Tuesday, 4 October 2016

श्यामसुन्दर का महत्व

💐सत्संग-प्रसंग पर एक जिज्ञासु भक्त ने एक संत से प्रश्न कियाः💐*

*"महाराज जी ! कृपा करके बताएँ कि त्रिभुवन विमोहन  होने पर भी भगवान हमें प्यारे क्यों नहीं लगते ?"*

*संत ने कहा;-*
*देखो ! श्यामसुंदर तभी प्यारे लगेंगे जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।*

*एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी- जल्दी पानी पीने लगा।*

*सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः*

*'सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।'*

*सियार ने जवाब दियाः 'मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?'*

*मछली ने कहाः ''हाँ मामा!"*

*सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी।*

*तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः*

*'क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?'*

*मछलीः 'हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।'*

*इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी श्यामसुंदर की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम भी उनके दर्शन के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उन्हीं की सोच में लगे रहोगे।*

*ठाकुर जी के परम सुन्दर परम कृपालु होने के बाद भी हम मूढ़ जीवों को संसार प्यारा लगता है। एक गली के कुत्ते के जैसे बार बार उसी गन्दगी में मुह मारते हैं। डंडा पड़ता है लेकिन फिर वही जाते हैं।*

*क्यों ना इस बार इन् जन्म जन्म की आसक्ति ,स्वार्थी संबंधो को त्यागकर परम शाश्वत सम्बन्ध बनाए प्रभु के साथ।*

*ये तभी होगा जब हम अपने हिर्दय में ठाकुर से मिलने का विरह उत्पन्न करेंगे। हिर्दय उनसे मिलने के लिए सदा व्याकुल रहे।*
*_HARE KRISHNA_*

मूर्ति-पूजा और नाम-जपकी महिमा , तृषित

!! राम सियाराम सियाराम जय जय राम !!

“नहिं कलि करम न भगति बिबेकू राम नाम अवलंबन एकू ॥“
.............(मानस १।२७।४)

कलियुग में यज्ञादि शुभ कर्मों का सांगोपांग होना बहुत कठिन है और उनके विधि-विधान को ठीक तरह से जानने वाले पुरुष भी बहुत कम रह गये हैं तथा शुद्ध गोघृत आदि सामग्री मिलनी भी कठिन हो रही है । अत: कलियुगमें शुभ कर्मों का अनुष्ठान सांगोपांग न होने से, उसमें विधि-विधान की कमी रहने से कर्ता को दोष लगता है ।

वैधीभक्ति, विधि-विधान से की जाती है । उसमें किस इष्टदेव का किस विधि से पूजा-पाठ होना चाहिये‒इसको जानने वाले बहुत कम हैं । अत: वह भक्ति करना भी इस कलियुग में कठिन है ।

ज्ञानमार्ग,कठिन है और ज्ञानमार्ग की साधना बताने वाले अनुभवी पुरुषों का मिलना भी बहुत कठिन है । अत: विवेक-मार्ग में चलना कलियुग में बहुत कठिन है । तात्पर्य है कि इस कलियुग में कर्म, भक्ति और ज्ञान‒इन तीनों का होना बहुत कठिन है, पर भगवान्‌ का नाम लेना कठिन नहीं है । भगवान्‌ का नाम सभी ले सकते हैं; क्योंकि उसमें कोई विधि-विधान नहीं है । उसको बालक, स्त्री, पुरुष, वृद्ध, रोगी आदि सभी ले सकते हैं और हर समय, हर परिस्थिति में, हर अवस्था में ले सकते हैं ।

नाम,एक सम्बोधन है, पुकार है । उसमें आर्तभाव की ही मुख्यता है, विधिकी मुख्यता नहीं । अत: भगवान्‌का नाम लेकर हरेक मनुष्य आर्तभावसे भगवान्‌को पुकार सकता है ।

शंका‒नाम-जपमें मन नहीं लगता और मन लगे बिना नाम-जप करने में कुछ फायदा नहीं ! कहा भी है‒

                    “ माला तो कर में  फिरे,  जीभ   फिरै  मुख  माहि ।
                     मनुवाँ तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं ॥“

