Saturday, 18 August 2018

प्रेमोन्माद - वियोगी हरि

*प्रेमोन्माद*

प्रेमोन्माद

प्रेम में एक प्रकार का पागलपन होता है। ऊँचे प्रेमी प्रायः पागल देखे गये हैं। इस पागलपन में एक विशेष प्रकार का शान्तिमय आनन्द आया करता है, जिसका अनुभव पागल प्रेमी को ही हो सकता है-

There is a pleasure sure in being mad,
Which none but mad men know.

निश्चय ही पागल हो जाने में एक प्रकार का आनन्द है, जिसे केवल पागल ही जानते हैं। प्रेम की दीवानगी में जो चूर हो गया, समझ लो, उसका बेड़ा पार है। प्रेम की हाट में पागल ही पैर रखता है, क्योंकि वहाँ मुफ्त ही अपना सर बेचा जाता है। पगला मीर कहता है-

सौदाई हो तो रक्खे बाजारे इश्क में पा,
सर मुफ्त बेचते हैं, यह कुछ चलन है वाँका।

कुछ भी हो, तिजारती दुनिया तो इस काम को बेवकूफी में ही शुमार करेगी। भला यह भी कोई रोजगार है? सर जैसी महँगी चीज बिना मोल बेच डालना कहाँ की समझदारी है? न हो समझदारी, उन नासमझ पागलों को अपनी इस नासमझी में ही मजा आया करता है। पागलपन से भरी मूर्खता ही उनकी सच्ची समझदारी है-

How wise they are, that are but fools in lose.
भाई, जहाँ इश्क का जूनूँ हुकूमत कर रहा हो, प्रेम का उऩ्माद जहाँ का राजा हो, वहाँ बुद्धि अनधिकार प्रवेश कैसे कर सकेगी? जरूर ही वहाँ अक्ल मदाखलत बेजा के जुर्म में फँस जायेगी-
शोर मेरे जुनूँ का जिस जा है,
दखले अक्ल उस मुकाम में क्या है। -मीर

अक्ल भी एक बला है। बुद्धि का रोग बड़ा बुरा होता है। यह रोग प्रेम की मस्ती से ही अच्छा हो सकता है-

मैं मरीजे अक्ल था, मस्ती ने अच्छा कर दिया!
पगली सहजो ने प्रेमोन्मादियों का एक बड़ा ही सुंदर और सच्चा चित्र अंकित किया है। नीचे के लक्षण जिसमें मिलते हों, समझ लो कि वह एक प्रेमी है, एक पागल है, या दुनियाँ की नजर में एक खासा बेवकूफ है-

प्रेम दिवाने जे मये, मन भे चकनाचूर।
छके रहैं, घूमत रहैं, ‘सहजो’ देखि हुजूर।।
प्रेम दिवाने जे भय, कहैं बहकते बैन।
‘सहजो’ मुख हाँसी छुटै, कबहूँ टपकैं नैन।।
प्रेम दिवाने जे भये, जातिबरन गइ छूट।
‘सहजो’ जग बौंरा कहै, लोग गये सब फुट।।
प्रेम दिवाने जे भये, ‘सहजो’ डगमग देह।
पाँव परै कितकौ कहूँ, हरि सँवारि तब लेइ।।
कबहूँ हकधक ह्वै रहैं, उठैं प्रेम हित गाय।
‘सहजो’ आँख मुँदी रहै, कबहूँ सुधि ह्वै जाय।।
मन में तो आनँद रहै, तन बौरा सब अंग।
न काहू के संग हैं, ‘सहजो’ ना कोई संग।।
ऐसे होते हैं प्रेमोन्मादी। वह पगला अपनी खुदमस्ती में उछल कूद करने वाले शैतान मन को कुचलकर चूर चूर कर देता है। मन मातंग को वह प्रेम जंजीर से जकड़कर बाँध देता है। उसकी मस्ती के आगे मनरूपी मस्त हाथी मुर्दा सा पड़ा रहता है-

मन मतंग महमंत था, फिर नागहिर गंभीर।
दोहरी तेहरी, चौहरी परि गई प्रेम जंजीर।। - कबीर

वह पागल बकती सी बातें करता है, बिल्कुल बेमतलब, बेमानी। कबी खिलखिलाकर हँस पड़ता है, तो कभी आँसुओं का तार बाँध देता है। कौन जाने, किसलिए रोता और किसलिए हँसता है? पर इतना तो हम अवश्यक जानते हैं, कि वह रहता मौज में है। उसके रोने में भी रहस्य है और हँसने में भी रहस्य है।

प्रेमोन्मत्त भक्तवर सुतीक्ष्ण की सी कोटि की प्रेम विह्वलता को गोसाई तुलसीदास जी ने जिस कौशल से चित्रित किया है, वह देखते ही बनता है। अहा!

