय अखण्ड परमात्मा की शरण ग्रहण करो। शरण क्या है? ‘शरणं गृहरक्षित्रौः’ शरण का अर्थ है आश्रय और रक्षिता। ‘मामेकं अद्वितीयं परमात्मानं शरणं= आश्रयं, ब्रज=अवगच्छ। ‘ब्रज गतौ’ मुझ एक अनन्त अखण्ड परात्पर परमात्मा को ही अपना आश्रय जानो, जैसे तरंग अपना आश्रय महासमुद्र को जाने, जैसे घटाकाश अपना आश्रय महाकाव्य को जाने, जैसे उत्पल की नीलिमा अपना आश्रय उत्पल को जाने, जैसे कटक, मुकुट, कुण्डल अपना आश्रय अखण्ड सुवर्ण को जानें। इस प्रकार से ‘मां एकं अद्वितीयं परमात्मानं शरणमाश्रयं व्रज अवगच्छ निश्चिनु’ यही कल्याण का रास्ता है। ‘भगवान ही हमारे आश्रय हैं, तरंग का आश्रय महासमुद्र जैसे है।’ यह निश्चय करना चाहिये। जीवात्मा के आश्रय-अनन्त ब्रह्माण्डधिष्ठान स्वप्रकाश परात्पर परब्रह्म हैं। अथवा ‘शरणं’ माने ‘रक्षितारं’ है। ‘मां एकं परमात्मानं रक्षितारं निश्चिनु’ = मुझ एक अखण्ड परमात्मा को ही अपना रक्षिता जानो। भगवान ही रक्षिता हैं। एक बात है- ‘स एनमविदितो न भुनिक्ति’ वेद कहता है- ‘देवता का जब तक साक्षात्कार नहीं होता, तब तक देव पालक नहीं होता, रक्षा नहीं करता।’ एतदर्थ देव का साक्षात्कार होना चाहिये। इसलिये ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः विद्यतेअयनाय इसलिये भगवत्स्वरूप का साक्षात्कार करना चाहिये और उन्हीं को अपना रक्षिता समझना चाहिये। भगवान रामचन्द्र राघवेन्द्र ने भी यही कहा कि-

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।

(जो एक बार भी शरण में आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षा की प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों से अभय कर देता हूँ। यह मेरा सदा के लिये व्रत है।)

सारे दृश्य प्रपंच से विरक्त होरक अर्थात भगवद्भिन्न सारे पदार्थों से विमुख निराश होकर एकमात्र सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् प्रभु को ही प्राप्त होना ‘प्रपत्ति’ है।

भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः।
परित्यकता मया लंका मित्राणि च धनानि च ।।

(हे श्रीरामभद्र! आप समस्त प्राणियों को शरण देने वाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है। अपने सभी मित्र, धन और लंकापुरी को छोड़कर आया हूँ।)
इसलिये सर्वपरित्यागपूर्वक भगबत्प्रपत्ति, भगवत्-शरणागति बड़ी ऊँची बात है। इससे तत्क्षण कल्याण होता है, देरी की कोई बात ही नहीं।

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।
सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बाँध बरि जोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिये मोरे। धस्उ देह नहि आन निहोरें।।

ऐसी भगवत्प्रपत्ति बहुत ऊँची है। अच्छा यह न बन सके तो, ‘तवास्मीति चयायते’ यह याच्णा करो कि हे प्रभो! हमें स्वीकार कर लीजिये।’ भक्तों ने कहा- ‘महाराज! आपने यह प्रतिज्ञा अकेले में नहीं की है, तीर्थ में की हैं। किस तीर्थ में? समुद्र में। सारे तीर्थ उसी में तो जाते हैं। गंगा भी वहीं जाय, यमुना भी वहीं जाय। तीर्थों का अधिष्ठान है समुद्र। उनके किनारे आपने प्रतिज्ञा की। अकेले नहीं थे आप, ऋषि थे, महर्षि थे, बन्दर भालु थे, इन सबके मध्य आपने प्रतिज्ञा की। इसलिये मुकर नहीं सकते महाराज! और महाराज श्रीरामचन्द्र मुकरें भी कैसे? तुलसीदास जी महाराज के राम तो कहते हैं-

शरणागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पाँवर पापमय तिन्हहिं विलोकत हानि।।