समाधान‒मन नहीं लगेगा तो ‘सुमिरन’ (स्मरण) नहीं होगा‒यह बात सच्ची है, पर नाम-जप नहीं होगा‒ यह बात दोहे में नहीं कही गयी है । मन नहीं लगने से सुमिरन नहीं होगा तो नहीं सही, पर नाम-जप तो हो ही जायगा ! नाम-जप कभी व्यर्थ हो ही नहीं सकता; अत: मन लगे चाहे न लगे, नाम-जप करते रहना चाहिये ।

जब मन लगेगा, तब नाम-जप करेंगे‒ऐसा होना सम्भव नहीं है । हाँ, अगर हम नाम-जप करने लग जायँ तो मन भी लगने लग जायगा; क्योंकि मन का लगना नाम-जप का परिणाम है ।

  
‒--गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ‘मूर्ति-पूजा और नाम-जपकी महिमा’ पुस्तक से

Saturday, 1 October 2016

हकार से मृत्यु का सहर्ष स्वागत , तृषित

विज्ञान भैरव तंत्र  - विधि—45

ध्‍वनि-संबंधी नौवीं विधि:
            ‘’अ: से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो। और तब हकार में अनायास सहजता को उपलब्‍ध होओ।‘’

      ‘’अ: से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो।‘’
कोई भी शब्‍द जिसका अंत अ: से होता है, उसका उच्‍चार चुपचाप करो। शब्‍द के अंत में अ: के होने पर जोर है। क्‍यो? क्‍योंकि जि क्षण तुम अ: का उच्‍चार करते हो, तुम्‍हारी श्‍वास बाहर जाती है। तुमने ख्‍याल नहीं किया होगा। अब ख्‍याल करना कि जब भी तुम्‍हारी श्‍वास बाहर जाती है, तुम ज्‍यादा शांत होते हो। और जब भी श्‍वास भीतर जाती है, तुम ज्‍यादा तनावग्रस्‍त होते हो। कारण यह है कि बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। और भीतर आने वाली श्‍वास जीवन है। तनाव जीवन का हिस्‍सा है। मृत्‍यु का नहीं। विश्राम मृत्‍यु का अंग है, मृत्‍यु का अर्थ है पूर्ण विश्राम। जीवन पूर्ण विश्राम नहीं बन सकता। वह असंभव है। जीवन का अर्थ है तनाव, प्रयत्‍न; सिर्फ मृत्‍यु विश्रामपूर्ण है।