निर्भर प्रेममगन मुनि ज्ञानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। ‘को मैं, चलेउँ कहाँ’ नहीं बूझा।।
कबहुँक फिरि पाछे पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।

उस पगले प्रेमी का जात पाँत से कोई नाता नहीं रह जाता। एक झटके से ही सब तोड़ ताड़कर अलग जा खड़ा होता है। लोग उसे पागल कहते हैं, और सका साथ छोड़ देते हैं। वह मस्तराम अपनी देहत को नहीं सँभाल सकता। रखना चाहता है पैर कहीं और पड़ता है कहीं! पर कुशल है, उसका प्यारा सदा उसके साथ रहता है। वही उसे गिरने पड़ने से संभाल लेता है। कभी चुप हो जाता है, कभी प्रीति के गीत गाने लगता है और कभी फूट फूटकर रोने लगता है! न जाने, किसका ध्यान करता है। कुछ पता नहीं चलता। बेसुध ही देखने में आता है। पर कभी कभी वह बेहोश पगला होशयार की तरह काम करने लगता है। उसके हृदय सिन्धु में आनन्द की हिलोरें उठा करती हैं। वह दीवाना न तो खुद ही किसी का साथ पसंद करता है, और न उसे ही कोई अपना संगी साथी बनाना चाहता है।
प्रेम का पागल कैसा मौजी जीव होता है, वह पगला मलूक अपनी प्रेम मस्ती में, सुनो जरा, क्या गा रहा है-

प्यारे, तेरा मैं दीदार दीवाना।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूं, सुन साहिब रहमाना।।
हूँ अलमस्त, खबर नहिं तनकी, पीया प्रेम पियाला।
ठाढ़ होऊँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला।

उधर कबीर बाबा भी अपनी धुन में मस्त होकर, अनुराग राग अलाप रहे हैं। वाह!

हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहैं आजाद या जगसे, हमन दुनिया से यारी क्या?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर बदर फिरते।
हमारा यार है हममें, हमन को इन्तिजारी क्या?

एक प्रेमोन्मादिनी गोपिका की प्रेम दशा को महाकवि देव ने क्या ही सफल कौशल के साथ अंकित किया है। कुँवर कान्ह की कहानी सुनकर बेचारी को उन्माद सा हो गया है। देखें, उस निठुर कान्ह को भी अब इस पगली की नेह कहानी सुनकर उन्माद होता है या नहीं-
जबतें कुँवर कान्ह रावरी कला निधान,
कान परी वाके कहूँ सुजस कहानी सी;
तबही तें ‘देव’ देखी देवता सी हँसति सी,
खीझति सी, रीझति सी, रूसति रिसानी सी।
छोही सी, छली सो, छीनि लीनी सी, छकी सी, छीन,
जकी सी, टकी सी, लगी, थकी, थहरानी सी;
बीधी सी, बधी सी, विष बूड़ी सी, विमोहित सी,
बैठी वह बकति बिलोकति बिकानी सी।।

उस साँवलिया के दरस की दीवानी, उस बांसुरी वाले के प्रेम की पगली आज इस हालत को पहुँच गयी है। प्रेम क्या से क्या कर देता है। वह अपने घर की रानी आज, बैठी, वह बकति बिलोकति बिकानी सी!
सहजो की सहोदरा दया ने भी प्रेम प्रीति के दीवाने पर कुछ साखियाँ कही हैं। कहती हैं-

‘दया’ प्रेम उन्मत्त जे तनकी तनि सुधि नाहिं।
झुकै रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं।।
प्रेम मगन गे साधुजन, तिन गति कही न जात।
रोय रोय गावत हँसत, ‘दया’ अटपटी बात।।
प्रेम मगन गद्गद बचन, पुलक रोम सब अंग।
पुलकि रह्यौ मनरूप में, ‘दया’ न ह्वै चित भंग।।