‘‘जो शरणागत को त्याग देता है अपना अनहित-अहित समझकर, वह नर पामर है, पापमय है, उसके दर्शन में पाप लगता है।’’ ऐसे प्रभु कभी मुकर सकते हैं? कभी नहीं। श्रीरामभद्र ने वाल्मीकि- रामायण में कपोत का दृष्टान्त दिया है। कपोत के शरण कोई व्याध आया। शरण माने घर। अर्थात जिस पेड़ पर कपोत रहता था, उस वृक्ष के नीचे कोई व्याध भी ऐसा था जिसने कपोत की कपोती को अपने जाल में फँसा रक्खा था। शत्रु-सरीखा व्याध उसके शरण आया। जाड़े में वह ठिठुर रहा था। कपोत ने अतिथि का सत्कार करना चाहा, उसके प्राणों को बचाना चाहा। कहीं से जलती हुई लकड़ी ले आया। इधर-उधर से लकड़ियों को बटोर कर उस पर रखा। अग्नि प्रज्वलित कर अतिथि को शीत से बचा लिया। फिर कपोत ने सोचा यह अवश्य ही भूखा है, स्वयं ही अग्नि में कूद पड़ा-‘लो भैया, इस अग्नि में मुझे भून करके भूख मिटालो’ श्रीराम ने यह दृष्टान्त दिया।
उन्होंने कहा- शरणागत का इतना महत्त्व है। पक्षियों ने भी शरणागत को महत्त्व दिया है। हम राघव-कुल में उत्पन्न हैं, फिर शरणागत की रक्षा क्यों न करें?

श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः।
अचितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैनिमन्त्रितः।।
स हि तं प्रतिजग्राह भार्याहर्तारमागतम्।
कपोतो वानर श्रेष्ठ! किं पुनर्मद्विधो जनः।।

भगवान रामचन्द्र ने सुग्रीव से कहा- यदि रावण ही आया हो तो भी लौटकर पूछने की जरूरत नहीं है, ले आना। विभीषण हो अथवा रावण- जो भी आया हो, ले आओ। सदोष हो तो भी भूषण है। सदोष शरणागत को ग्रहण करना यह तो भूषण है।

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम्।।

शरणागति एक बहुत ऊँची चीज है, परन्तु उसमें एक खतरा है। यह ब्रह्मास्त्र है, ब्रह्मास्त्र जिसके ऊपर प्रयुक्त हो गया, उसके ऊपर यदि दूसरा बन्धन डाल देंगे तो वह विफल हो जायगा। मेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मास्त्र डाला। ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए हनुमान जी उससे निबद्ध हो गये। मेघनाद जरा आराम करने लगा। युद्ध करते-करते थक गया था। इधर राक्षसों ने सोचा यह बन्धन तो बड़ा कमज़ोर है। बड़ी-बड़ी श्रृखलाओं को लाकर हनुमान को बाँध दिया। मेघनाद की आँखें खुलीं। उसने देखा- हनुमान को इन राक्षसों ने लोहमयी श्रृखंलाओं से बाँध रखा है। उसने सोचा- इन दुष्टों ने बड़ा काम खराब किया। ब्रह्मास्त्र तो दूसरा बन्धन सहन करता ही नहीं। ब्रह्मास्त्र का प्रभाव तो जाता रहा है। इस हनुमान के लिये श्रृखलायें भला क्या चीज है’। इसी तरह भगवत-शरणागति दूसरी शरणागति को सहन नहीं करती।

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा विश्वासा।।

वेदान्तदेशिकाचार्य जी कहते हैं-

दुरीश्वरद्वारबहिवितदिकादुरासिकायै रचितोअयमंजलिः।
यदंजनाभं निरपायमस्ति मे धनंजयस्यन्नदनभूषणं धनम्।।

अर्थात् दुरीश्वरों के द्वार की बहिर्वितर्दिका पर दुराशा को लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया, क्योंकि हमारे पास तो धनंजय के रथ का अति सुन्दर अंजनाथ श्रीकृष्ण ही अनपाय-धन हैं। फिर हमें और की क्या आवश्यकता है? किसी ने चातक से कहा है-

रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूतया
मम्भोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वेअपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचितद् वृथा
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः।।

अर्थात अरे हे मित्र! यह तू पीहू-पीहू करता है बादल को देखते ही। जानता है? आकाश में बहुत ढंग के बादल होते हैं, कोई अपनी वृष्टि से वसुधा को आर्द्र करते हैं, कोई केवल गर्जन-तर्जन करते हैं, एक बिन्दु डालते नहीं। बहुत से संसार में व्यक्ति हैं, जो आया उसी के सामने ‘त्राहि मां-त्राहि मां, यह पद्धति गलत है।