      तो जब भी कोई व्‍यक्‍ति पूरी तरह विश्राम पूर्ण हो जाता है, वह दोनों हो जाता है—बाहर से वह जीवित होता है। और भीतर से मृत। तुम बुद्ध के चेहरे पर जीवन मृत्‍यु एक साथ देख सकते हो। इसलिए उनके चेहरे पर इतना मौन, इतनी शांति है—मौन और शांति मृत्‍यु के अंग है।
      जीवन विश्राम पूर्ण नहीं है, राम में जब तुम सो जाते हो तो तुम विश्राम में होते हो।  इसी लिए पुरानी परंपराएं कहती है कि मृत्‍यु और नींद समान है। नींद अस्‍थायी मृत्‍यु है। और यही कारण है कि रात्रि विश्राम दायी होती है। वह बाहर जाने वाली श्‍वास है। सुबह भीतर आने वाली श्‍वास है। दिन तुम्‍हें तनाव से भर देता है। रात तुम्‍हें विश्राम से भरती है। प्रकाश तनाव पैदा करता है, अंधकार विश्राम लाता है। यही वजह है कि तुम दिन में नहीं सो सकते। दिन में विश्राम करना कठिन है। प्रकाश जीवन जैसा है, वह मृत्‍यु विरोधी है। अंधकार मृत्‍यु जैसा है। वह मृत्‍यु के अनुकूल है।
      तो अंधकार में गहरी विश्रांति है।  और जो लोग अंधकार से डरते है, वे विश्राम में नहीं उतर सकते। यह असंभव है।
      विश्राम अंधेरे में घटित होता है। और तुम्‍हारे जीवन के दोनों छोरों पर अंधरा है। जन्‍म के पहले तुम अंधेरे में होते हो। और मृत्‍यु के बाद तुम फिर अंधेरे में होते हो। अंधकार असीम है। और यह प्रकाश, यह जीवन उस अंधकार के भीतर एक क्षण जैसा है। अंधकार के समुद्र में प्रकाश लहर जैसा है जो उठता-गिरता रहता है। अगर तुम जीवन के दोनों छोरों को घेरने वाले अंधकार को स्‍मरण रख सको तो तुम यहीं और अभी विश्राम में हो सकते हो।
      जीवन और मृत्‍यु अस्‍तित्‍व के दो छोर हे। भीतर आने वाली श्‍वास जीवन है, बहार जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। ऐसा नहीं है कि तुम किसी दिन मरोगे, तुम प्रत्‍येक श्‍वास के साथ मर रहे हो।
      यही कारण है कि हिंदू जीवन को श्‍वासों की गिनती कहते है, वे उसे वर्षों की गिनती नहीं कहते। तंत्र, योग आदि सभी भारतीय परंपराएं जीवन को श्‍वासों में गिनती है। वे कहती है कि तुम्‍हें इतनी श्‍वासों का जीवन मिला है। वे कहती है कि अगर तुम तेजी से श्‍वास लोगे, थोड़े समय में ज्‍यादा श्‍वासें लोगे तो तुम बहुत जल्‍दी मरोगे। और अगर तुम बहुत धीरे-धीरे श्‍वास लोगे, अगर एक निश्‍चित समय में कम श्‍वास लोगे तो तुम ज्‍यादा समय तक जीओगे।
      और बात ऐसी ही है। अगर तुम पशुओं का निरीक्षण करोगे तो पाओगे कि बहुत धीमी श्‍वास लेने वाले पशु लंबी उम्र जीते है। उदाहरण के लिए हाथी है, हाथी की उम्र बड़ी है। क्‍योंकि उसकी श्‍वास धीमी चलती है। फिर कुत्‍ता है, उसकी श्‍वास तेज चलती है। और उसकी उम्र बहुत कम है। जो भी पशु बहुत तेज श्‍वास लेता होगा, उसकी उम्र लम्‍बी नहीं हो सकती। लंबी उम्र सदा धीमी श्‍वास के साथ जुड़ी है।
      तंत्र, योग और अन्‍य भारतीय साधना पथ तुम्‍हारे जीवन का हिसाब तुम्‍हारी श्‍वासों से लगाते है। सच तो यह है कि तुम हरेक श्‍वास के साथ जन्‍मते हो और हरेक श्‍वास के साथ मरते हो। यह विधि बाहर जाने वाली श्‍वास को गहरे मौन में उतरने का माध्‍यम बनाती है। उपाय बनाती है। यह एक मृत्‍यु-विधि है।
      ‘’अ से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो।‘’
      श्‍वास बाहर गई है—इसलिए अ: से अंत होने वाले शब्‍द का उपयोग है यह अ: अर्थपूर्ण है; क्‍योंकि जब तुम अ: कहते हो वह तुम्‍हें पूरी तरह खाली कर देता है। उसके साथ पूरी श्‍वास बाहर निकल जाती है। कुछ भी भीतर बची नहीं रहती है। तुम बिलकुल खाली हो जाते हो—खाली और मृत। एक क्षण के लिए, बहुत थोड़ी देर के लिए जीवन तुमसे बाहर निकल गया है और तुम मृत और खाली हो।