उस्ताद जौक का एक प्रसिद्ध शेर है। उसमें एक पागल कहता है कि मैं प्रेमोन्माद के महोदधि की लहर का वह केश पाश हूँ सारा संसार ही मेरे पेंचोखम में घिरा हुआ है। मेरी भावनाएँ जिन्होंने इस दुनिया को परेशान कर रक्खा है, चक्कर में डाल रखा है, उलझी हुई अलकावली के समान है। शेर यह है-

वह हूँ मैं गेसुए मौजे मुहीते आज़मे वहशत,
कि है घरे हुए रूये जिमीं को पेंचोखम मेरा।

कैसा ऊँचा रहस्यवाद है! कौन उलझने जायेगा प्रेम के दीवाने की इस उलझन में। पागल का यह पेंचोखम गूँगे का सा ख्वाब है, जिसका बयान नहीं हो सकता-

गूँगे का सा है ख्वाब बयाँ हो नहीं सकता।
जो प्रेम में दीवाने हैं, बेहोश हैं, वे ही तो असल में होशियार हैं। ऐसे सोते हुए दिलवाले ही तो जाग रहे हैं-

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जगर्ति संयमी। - गीता
मौलाना रूम ने क्या अच्छा कहा है कि ऐसे बेहोश दिलों पर तो भाई! जान तक निसार करने को जी चाहता है। पर यह दीवानगी, यह बेहोशी मिलती कैसे है? सुनो, अगर एक बार भी उस प्यारे राम की झलक पा जाओ, तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि तुम इतने मस्त या पागल हो जाओगे कि अपने दुनियाबी दिल और जिस्म में आग लगा दोगे। यह दावा किसी ऐसे वैसे आदमी का नहीं है, सूफी प्रेम के सूर्य मौलाना जलाल उद्दीन रूमी का है।
स्वामी रामतीर्थ के प्रेमोन्माद से तो आपलोग थोड़े बहुत परिचित होंगे ही। वह भी एक गजब का मस्त था, सच्चा प्रेमी था, पूरा पागल था। वह राम बादशाह सुनिये, क्या गा रहा है। वाह! आनन्द ही आनन्द है! क्या खूब मेरे प्यारे राम!

डटकर खड़ा हूँ, खौफ से खाली जाहान में।
तसकीने दिल भरी है मेरे दिल में जान में।।
गाह बगह दुनियाँ की छत पर हूँ तमाशा देखता।
गह बगह देता लगा हूँ बहिशियों की सी सदा।।
बादशाह दुनियाँ के हैं मुहरे मेरी शतरंज के।
दिल्लगी की चाल है, सब रंग सुलहो जंग के।।
रक्शे आदी से मेरे जब कपि उठती है जमीं।
देखकर मैं खिलखिलाता, कहकहाता हूँ वहीं।।

यही अवस्था तो है गीता की ‘ब्राह्मी स्थिति’। प्रेमोन्मत्त ही इस स्थिति का एकमात्र अधिकारी है। पगली दयाबाई ने बिल्कुल सच कहा है-

प्रेम मगन से साधूजन, बिन गति कही न जात।
रोय रोय गावत हँसत, ‘दया’ अटपटी बात।।
---- *वियोगी हरि*

Thursday, 14 June 2018

श्री कनकधारा स्तोत्र

     

 

  🌷श्री कनकधारा स्तोत्र 🌷

 

ज्योतिष में धन प्राप्ति के अनेकों उपाय बताए गए है पर उनमें जो सबसे अधिक प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी है, वो है कनकधारा स्त्रोत का विधि – विधान से नियमित पाठ। इसकी रचनाकार आदि शंकराचार्य है जिन्होंने इसकी सहायता से सोने की बारिश करवाई थी। एक बार आदिशंकराचार्य भिक्षा मांगने किसी गरीब ब्राह्मण के घर गए। उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं था। उसने भिक्षा के रूप में उन्हें एक सूखा आंवला दे दिया। उसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उन्होंने मां लक्ष्मी से प्रार्थना की। प्रार्थना पूरी होते ही उसके घर सोने के आंवलों की वर्षा होने लगी। उनकी ये प्रार्थना कनकधारा स्रोत के नाम से प्रसिद्ध है।