*शरण्य की शरणागति*

हाँ एक बात है, ऐसा नहीं कि शरणागति दूसरी नहीं करनी चाहिये। इष्ट शरणागति के अनुकूल जो शरणागति हो, वह स्वीकार करने योग्य है।
‘श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये’
श्रीराम की शरणागति ग्रहण करोगे तो उसमें पुष्टि के लिये रामदूत-हनुमान् की शरणागति भी आवश्यक होगी। इसी दृष्टि से शरण्य की शरणागति अपेक्षित है, हरेक की नहीं। श्रीराम भगवान भी शरण हुए समुद्र के ‘समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति’, परन्तु उनकी शरणागति कहाँ सफल हुई? विफल हो गयी।

*शरण्य का स्वरूप*

शरण्य में क्या होता है? सर्वोश्वरत्व, सर्वकारणत्व, सर्वशेषित्व और सुलभत्व। ये शरण्य के प्रयोजक है। कौन शरण्य हो सकता है? जो सर्वोश्वर हो, सर्वकारण हो, सर्वशेषी हो और सर्व सुलभ हो। विभीषण की सहरणागति सफल हुई, क्योंकि उसने शरण्य ठीक चुना। भगवान राम सर्वेश्वर, सर्वकारण, सर्वशेषी और सर्व सुलभ भी हैं, पर उनसे भी ज्यादा सुलभ श्री जी है। श्रीराम को अनन्त ब्रह्माण्ड के उत्पाद, पालन और संगरण के प्रपञ्च में संलग्न रहना पड़ता है और सब सर्ते उनमें भी ठीक हैं। सर्वेश्वरत्व भी उनमें है, सर्वंशेषित्व भी उनमें है, सर्वकारणत्व भी उनमें है।

*शरणागति एक बार या बार-बार?*

एक विचार और है, शरणागति बार-बार या एक बार? महानुभावों ने विचार किया है-

‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत्’

सर्व प्राप्ति के लिये ज्योतिष्टोम का अनुष्ठान बार-बार करने की आवश्यकता नहीं, एक बार ही पर्याप्त है। एक बार के अनुष्ठान से ही स्वर्ग प्राप्ति निश्चित हो गयी, क्योंकि आवृत्ति का विधान नहीं है। इसी प्रकार एक बार शरणागति हो गई तो काम हो गया। लेकिन एक बार ही वेदान्त श्रवण से काम नहीं चलेगा-

‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्।’

सूत्रार्थः- प्रत्यय की आवृत्ति करनी चाहिये, क्यों कि ‘श्रोतव्यो मन्त्व्यः’ आदि श्रुतियों में इस प्रकार का बार-बार उपदेश है। वेद में लिखा है- ‘व्रीहीनवहन्ति’ ‘धानों को कूटे’ कितने बार मूसल चलाये? एक बार मूसल चलाने पर भी अवघात हो गया, परन्तु नहीं-

यावत्तण्डुलनिष्पत्ति र्न स्यात्

‘यावत्पर्यन्त तण्डुलनिष्पत्ति न हो तावत्पर्यन्त अवघाव करे’ इसी प्रकार वेदान्त श्रवण की सीमा है अपरोक्ष साक्षात्कार। वह जब तक न हो तब तक ममन, निदिध्यासन करते चलो। लेकिन शरणागति के लिये ऐसी-कोई बात नहीं। एक बार भी शरणागति हो गई तो ठीक है। सर्वेश्वरत्व, सर्वकारणत्वत्व, सर्वशेषित्व, सुलभत्व और वात्सल्यपूर्ण मातृत्व की दृष्टि से श्री जी की शरणागतिः- शरण्य के सम्बन्ध में आचार्यों ने विचार किया है। श्रीमन्नारायण और श्री जी के स्वरूप पर आचार्यों में मतभेद है। वेदान्तदेशिक की और भिन्न-भिन्न आचार्यों का दृष्टियाँ हैं, उसके साथ यह भी एक दृष्टि है-