      अगर इस रिक्‍तता इस खाली पन को तुम जान लो। उसके प्रति बोधपूर्ण हो जाओ तो तुम पूर्णत: रूपांतरित हो जाओगे। तुम और ही आदमी हो जाओगे। तब तुम भली भांति जान लोगे कि न यह जीवन तुम्‍हारा जीवन है और न यह मृत्‍यु ही तुम्‍हारी मृत्‍यु है। तब तुम उसे जान लोगे जो आती-जाती श्‍वासों के पास है, तब तुम साक्षी आत्‍मा को जान लोगे।  और साक्षित्‍व उस समय आसानी से घट सकता है जब तुम श्‍वासों से खाली हो, क्‍योंकि तब जीवन उतार पर होता है। और सारे तनाव भी उतार पर होते है। तो इस विधि को प्रयोग में लाओ। यह बहुत ही सुंदर विधि है।
      लेकिन आमतौर से, सामान्‍य आदत के मुताबिक, हम सदा भीतर आने वाली श्‍वास को ही महत्‍व देते है। हम बाहर जाने वाली श्‍वास को कभी महत्‍व नहीं देते। हम सदा भीतर लेते है। उसे बाहर नहीं छोड़ते। हम श्‍वास लेते है और शरीर उसे छोड़ता है। तुम अपनी श्‍वसन क्रिया का निरीक्षण करो और तुम्‍हें यह पता चल जाएगा।
      हम सदा श्‍वास लेते है। हम उसे छोड़ते नहीं। छोड़ने का काम शरीर करता है। और इसका कारण यह है कि हम मृत्‍यु से भयभीत है। बस यही कारण है। अगर हमारा बस चलता तो हम कभी श्‍वास को बाहर जाने ही नहीं देते। हम श्‍वास को भीतर ही रोक रखते। कोई भी व्‍यक्‍ति श्‍वास छोड़ने पर जोर नहीं देता। सब लोग श्‍वास लेने की ही बात करते है। लेकिन श्‍वास को भीतर लेने के बाद उसे बाहर निकालना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए हम मजबूरी में उसे बाहर जाने देते है। उस हम किसी तरह बरदाश्‍त कर लेते है। क्‍योंकि श्‍वास छोड़े बगैर श्‍वास लेना असंभव है। इसलिए श्‍वास छोड़ना आवश्‍यक बुराई के रूप में स्‍वीकृत है। लेकिन बुनियादी तौर से श्‍वास छोड़ने में हमारा कोई रस नहीं है।
      और यह बात श्‍वास के संबंध में ही सही नहीं है। पूरे जीवन के प्रति हमारी दृष्‍टि यही है। जो भी हमें मिलता है, उसे हम मुट्ठी में बाँध लेते है। उसे छोड़ने का नाम ही नहीं लेते। यही मन का कृपणता है। और याद रहे, इसके बहुत परिणाम होते है। अगर तुम कब्‍जियत से पीडित हो तो उसका कारण यह है कि तुम श्‍वास तो लेते हो, लेकिन उसे छोड़ते नहीं। जो व्‍यक्‍ति श्‍वास लेना जानता है। लेकिन छोड़ना नहीं, वह कब्‍जियत से पीडित होगा। कब्‍जियत उसी चीज का दूसरा छोर है। वह किसी भी चीज को अपने से बाहर जाने देने के लिए राज़ी नहीं है। वह सिर्फ इकट्ठा करता जाता है। यह भयभीत है और भय के कारण  यह इकट्ठा किए जाता है।
      लेकिन जो चीज रोक ली जाती है वह  विषाक्‍त हो जाती है। तुम श्‍वास तो लेते हो लेकिन अगर उसे छोड़ते नहीं तो वह श्‍वास जहर बन जाएगी और तुम उसके कारण मरोगे। अगर तुमने कंजूसी की तो तुम एक जीवनदायी तत्‍व को जहर में बदल दोगे। क्‍योंकि श्‍वास का बाहर जाना नितांत जरूरी है। बाहर जाती श्‍वास तुम्‍हारे भीतर से सब जहर को बाहर निकाल फेंकती है।
      तो सच तो यह कि मृत्‍यु शुद्धि की प्रक्रिया है और जीवन अशुद्धि की, विषाक्‍त करने की प्रक्रिया है। यह बात विरोधाभासी मालूम पड़ेगी। जीवन विषाक्‍त करने की प्रक्रिया है, क्‍योंकि जीने के लिए बहुत सी चीजों को उपयोग में लाना पड़ता है। और जैसे  ही तुम उनका उपयोग करते हो। वे विष में बदल जाती है। तब तुम श्‍वास लेते हो तो तुम आक्‍सीजन का उपयोग कर रहे हो, लेकिन उपयोग करने के बाद जो चीज बच रहती है वह विष है। आक्‍सीजन के कारण ही वह जीवन था। लेकिन जब तुमने उसका उपयोग कर लिया तो शेष विष हो जाता है। ऐसे ही जीवन हर चीज को जहर में बदलता रहता है।