विधि – आप तंत्र-मंत्र सम्बंधित सामग्री की दूकान से एक कनकधारा यंत्र व कनकधारा स्त्रोत ले आए। नियमित कनकधारा यंत्र के सामने धुप-बत्ती करके कनकधारा स्त्रोत का पाठ करें। अगर किसी दिन यह भी भूल जाएं तो बाधा नहीं आती क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है। यहां प्रस्तुत है कनकधारा स्तोत्र का संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अनुवाद।

💐 कनकधारा स्तोत्र 💐

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।
अङ्गीकृताऽखिल-विभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गळदेवतायाः ॥१॥

जैसे भ्रमरी अधखिले पुष्पों से अलंकृत तमाल-वृक्ष का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो दृष्टि श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कृपादृष्टि मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपा-प्रणहितानि गताऽऽगतानि।
मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

जैसे भ्रमरी कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर दृष्टिमुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपद-वीभ्रमदानदक्ष आनन्द-हेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणर्द्ध मिन्दीवरोदर-सहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, उन मुरारी श्रीहरि को भी आनंदित करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर भी अवश्य पड़े।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।
आकेकरस्थित-कनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रित कौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला, कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कृपादृष्टि मेरा कल्याण करें।।5।।

कालाम्बुदाळि-ललितोरसि कैटभारे-धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति-भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥

जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के समान श्याम वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण करें ।।6।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत् प्रभावान् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थर-मीक्षणार्धं मन्दाऽलसञ्च मकरालय-कन्यकायाः ॥७॥

समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, वही दृष्टि मुझ पर भी पड़े।।7।।

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा मस्मिन्नकिञ्चन विहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्म-घर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण-प्रणयिनी नयनाम्बुवाहः ॥८॥

भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी घाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।।8।।

इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्ट-कमलोदर-दीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥

विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें।।9।।

गीर्देवतेति गरुडध्वजभामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर-वल्लभेति।
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥

जो सृष्टि रचना के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में स्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।

श्रुत्यै नमोऽस्तु नमस्त्रिभुवनैक-फलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीय गुणाश्र​यायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम-वल्लभायै ॥११॥

हे देवी । शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।

नमोऽस्तु नालीक-निभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधि-जन्मभूत्यै।
नमोऽस्तु सोमामृत-सोदरायै नमोऽस्तु नारायण-वल्लभायै ॥१२॥

कमल के समान कमला देवी को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सहोदरी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।।

नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥१३॥

कमल के समान नेत्रों वाली हे मातेश्वरी ! आप सम्पतिव सम्पुर्ण इंद्रियों को आनंद प्रदान देने वाली हो, , साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा हर लेती होमुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे।।13।।

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥१४॥

जिनकी कृपा दृष्टि के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।।

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥१५॥

हे विष्णु प्रिये! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय-नन्दनानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्-वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यत् ॥१६॥

दिशाओं द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूर-तरङ्गितैरपाङ्गैः।
अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥१७॥

कमल के समान नेत्र वाले भगवन केशव की कामिनी पत्नि हे कमले! मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। आप मुझ पर कृपा दृष्टि करें ।।१७।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुविबुधभाविताशयाः ॥१८॥

जो लोग इस प्रकार प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस लोकमें महान गुणवान और अत्यंत भाग्यवान. होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।