एकंज्योतिरभूद्रेधा राधामाधवरूपकम्

एक अनन्त-अखण्ड-निर्विकार ब्रह्मज्योति ही गौर-तेज और श्याम तेज के रूप में प्रकट हुयी। इस तरह श्रीराधा-माधव दोनों एक ही हैं। एक ही अनन्त-अखण्ड-निर्विकार ब्रह्मज्योति श्रीमन्नारायण परात्पर परब्रह्म विष्णु और ऐश्वर्य-माधुर्य की अधिष्ठात्री भगवती महालक्ष्मी के रूप में, श्रीसीता और श्रीराम के रूप में प्रकट हुई है। ऐसा होने पर भी श्री जी में सुलभता अधिक है। सर्वेपूरकत्व, सर्वशक्तिमत्व उनमें है। सर्वकारणत्व, सर्वशोषित्व उनमें है। सुलभत्व तो उनसे ज्यादा और किसी में है ही नहीं। महाराज श्रीकरपात्री जी ।
(एक प्रमाद यहाँ तृषित निवेदन कर रहा है कि श्रीजी की शरणागति बनी या नहीं अथवा श्रीजी की शरणागति के फल का अनुभव कैसा होगा ??? श्रीजी शरणागति के फलस्वरूप ही श्रीजी की दासी (किंकरी-मंजरी) के प्रति शरणागति प्रकट होगी । श्रीजी किंकरी का जीवन में प्रवेश का अर्थ श्रीजी को विशेष ख्याल है सो निज परिकरि जीवन मे आई है वरण श्रीजी की किंकरी-मंजरी का चिन्तन ही स्फुरित नही होता है । जीवन श्रीजी की कृपा स्वरूप उनकी निज सखियों का सँग श्रीजी का ही प्रकट प्रेम है । तृषित । जयजय श्रीश्यामाश्याम जी ।

Wednesday, 27 March 2019

108 का रहस्य

*॥ 108 ॥ का रहस्य*

॥ॐ॥ का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है ।

॥ 108 ॥
यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय ( काल ) से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है। 

*★ आइये जाने संख्या 108 का रहस्य ★*

*स्वरमाला*

अ→1 ... आ→2... इ→3 ... ई→4 ... उ→5... ऊ→6  ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12
अं→13 ... अ:→14..
ऋॄ →15.. लॄ →16

*व्यंजनमाला*

क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ...
ङ→5 ... च→6... छ→7 ... ज→8 ...
झ→9... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ...
ड→13 ... ढ→14 ... ण→१15 ... त→16 ...
थ→17... द→18 ... ध→19 ... न→20 ...
प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ...
म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ...
व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ...
ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ... ज्ञ→36 ...
ड़ 37   ... ढ़ ... 38
--~~~ओ अहं = ब्रह्म ~~~--
ब्रह्म = ब+र+ह+म =23+27+33+25=108

*( 1 )*

यह मात्रिकाएँ (16स्वर +38 व्यंजन=54 ) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।।

*( 2 )*

मनुष्य शरीर की ऊँचाई
= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि
= ( 4 अँगुलियों) का 27 गुणा होती है।
= 4 × 27 = 108

*( 3 )*

नक्षत्रों की कुल संख्या = 27
प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4
जप की विशिष्ट संख्या = 108
अर्थात् ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये ।

*( 4 )*

एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य
★ पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=108
★ पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=108
अर्थात् मन्त्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिये।

*( 5 )*

हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म 3 प्रकार से होते है। अर्थात् 36×3=108। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम 108 अवश्य ही करना चाहिये।

*( 6 )*

सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। दिन-रात के 24 घंटों में से 12 घंटे सोने व गृहस्थ कर्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है 10800 बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए 10800 की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये 108 की संख्या निर्धारित करते हैं।

*( 7 )*

एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह
दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति
में 108000 बार कलाएं बदलता है।

*( 8 ) 786 का भी हिंदू आध्यात्मिक जवाब — ॥ 108 ॥*

*( 9 )*

ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या  को 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।

*( 10 )*

108 में तीन अंक हैं, 1, 0 , 8. इनमें एक “1" ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर १ है और मन भी एक है, शून्य “0" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “8" जीवात्मा को दर्शाता है क्योंकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के आठो मूल से  विरक्त हो कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “8" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “0" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “1" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “0" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “0" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , अर्थात शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “8" ईश्वर “1" से नहीं मिल पायेगा, पूर्णता ( 1+8 =9 ) को नहीं प्राप्त कर पायेगा ।
9 पूर्णता (पूर्णांक )का सूचक है।

*( 11 )*

1- ईश्वर और मन
2- द्वैत, दुनिया, संसार
3- गुण प्रकृति (माया)
4- अवस्था भेद (वर्ण)
5- इन्द्रियाँ
6- विकार
7- सप्तऋषि, सप्तसोपान
8- आष्टांग योग
9- नवधा भक्ति (पूर्णता)