      मृत्‍यु शुद्ध की प्रकिया है। जब सारा शरीर विषाक्‍त हो जाता है। तब मृत्‍यु तुम्‍हें उस शरीर से मुक्‍त कर देती है। मृत्‍यु तुम्‍हें फिर से नया बना देती है। तुम्‍हें नया जन्‍म दे देगी। तुम्‍हें नया शरीर मिल जाएगा। मृत्‍यु के द्वारा शरीर का सब संग्रहीत विष प्रकृति में विलीन हो जाता है। और तुम्‍हें एक नया शरीर उपलब्‍ध होता है।
      और यह बात प्रत्‍येक श्‍वास के साथ घटित होती है। बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु के समान है, वह विष को बाहर ले जाती है। और जब वह श्‍वास बाहर जाती है। तो तुम्‍हारे भीतर सब कुछ शांत होने लगता है। अगर तुम सारी की सारी श्‍वास बाहर फेंक दो, कुछ भी भीतर न रहने पाए तो तुम शांति के उस बिंदु को छू लोगे जो श्‍वास के भीतर रहते हुए कभी नहीं छुआ जा सकता था। यह ज्‍वार-भाटे जैसा है। आती हुई श्‍वास के साथ तुम्‍हारे पास जीवन-ज्‍वार आती है और जाती हुई श्‍वास के साथ सब कुछ शांत हो जाता है। ज्‍वार चला गया तब, तुम खाली, रिक्‍त सागर तट भर रह जाते हो। इस विधि का यही उपयोग करो।
      ‘’अ से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो।‘’
      बाहर जाने वाली श्‍वास पर जोर दो। और तुम इस विधि का उपयोग मन में अनेक परिवर्तन लाने के लिए कर सकते हो। अगर तुम कब्‍जियत से पीड़ित हो तो श्‍वास भूल जाओ। सिर्फ श्‍वास को बहार फेंको। श्‍वास भीतर ले जाने का काम शरीर को करने दो। तुम छोड़ने भर का काम करो। तुम  श्‍वास को बाहर निकाल दो और भीतर ले जाने की फिक्र ही मत करो। शरीर वह काम अपने  आप ही कर लेगा, तुम्‍हें उसकी चिंता नहीं लेनी है। उससे तुम मर नहीं जाओगे। शरीर ही श्‍वास को भीतर ले जाएगा। तुम छोड़ने भर का काम करो, शेष शरीर कर लेगा। और तुम्‍हारी कब्‍जियत जाती रहेगी।
      अगर तुम ह्रदय रोग से पीड़ित हो तो श्‍वास को बाहर छोड़ो। लेने की फिक्र मत करो। फिर ह्रदय रोग तुम्‍हें कभी नहीं होगा। अगर सीढ़ियां चढ़ते हुए या कहीं जाते हुए तुम्‍हें थकावट महसूस हो, तुम्‍हारा दम घुटने लगे तो तुम इतना ही करो: श्‍वास को बाहर छोड़ो, लो नहीं। और तब तुम कितनी ही सीढ़ियां चढ़ जाओगे। और नहीं थकोंगे। क्‍या होता है?
            जब तुम श्‍वास छोड़ने पर जोर देते हो तो उसका मतलब है कि तुम अपने को छोड़ने का, अपने खोने को राज़ी हो। तब तुम मरने को राज़ी हो, तब तुम मृत्यु से भयभीत नहीं हो। और यही चीज तुम्‍हें खोलती है। अन्‍यथा तुम बंद रहते हो। भय बंद करता है। जब बंद करता है। जब तुम श्‍वास छोड़ते हो तो पूरी व्‍यवस्‍था बदल जाती है। और वह मृत्‍यु को स्‍वीकार कर लेती है। भय जाता रहता है और  तुम मृत्‍यु के लिए राज़ी हो जाते हो।
      और वही व्‍यक्‍ति जीता है जो मरने के लिए तैयार है। सच तो यह हे कि वही जीता है जो मृत्‍यु से राज़ी है। केवल वही व्‍यक्‍ति जीवन के योग्‍य है। क्‍योंकि वह भयभीत नहीं है, जो व्‍यक्‍ति मृत्‍यु को स्‍वीकार करता है, मृत्‍यु का स्‍वागत करता है, मेहमान मानकर उसकी आवभगत करता है। उसके साथ रहता है। वही व्‍यक्‍ति जीवन में गहरे उतर सकता है।
      जब एक कुत्‍ता मरता है तो दूसरे कुत्‍ते को कभी पता नहीं होता की मैं भी मर सकता हूं। जब भी मरता है, कोई दूसरा ही मरता है। तो कोई कुत्‍ता कैसे कल्‍पना करे के मैं भी मरने वाला हूं। उसने कभी अपने को मरते नहीं देखा। सदा किसी दूसरे ही मरते है। वह कैसे कल्‍पना करे, कैसे निष्‍पति निकाले कि मैं भी मरूंगा। पशु को मृत्‍यु का बोध नहीं होता। इसलिए कोई पशु संसार का त्‍याग नहीं करता। कोई पशु संन्‍यासी नहीं हो सकता है।
      केवल एक बहुत ऊंच्‍ची कोटि की चेतना ही तुम्‍हें संन्‍यास की तरफ ले जा सकती है। मृत्‍यु के प्रति जागने से ही संन्‍यास घटित होता है। और अगर आदमी होकर भी तुम मृत्‍यु के प्रति जागरूक नहीं हो तो तु