॥श्रीमदाध्यशङ्कराचार्यविरचितं श्री कनकधारा स्तोत्रम् समाप्तम्।।

Monday, 14 May 2018

*प्रेम में अधीरता* वियोगी हरि जी

*प्रेम में अधीरता*
वियोगी हरि जी

प्रेमी को धैर्य कहाँ? अरे भाई! उसकी अधीरता ही उसकी धीरता है। आत्यन्तिक विरहासक्ति में, मिलन की परमोत्कण्ठा में प्रेम की जो गहरी अधीरता होती है, उसका आनन्द विरले ही भाग्यवान् जानते हैं। उस अकथनीय अवस्था में एक क्षण एक कल्प के समान बीतता है। दिल में एक अजीब छटपटाहट पैदा हो जाती हैं, आँखें एक दर्द भरे मीठे से नशे में मस्त हो झूमने लगती हैं, मन पर अपना काबू नहीं रहता, ऐसा लगता है, मानों कहीं उड़ा सा जा रहा है। कब आयेगी वह घड़ी, कब मिलेगा वह प्रियतम, कब बुझेगी इन आँखों की तड़प भरी प्यास, कब मौज की लहर लहरायगी दिल के दरिया में आदि भावनाओं में जिस किसी का मन आतुर और अधीर हो गया उसकी प्रेम साधना सफल है, उसका जीवन धन्य है। प्रेमाधीरता में बस कब ही कब दिखायी देता है। यहाँ तक कि ‘अब’ भी उस ‘कब’ के गहरे रंग में रंग जाता है। ऊंचे प्रेमी कबीर ने प्रियतम की दर्शनोत्कण्ठा में प्रेमाधीरता का कैसा सजीव चित्र खींचकर रख दिया है। कहते हैं-

यहि तनका दिवला करौ, बाती मेलौं जीव।
लोहू सींचौं तेल ज्यों, कब मुख देखौं पीव।।

वह मिले तो मैं यह सब भी करने को तैयार हूँ। इस देह का दीपक बनाकर उसमें जीव की बत्ती रखूँगी और अपने हृदय रक्त से उस प्रेम ज्योति को सदा सींचती रहूंगी! देखूँ, इस दिये के उजेले में अपने प्रेमास्पद का मुख कब देखने को मिलता है। हा! कब तक उसकी प्रतीक्षा करूँ!
देखत देखत दिन गया, निसि भी देखत जाय।
बिरहिन पिय पावै नहीं, केवल जिय घबराय।। - कबीर

क्या करूँ, क्या न करूं! कैसे पाऊँ अपने उस प्यारे को-

जो धन आनँद ऐसी रुची तौ कहा बस है, अहा प्राननि पीरौं।
पाऊँ कहाँ हरि, हाय! तुम्हें, धरनी में धँसौं कैं अकासहिं चीरौं।। - आनन्दघन

एक व्रजांगना की प्रेमाधीरता देखते ही बनती है। एक दिन, वन में बलराम और कृष्ण को गायें चराते चराते भूख लग आयी। उस दिन मैया यशोदा ने समय पर छाक तक न भेजी। थोड़ी दूर पर कुछ ब्राह्मण यज्ञानुष्ठान कर रहे थे। सो ग्वालबालों ने श्रीकृष्ण के कहने पर उन याजकों से कुछ भोजन माँगा। पर वे कोरे कर्मठ ब्राह्मण ग्वालों के लड़कों को यज्ञ की रसोई भला देने चले? क्रोधित हो बोले- हट जाओ सामने से। क्यों अपवित्र दृष्टि डालते हो? यह रसोई हमने तुम ग्वालों के छोकरों के लिए ही तो राँधी है!

यज्ञ हेतु हम करीं रसोई। ग्वाल पहले देहि न सोई।।
बेचारे बालक निराश होकर लौट आये। श्रीकृष्ण ने कहा, भैया! तुम तो उनकी स्त्रियों से जाकर माँगों। वे अवश्य देंगी, क्योंकि-

उनके मन दृढ़भक्ति हमारी। मानि लैहिं बै बात तुम्हारी।।
हुआ भी वही। बड़े ही प्रेम से अनेक प्रकार के पकवान् ले लेकर द्विज पत्नियाँ स्वयंही राम कृष्ण को अपने हाथ से भोजन कराने चलीं।
कठोर कर्मठों ने बहुत रोका, पर उन प्रेम मूर्ति व्रजांगनाओं ने उनकी एक न सुनी। और तो सब सविनय अवज्ञा करके चली गयीं, केवल एक ब्राह्मणी अपने पतिदेव के धर्मपाश में फँस गयी। बेचारी पति के पैरों पर नाक रगड़ रगड़कर कहने लगी-

देखन दै वृन्दावन चंद।
हा हा कन्त, मानि बिनती यह, कुल अभिमान छाँड़ि मतिमंद।।
कहि, क्यों भूलि धरत जिय औरै, जानत नहिं पावन नँदनंद!
दरसन पाय आयहौं अबहीं, हरन सकल तेरे दुखद्वंद।। - सूर