*( 12 )*

वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार

अहंकार के गुण = 2
बुद्धि के गुण = 3
मन के गुण = 4
आकाश के गुण = 5
वायु के गुण = 6
अग्नि के गुण = 7
जल के गुण = 8
पॄथ्वी के गुण = 9
2+3+4+5+6+7+8+9 =
अत: प्रकृति के कुल गुण = 44
जीव के गुण = 10
इस प्रकार संख्या का योग = 54
अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = 54
एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = 54
दोंनों संख्याओं का योग = 108

*( 13 )*

संख्या “1" एक ईश्वर का संकेत है।
संख्या “0" जड़ प्रकृति का संकेत है।
संख्या “8" बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।
[ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ]
[ यही पवित्र त्रेतवाद है ]

संख्या “2" से “9" तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “0" रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “0" न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “1" की चेतना से “8" का खेल । “8" यानी “2" से “9" ।
यह “8" क्या है ? मन के “8" वर्ग या भाव ।

*ये आठ भाव ये हैं  ।*

1. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । 2. क्रोध । 3. लोभ । 4. मोह । 5. मद ( घमण्ड ) । 6. मत्सर ( जलन ) । 7. ज्ञान । 8. वैराग ।

एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है
——★ ॥ 108 ॥ ★——
इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।

*( 14 )*

सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें ।

इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ वसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियाँ पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।

रहस्यमय संख्या 108 का हिन्दू- वैदिक संस्कृति के साथ हजारों सम्बन्ध हैं जिनमें से कुछ का संग्रह है।



*श्रीहरि ज्योतिष केन्द्र*

Tuesday, 15 January 2019

प्रेमी का हृदय _ वियोगी हरि

*प्रेमी का हृदय* वियोगी हरि

प्रेम शून्य हृदय को हम कैसे हृदय कहें। हृदय तो वही, जो प्रेम रस से परिपूर्ण हो। सच पूछा जाय तो प्रेम का दूसरा नाम हृदय है, और हृदय का दूसरा नाम प्रेम। हृदयवान् अवश्य प्रेमी होगा और प्रेमी जरूर सहृदय होगा। प्रेमी पीर का मर्म हृदयवान् ही जानता है। इश्क की दीवानगी का मजा दिलदार ही उठा जानता है। अजी, जिस दिल में किसी के लिए दीवानगी न हो, वह दिल, मेरी अदना राय में, दिल ही नहीं। कहा भी है-

वह सर नही, जिसमें कि हो सौदा ना किसी का,
वह दिल नहीं, जो दिल न हो दीवाना किसी का।।

कितना करुणार्द्र और कोमल होता है प्रेमी का प्रमत्त हृदय! भावुकता ही भावुकता भरी होती है उसके अमल अंतस्तल में। प्रेम की सरसता उस पगले के हृदय में इतनी अधिक भर जाती है कि वह उसकी मस्तानी, रंगीली आँखों में छलकने लगती है। अहा! कैसा होता होगा वह प्रेमपूर्ण हृदय, कैसी होती होंगी वह मतवाली आँख

हिरदै माहीं प्रेम जो नैनों झलकै आय।
सोइ छका, हरि रस पगा, वा पग परसों धाय।। - चरणदास

क्यों न उस मतवाले दिलवाले के पैर चूम लिये जायँ। क्यों न उस दर्दवन्त संत की जूतियाँ उठाकर सर पर रख ली जायँ।

भाई, इसमें संदेह ही क्या कि हृदय न होता तो प्रेम भी न होता-

होता न अगर दिल तो मुहब्बत भी न होती।

आफ़त इतनी ही है कि अपना होकर भी वह प्रेम मतवाला हृदय किसी दिन अपना नहीं रह जाता। बेचारे दिलवाले को जबरन बेदिल हो जाना पड़ता है। गोया दिल का रखना कोई जुर्म है। कहाँ जाता है, क्या होता है, यह कौन जाने-