नवरात्र 1 ,तृषित

नवरात्र

मानव का आध्यात्मिक एक नाम है , साधक ।
जिसे कुछ अभीष्ट हो वह साधक है ।
जिसे सधना हो , सिद्ध होना हो वह साधक ।
सिद्ध का अर्थ पकने से है , पुष्प खिला ही पक कर फल होने को है । मानव एक अंकुर है , जिसे धान हो कर कभी सिद्ध होना है , सिद्ध अर्थात् पका हुआ धान (चावल) ही भोग होगा ईश्वर का ।
साधना और जीवन यह अभिन्न है ,
मानव का लक्ष्य है पूर्णत्व । अंकुर भी हुआ , विकास भी , धान भी , हांड़ी पर चढ़ पका नही और भोग्य वस्तु न हुआ तो वह होना न होना व्यर्थ ।
मूल लक्ष्य है सध जाना , पक कर रसमय सुगन्धित फल होना सिद्धता है न कि ईश्वर की शक्तियों को समेट स्वयं को द्वितीय ईश्वर सिद्ध करना सिद्धता ।
वास्तव में प्रेमी - सिद्ध - योगी - ज्ञानी भिन्न नहीँ , सब एक है , भगवत् प्रेम प्राप्त जीव में सभी का स्वतः समावेश है और वही वह निर्मल सिद्ध है जिसका ईश्वर हेतु भोग लगाया जा सकें , भगवत् प्रेमी पका फल है , पका हुआ चावल है ।
जगत में लौकिक बोलचाल में साधक को सिद्ध कहा जाता है और सिद्ध को दिव्य शक्तियों से सम्पन्न माना जाता है जो कि सत्य है , परन्तु ऐसा सिद्ध शक्ति प्राप्त कर भी भगवत् अर्पण नहीँ हुआ , वह चावल पक गया परन्तु स्व हेतु , ईश्वर का भोग नही होना चाहा अतः छु लेने पर वंचित रह गया और वही सिद्ध अपनी सिद्धता अब जगत को दिखा रहा जबकि वह सभी शक्तियाँ है ईश्वर की ।
बैंक में जमा धन बैंक में होने पर भी रहता धारक है । शक्ति ईश्वर की है वह कैसे भी विनिमय कर सकते है । बैंक सच्चा है तो ख्याल रखेगा कि यह मेरा नही धारक की वस्तु और उपयोग के बदलें ब्याज भी देगा ।
ऐसे ही सिद्ध है , ईश्वर की कुछ शक्तियों का वहाँ प्रकट होने पर भी मूल धारक ईश्वर ही है ।