वृन्दावन चंद्र श्यामसुंदर की झलक नेक देख आने दो। उस प्यारे गोपाललाल को यह कटोरा भर केशरिया दूध पिला आने दो। सभी सहेलियाँ तो गयी हैं। इस मिथ्या कुलाभिमान में क्या रखा है। छोड़ क्यों नहीं देते यह दम्भाचार? अरे, तुम इतने बड़े विद्वान होकर भी एक मूर्ख की भाँति बात कर रहे हो! मन में पाप विचारते हो! बालकृष्ण में मेरी पवित्र प्रीति को तुम शायद किसी और दृष्टि से देखते हो। क्या कहूँ तुम्हारी बुद्धि को! छोड़ो, जाने दो मुझे, आर्य पुत्र! उस प्राण प्यारे गोपाल का मुखचंद्र मुझे देख आने दो। हा! मैं कैसे जाऊँ। नन्द नन्दन को कैसै देख आऊँ!

रति बाढ़ी गोपाल सों।
हा हा! हरि लों जान देहु प्रभु, पद परसति हौं माल सों।।
सँग की सखी स्याम सनमुख भई, मैं हिं परी पसु पाल सों।
परबस देह, नेह अंतर्गत, क्यों मिलौं नयन बिसाल सों।। - सूर

वहाँ संग की सब सखियाँ अपने अपने हाथ से प्यारे कृष्ण और बलराम को प्रेम से भोजन करा रही होंगी, हाय! मैं ही अकेलो यहाँ इस पशुपाल के पाले पड़ी छटपटा रही हूँ। भले ही यहाँ यह पराधीन देह तड़पा करे, हृदय के भीतर तो कृष्ण प्रेम की आग जलती ही रहेगी। उस आग को कौन बुझा सकता है!
पिय, जनि रोकहि अब जान दै।।
हौं, हरि बिरह जरी जाचति हौं, इतनी बात मोहि दान दै।।
बेनु सुनौं, बिहरत बन देखौं, यह सुख हृदय सिरान दै।
पुनि जो रुचै सोई तू कीजै, साँच कहति हौं आन दै।।
जो कछु कपट किये जाचति हौं, सुनहि कथा हित कान दै।
मन क्रम वचन ‘सूर’ अपनो प्रन राखौंगी तन मन प्रान दै।।

नाथ! अब मत रोको. अब तो मुझे तुम जाने ही दो। मैं कृष्ण के विरह में हाय! कब से जल रही हूँ। तुमसे बस, एक ही दान माँगती हूँ, न दोगे क्या? वन में उस वृन्दावन विहारी गोपाल को देख और उसकी बाँसुरी सुनकर मुझे अपना हृदय ठंडा कर लेने दो। इतना ही तुमसे चाहती हूँ। फिर जो तुम्हारे मन में आवे सो करना। यह मैं निष्कपट भाव से सौगंध खाकर कहती हूँ। न जाने दोगे, तो भी अपना प्रण तो पूरी करूँगी ही। तन, मन और प्राण भी देकर मैं प्यारे मदन मोहन से तो मिलूँगी ही। हा! कब तक तुम्हें समझाऊँ। मिलन की अवधि ही टली जाती है। लो, यह देह ले लो। तुम्हारा दावा सिर्फ इसी पर है न? सो, इस चाम की देह को सँभालकर रख लो। प्राण तो मेरे उस प्राण प्रिय व्रजचंद के ही चरणों में जाकर बसेंगे-

कहँ लगि समुझाऊँ ‘सूरज’ सुनि, जाति मिलन की औधि टरी।
लेहु सँभारि देह पिय, अपनी, बिन प्राननि सब सौज धरी।।
प्रेमाधीरता रही भी यही करके-

चितवन हुती झरोखे ठाढ़ी, किये मिलन कौ साजु।
'सूरदास' तनु त्यागि छिनके में तज्यौ कंत कौ राजु॥

धन्य प्रेमसूति व्रजाड्ड़्ने |

आत्यंतिक विरहासक्ति में धैर्यका भी धैर्य छूट जाता है । यह अवस्था ही कुछ ऐसी होती है। शरत्पूर्णिमाको, जब कालिंदी-कूलपर श्रीकृष्ण ने बासुरी बजायी थीं, ऐसी कौन ब्रजवनिता थीं जो स्वजन-परिजनों के लाख रोकने पर भी वहाँ जाने से रूकी हो? अहो! वह प्रेमाधीरता |