किस तरह जाता है दिल, बेदिल से पूछा चाहिए। - मज़हर
सुना है कि उसे अपने प्यारे दिल के छिन या लुट जाने पर भी दिल दीवानगी का एक खास आनन्द मिला करता है। यह भी सुना गया है कि उसकी सबसे पवित्र वस्तु किसी हठीले देवता के चरणों पर चढ़ जाती है, उसकी सबसे महँगी चीज किसी प्यारे गाहक के हाथ में पहुँच जाती है। उसे अपने बेजार दिल की कीमत भी खासी अच्छी मिल जाती है। खासकर उस दिल का दर्द तो उस अनोखे गाहक को बहुत पसंद आता है। एक बेदिल ने क्या अच्छा कहा है-

दर्दे दिल कितना पसंद आया उसे,
मैंने जब की आह, उसने वाह की।

खैर, अच्छा ही हुआ, तो ऐसा दर्दीला दिल बिक गया, छिन गया या लुट गया। सचमुच ऐसा दिल एक आफत ही है। उस्ताद जौक ने कहा है-

दिल का या हाल है, फट जाय है सौ जायसे और,
अगर यक जायसे हम उसको रफ़ू करते हैं।

अरे, रफू करके उस फटे कटे दिल का करते ही क्या! ऐसा हृदय तो जान मानकर गँवाया गया है। बात यह है न, कि मर मिटकर ही अपनी कोई प्यारी चीज हासिल होती है। दिल इसीलिए दे दिया गया है कि प्रियतम के मार्ग के प्रत्येक रज कण में वह समा जाय, या उस प्यारे की गली का वह, खुद ही जर्रः जर्रः बन जाय।

खूने जिगर से लिखी हुई ‘जिगर’ की सरस सूक्ति तो देखिये-

यों मिले इश्क में मिटकर मुझे हासिल मेरा,
जर्रः जर्रः तेरे कूचे का बने दिल मेरा।

हृदय का कैसा दिव्य रूपान्तर हो जाता है होगा उस दिन। दिल को इस तरह गँवा देने का यह गहरा भेद खुल जाने पर किस दिलवालों के दिल में बेदिल हो जाने की एक मीठी हूक न उठती होगी!

निर्मल तो बस प्रेमी का ही हृदय होता है। उसे हम एक स्वच्छ दर्पण कह सकते हैं-

हिरदै भीतर आरसी, मुख देखा नाहिं जाय।
मुख तो तबहीं देखसी, दिल की दुबिधा जाय।। - कबीर

दुविधा दूर हो जाय तो हम न केवल अपनी ही सूरत, बल्कि अपने मित्र का भी चित्र उस दर्पण में देख सकते हैं। कैसा सच्चा है वह दिल का आईना-

दिल के आईने में है तसबीरे यार,
जब जरा गर्दन झुकाई देख ली।

अपना सच्चा रूप और उस सिरजनहार साईं की सूरत हृदय दर्पण में हम प्रेम की मदिरा पीकर जरूर देख सकते हैं। धन्य है प्रेमी का हृदय मुकुर, जिसमें उस प्यारे मित्र की झाईं सदा झिलमिलाया करती है। वह तसबीर दिल के आईने में उतर कैसे आती है। कहाँ से आकर वह अपनी अलबेली तसबीर दिल पर खिंचा जाता होगा! भीतर के कपाट तो सदा बंद ही रहते हैं। दिल खुलता ही कब है?

खुलता नहीं दिल बन्द ही रहता है हमेशा,
क्या जाने कि आ जाता है तू इसमें किधर से। - जौक

कविवर विहारी अपने आश्चर्य को और भी अनोखे ढंग से प्रकट कर रहे हैं! कहते हैं-

देखौं जगत बैसिये, साँकर लगी कपाट।
कित ह्वै आवतु जातु मजि को जाने किहिं बाट।।

कौन जाने, वह काला चोर किधर होकर आता है और दिल पर अपना चित्र खिंचाकर किस राह से कब भाग जाता है!

हाय री, प्रेममय हृदय की विरह वेदना! कितनी करुणा और सरसता बहा करती है तेरी धवलधारा के साथ! किसे थाह मिली है तेरी तरुण तरलता की। कौन यथार्थ वर्णन कर सकता है तेरी मधुमयी मनोज्ञता का! स्वयं हृदय भी शक्तिहीन हो गया है। दिल में भी अब ताकत नहीं, जो अपनी वेदना का चित्र खींचकर किसी को दिखा सके। उसे पड़ी ही क्या अपनी तसबीर खिंचाने और फिर उसे दुनियाँ को दिखाने की। प्रेमी के पास सिवा उसके वेदनामय हृदय के और है ही क्या! अपने प्रियतम के प्रीत्यर्थ यही प्रेमी की सबसे प्यारी वस्तु है, सबसे पवित्र भेंट है। उसे आप प्रीति के उपहार में देते अपने प्रेमपात्र से किस सादगी के साथ कहते हैं-