सिद्ध देह के बोध बिन साधक , अन्य लौकिक दृश्य सिद्धियों को सिद्धता जानता है , सिद्ध देह की जागृति ही वास्तविक साधना है , सिद्ध देह को ही भाव देह कहा जाता है ।
जडिय प्रदार्थ सिद्ध नही हो सकते , वह जड़ के लिये ही भोग्य होंगे , ईश्वर नित्य चेतन है अतः स्थूल देह की नही , चेतन देह की सिद्धता से ईश्वर को वह जीवात्मा भावदेह रूप भोग होगी ।
खैर यह सब गहन विषय है ,
नवरात्र क्या है - अवसर है , जागृति का , साधना का । मानव का एक नाम साधक है और नवरात्र साधना का समय ।
वातावरण परिवर्तन होने पर साधना से ही नव ऋतू में ढला जाता है ,
अभी मौसम बदल रहा है , और भीतर देह जड़ होने से बदलाव संग सङ्गिभूत नही हो पा रही अतः वह साधना करें तो सरलता से बदलाव के अनुरूप ढल जायेगी ।
बाहरी बदलाव का आंतरिक सदुपयोग का नाम नवरात्र है  ।  रात्र का यहाँ बोधन महानिशा से है । महा निशा ईश्वर की विश्राम भूमि है । जिसे सिद्ध कर लेने पर नित्य विश्राम की प्राप्ति होती है , नित्य विश्राम अर्थात् महानिशा प्राप्त चित् कभी उद्वेग नही होता , बाहर से होने पर भी भीतर से कभी नही । महानिशा ही योगमाया है इसकी अधिष्ठात्री भुवनेश्वरी है और उसे ही त्रिपुर सुंदरी कहते है ।
महानिशा की स्थिति में ईश्वर के विलास का स्पष्ट दर्शन जीव वैसे कर पाता है जैसे लोक के विलास का ईश्वर दर्शन करते है ।
नव विधा है , नव साधना , नव सीढिया , नव प्रारूप , नवधा भक्ति का एक नाम साधना भक्ति भी है । यहीं नवधा की सिद्धता नवरात्र है ।

प्रथमम् शैलपुत्री , साधक जगत के गहनतम लोग शैलपुत्री की साधना को सर्वोत्तम मानते है , क्योंकि वह स्वार्थ प्राप्ति हेतु नही शिवत्व प्राप्ति की साधना है , गहन उन्माद और अनन्य भाव में डुबी साधना । साधक शैलपुत्री सा हो जिसे अभीष्ट शिव स्वरूप के सन्मुख दिव्य सुंदर इंद्र आदि यहाँ तक नारायण भी अभीष्ट न हो । वैष्णव जन को कह दूँ शिवत्व प्राप्ति बिना वैष्णव की सुगन्ध भी प्राप्त नही हो सकती । शिव हुये बिना वैष्णव नही हुआ जा सकता , शिव का अर्थात् कल्याण । वह अवस्था जहाँ स्वत्व का एक अणु नही । जहाँ परमार्थ का पूर्ण विकास हो , परमार्थ की पराकाष्ठा शिव है और उसकी अडिग प्राप्ति के लिये स्वयं शैलपुत्री तैयार है । अनन्यता रूपी शैल हो अर्थात् कितना भी लोभ - भोग प्राप्त होने पर , अपने अभीष्ट में दोष दिखाने पर भी जो न हिले । यह वर देगी माँ पार्वती ।
जिन्होंने वरण किया वहीँ वर दे सकते है , सभी शक्तियाँ स्वयं उस पथ से गुजरती है जिसकी वह अधिष्ठात्री , माँ शैलपुत्री भीतर के अभीष्ट को वर रूप में प्रकट कर सकती है ।
साधक की अनन्यता हेतु यह प्रथम पायदान है । जिसकी पूर्णता होगी सिद्धिदात्री पर ।
प्रथम साधक होना होगा , अनन्य उपासक । शिव को भी पति रूप में पाना सहज साधना नहीँ जबकि शिव ने अब सती (गौरा) के बाद पुनः स्त्रीत्व को ग्रहण न करने की आंतरिक भावना कर ली हो ।
शिव को वरण करने हेतु शिवा होना आवश्यक है । शिव की स्व हेतु अणु मात्र अभीप्सा नही , वैसा साधक हो । अतः शैलपुत्री की अभीप्सा सबसे उत्कृष्ट है , शिवत्व का पति रूप वरण जब शिव ने अखण्ड योग का प्रण किया हो तब भी । साधक इष्ट के चित् को कैसे पिघाल सकता है यह स्वयं शैलपुत्री कहती है ।
भगवत् इच्छा रही तो बात जारी रहेगी , सत्यजीत तृषित ।
जयजय श्यामाश्याम ।