श्रीब्रज-रत्न प्राणघान हरिका,चल सखी ! चल देखें सत्वर ।
है कदम्बके तले नाचते,बेणु बजाते राधावर्॥
घनश्याम की ध्वनि सुन क्योंकर मै चातकी धैर्य धारूं?
क्यों न प्राण-प्यारेके ऊपर अपना तन-मन, धन वारूँ ?॥ -मधुप
कैसी खिंची जा रही हैं ब्रजबालाएँ उस ओर्।
सुनत चली ब्रज-वधु गीत-धुनि कौ मारग गहि।
भवन-भीत, द्रुम-कुंज-पुंज कितहुँ अटकी नहीं॥
ते पुनि तेहि मग चलीं रँगीली तजि गृह-संग्रम।
जनु पिंजरन तै उडे, छुड़े नव-प्रेम विहंगम्॥
साधन सरित न रुकै करो जो जतन कोउ अति।
कृष्ण हरे जिनके मन, ते क्यों रुकैं अगम गति?- नन्ददास

और निर्दय निठुर स्वजन संबंधियों ने जिन व्रजबालाओं को किसी तरह काल कोठरियों में बंदकर रोक रखा था, उनकी दशा यह हुई-

जे रुकि गई घर अति अधीर गुनमय सरीर बस।
पुन्य पाप प्रारब्ध रच्यो तन नाहिं पच्यो रस।।
परम दुसह श्रीकृष्ण विरह दुख व्याप्यौ जिनमें।
कोटि बरस लगि नरक भोगि अघ भुगते छिनमें।।
पुनि रंचक धरि ध्यान पीय परिरंभन दिय जब।
कोटि स्वर्ग सुख बोगि छिनहिं मंगल कीनों सब।। - नन्ददास

उस एक क्षण की विरह व्याकुलता का तनिक ध्यान तो करो। करोड़ों वर्षों के दुखों का लय हो जाता है उस मिलन उत्कण्ठा में, उस अतुलनीय प्रेमाधीरता में। आह कैसी होती होगी वह आतुरता! कितने प्रेमियों के प्राण पक्षी न उड़ा दिये होंगे उस दयाहीना अधीरता ने। पर प्रेमी तो बलि होने के अर्थ ही जीवन धारण करते हैं। ऐसे अधीर प्रेमातुर प्राण कब तक जीवित रह सकते हैं? व्यर्थ ही प्रेमातुरों को दोष देते हो। कहाँ तक बेचारे धैर्य धारण किये रहें। धैर्य की भी कोई हद होती है। बेचारे विरही अपने प्राण विहंगमों को कब तक बाँधकर रखे रहें। क्यों न उनके हाथों से छूट कर उड़ जायँ उनके छटपटाते हुए प्राण पक्षी-
बहुत दिनान की अवधि आस पास परे
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान कों;
कहि कहि आवन छबीले मन भावन कौ,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान कों।
झूठी बतियान की पत्यानी तें उदास ह्वैकैं,
अब ना घिरत ‘घनआनंद’ निदान कों;
अधर लगे हैं आनि करिकैं पयान प्रान,
चाहते चलन ए संदेशो लै सुजान कों।।

इतना धीरज क्या कुछ कम है, जो इस बेचारी कृष्णानुरागिणी गोपिका ने वहाँ तक संदेसा ले जाने के लिए अपने आतुर प्राणों को ओठों पर कुछ देर तो ठहरा लिया? अरे भाई! प्रेमातुरों को इतना ही बहुत है। अब भी प्रियतम चाहें तो उस अभागिनों को इतना ही बहुत है। अब भी प्रियतम चाहें तो उस अभागिनी के प्राणों को अधरों से लौटाकर उसके हृदय में पुनः बसा सकते हैं! प्यारे कृष्ण! तनिक सुनो तो, वह क्या कह रही है। हाय री, प्रीति!

एक विसास की टेक गहैं लगि आस रहे बसि प्रान बटोही।
हौ घनआनँद जीवन भूरि दई कित प्यासन मारत मोही।।
बस, अब और क्या कहूँ!
हरीचन्द एक व्रत नेम प्रेम ही कौ लीनों,
रूप की तिहारे, व्रज भूप! हौं उपासी हौं।
ज्याय लै रे प्राननि बचाय लै लगाय अंक,
एरे नन्दलाल! तेरी मोल लई दासी हौं।।
---   वियोगी हरि