मैं जाता हूँ दिल को तेरे पास छोड़े,
मेरी याद तुझको दिलाता रहेगा।। - दर्द

यही पागल हृदय प्रेमी का हृदय है। यही दिल वह दिल है जो किसी का दीवाना हो चुका है। यह वही दिल है जिस पर कवि ने कहा है-

दिल वही दिल है कि जिस दिल में तेरी याद रहे।  *वियोगी हरि*

Monday, 15 October 2018

प्रेम आदि अष्ट सीढ़ी

पूर्व जन्म में किसी महत पुरुष के सङ्ग रूप भाग्य के उदित होने पर जीव में *श्रद्धा* उदित होती है, फिर उसे *साधुसंग* प्राप्त होता है। साधुसंग से श्रवण कीर्तनादी *भजनक्रिया* आरम्भ होती है, उस से *अनर्थ निवृति* दुर्वसनादि का नाश होता है। अनर्थनिवृति से भक्ति अंगों में अधिक *निष्ठा* उत्पन्न होती है। निष्ठा सहित भक्ति अंगों का अनुष्ठान करते करते श्रवण कीर्तनादी में *रुचि* उत्पन होती है, जिससे भक्ति अंगों में *आसक्ति* होती है। आसक्ति के गाढ़ होने पर *भाव* कृष्णरति का उदय होता है अर्थात चित की मलिनता दूर होंने पर चित्त जब शुद्धसत्व के आविर्भाव की योग्यता प्राप्त करता है तब श्री कृष्णा द्वारा सर्वदा निक्षिप्त ह्लादिनीशक्ति की वृत्ति विशेष का साधक के चित्त में आविर्भाव होता है। यही रति गाढ़ होकर *प्रेम* नाम को प्राप्त होती है, जो श्री कृष्ण सेवा प्राप्ति का मुख्य हेतु है

Monday, 8 October 2018

राधाकृष्णाष्टकम्

॥ राधाकृष्णाष्टकम् ॥

कृष्णप्रेममयी राधा राधाप्रेममयो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (१)
भावार्थ : श्रीराधारानी, भगवान श्रीकृष्ण में रमण करती हैं और भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराधारानी में रमण करते हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (१)

कृष्णस्य द्रविणं राधा राधायाः द्रविणं हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (२)
भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण की पूर्ण-सम्पदा श्रीराधारानी हैं और श्रीराधारानी का पूर्ण-धन श्रीकृष्ण हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (२)

कृष्णप्राणमयी राधा राधाप्राणमयो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (३)
भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण के प्राण श्रीराधारानी के हृदय में बसते हैं और श्रीराधारानी के प्राण भगवान श्री कृष्ण के हृदय में बसते हैं , इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (३)

कृष्णद्रवामयी राधा राधाद्रवामयो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (४)
भावार्थ : भगवान श्रीकृष्ण के नाम से श्रीराधारानी प्रसन्न होती हैं और श्रीराधारानी के नाम से भगवान श्रीकृष्ण आनन्दित होते है, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (४)

कृष्ण गेहे स्थिता राधा राधा गेहे स्थितो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (५)
भावार्थ : श्रीराधारानी भगवान श्रीकृष्ण के शरीर में रहती हैं और भगवान श्रीकृष्ण श्रीराधारानी के शरीर में रहते हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (५)

कृष्णचित्तस्थिता राधा राधाचित्स्थितो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (६)
भावार्थ : श्रीराधारानी के मन में भगवान श्रीकृष्ण विराजते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के मन में श्रीराधारानी विराजती हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (५)

नीलाम्बरा धरा राधा पीताम्बरो धरो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (७)
भावार्थ : श्रीराधारानी नीलवर्ण के वस्त्र धारण करती हैं और भगवान श्रीकृष्णपीतवर्ण के वस्त्र धारण करते हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (७)

वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (८)
भावार्थ : श्रीराधारानी वृन्दावन की स्वामिनी हैं और भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावन के स्वामी हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (८)

श्रीकुन्जबिहारी ! श्रीहरिदास !!
जय जय श्री राधे !

Wednesday, 3 October 2018

भक्त लक्षण

*भक्त लक्षण*

1. सर्व-भूतेषु यः पश्येत् भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥
अर्थः
सब भूतों में परमेश्वर स्वरूप अपनी ही आत्मा को और परमेश्वरस्वरूप अपनी आत्मा में सब भूतों को जो देखता है, वह ‘भागवतोत्तम’ ( उत्तम कोटि का भगवद्भक्त ) है।

2. ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥
अर्थः
जो भक्त ईश्वर में प्रेम, उनके भक्तों से मित्रता, मूढ़जनों पर कृपा और शत्रु की उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटि का भक्त है।

3. अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः।।
अर्थः
जो श्रद्धा से केवल भगवान के विग्रह को पूजना चाहता है, लेकिन उनके भक्तों और दूसरे लोगों को जो श्रद्धा से पूजना नहीं चाहता, वह प्राकृत यानि कनिष्ठ भक्त हैं।

4. गृहीत्वाऽपींद्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर् मायां इदं पश्यन् स वै भागवतोत्तमः॥
अर्थः
यह समस्त विश्व सर्वव्यापी ईश्वर की माया है, यह ज्ञान होने के कारण, इंद्रियों से विषयों का ग्रहण करते हुए भी जिसे हर्ष या विषाद नहीं होता, वह उत्तम भक्त है।

5. देहेंद्रिय प्राण मनो धियां यो
जन्माप्यय-क्षुद्-भय-तर्ष-कृच्छैः।
संसारधर्मैर् अविमुह्यमानः
स्मृत्या हरेर् भागवतप्रधानः॥
अर्थः
देह इंद्रिय प्राण मन और बुद्धि के, जन्म मृत्यु क्षुधा भय तृषा के कारण दुःखदायी जो संसार-धर्म उनसे, हरि-स्मरण के कारण जो मोहग्रस्त नहीं होता, वह भागवतों में श्रेष्ठ है।

6. न काम-कर्म-बीजानां यस्य चेतसि संभवः।
वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः॥
अर्थः
जिसके चित्त में काम, कर्म और इन दोनों का बीज अविद्या उत्पन्न नहीं होती और वासुदेव ही जिसके एकमात्र घर हैं, आश्रय हैं, वह उत्तम भागवत है।

7. न यस्य जन्म-कर्मभ्यां न वर्णाश्रम-जातिभिः।
सज्जतेऽस्मिन् अहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः॥
अर्थः
जिसे जन्म-कर्म या वर्णाश्रम और जाति के कारण इस देह में अहंभाव नहीं चिपकता, सचमुच वही हरि का भक्त है।

8. न यस्य स्वः पर इति वित्तेषवात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शांतः स वै भागवतोत्तमः॥
अर्थः
जो धन-संपत्ति या शरीरादि में ‘यह अपना है, यह पराया’ ऐसा भेद नहीं करता, जो सब प्राणियों के साथ समभाव से व्यवहार करता और सर्वदा शांत रहता है, सचमुच वह उत्तम भागवत है।

9. त्रिभुवन-विभव-हेतवेऽप्यकुंठ-
स्मृतिरजितात्म-सुरादिभिर् विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविंदात्
लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्यः॥
अर्थः
त्रिभुवन के वैभव के लिए भी जिसके हरि स्मरण में व्यवधान नहीं पड़ता और भगवन्मय बने देवादिकों को भी शोध्य उन भगवान के चरण-कमलों से जो आधा पल भी दूर नहीं होता, वह वैष्णवों में अग्रगण्य है।

10. भगवत उरु-विक्रमांघ्रिशाखा-
नख-मणि-चंद्रिकया निरस्त-तापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स
प्रभवति चंद्र इवोदितेऽर्कतापः॥
अर्थः
जैसे चंद्रोदय होने पर सूर्य का ताप नष्ट हो जाता है, वैसे ही भगवान के महापराक्रमी चरणों की उँगलियों के नखरूपी रत्नों की चंद्रिका से भक्तों के हृदय का ताप मिट जाता है। फिर वह पुनः उत्पन्न कैसे होगा?

11. विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात्
हरिरवशाभिहितोऽप्यघौघ-नाशः।
प्रणय-रशनया घृतांघ्रि-पद्यः
स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥
अर्थः
अवश होकर नाम लेने पर भी पाप-प्रवाह का नाशक करने वाले साक्षात हरि, प्रेम की डोरी से चरण-कमल बँध जाने के कारण, जिस भक्त के हृदय को नहीं छोड़ते, वह भागवतों में प्रमुख हैं, ऐसा कहते हैं।