Friday, 10 April 2020

क्या ईश्वर और धर्म बिना काम चलेगा? - 2

भाग 2
क्या ईश्वर और धर्म बिना काम चलेगा?


कोई भी अनुष्ठान, पूजन, भजन आदि तीव्र संवेग से युद्ध प्रयोक्ता द्वारा सुचारू रूप से किया जाय, तो वह अवश्य सफल होता है। जहाँ कहीं विफलता होती है, वहाँ उपर्युक्त त्रुटियों की ही कल्पना उचित है। अनुष्ठानादि में अविश्वास उचित नहीं है। नैयायिकों ने भी शास्त्रों के कुछ कर्मों की विफलता देखकर उनमें कर्तृ-क्रियादि वैगुण्य की ही कल्पना की है। जो कहा जाता है कि ‘सोमनाथ आदि के मन्दिर तोड़ने वालों को कुछ भी दण्ड न मिला’ सो ठीक ही है। एक बार काशी  के एक योग्य विद्वान ने मुझसे कहा कि ‘आज दुर्गा जी की चाँदी की आँखों को चोर चुरा ले गये। महाराज! यदि दुर्गा जी से अपने ही आँख की रक्षा न हुई, तब वे हम सबकी रक्षा कैसे कर सकेंगी?’ किसी एक और व्यक्ति ने शिव जी पर चढ़े हुए अक्षत या फलों को ले जाती हुई मूषिका को देखकर यह समझ लिया था कि ‘मूर्तिपूजा व्यर्थ है, मूर्ति में देवत्व नहीं है।’

ऐसी बातों पर विचार करने से विदित होता है कि यह कितनी मोटी दृष्टि की बात है। व्यापक परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र ही रहता है, सम्पूर्ण विश्व उन्हीं में रहता है। सोना, उठना, बैठना सम्पूर्ण कर्म उन्हीं में होता है। जिस तरह गर्भस्थ बालक की सम्पूर्ण चेष्टाएँ माँ के गर्भ में ही होती हैं, फिर भी माता कुपित नहीं होती। वैसे ही जीवों की अनेकों हलचलें उसी परमात्मा में होती हैं, ‘क्षमाशील परमात्मा सबको ही सहन करता है।’

“उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजाऽऽगसे।
किमस्तिनास्ति व्ययपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः।।”
ब्रह्मा जी कहते हैं- ‘हे अधोक्षज! गर्भगत बालक के पादोत्क्षेपण को जननी क्या अपराध मानती है? यदि नहीं, तो अस्तिनास्ति व्यपदेश से भूषित यह सम्पूर्ण विश्व क्या आपकी कुक्षि से बाहर है?’ भगवद्ध्यान के प्रभाव से एक ज्ञानी प्राणी भी देहाभिमानशून्य होता है। उसके एक बाहु में कोई कण्टक चुभाता है, दूसरे बाहु में कोई चन्दन-लिम्पन करता है। वह उतना उदार, सहनशील एवं देहाभिमानशून्य होता है कि न अनुकूलाचरण वालों पर प्रहृष्ट हो, न प्रतिकूलाचरण वालों पर कुपित हो। फिर भी अपने-अपने कर्तव्य के अनुसार ही उन सबको यथा समय फल मिलता है।
जब एक देह वाले भगवद्भक्त ज्ञानी की ऐसी स्थिति है, तब अननतकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान का तो कहना ही क्या है। उसके तो अपरिगणित देह हैं और वह महाज्ञानी सर्वत्र असंग और अभिमान शून्य है। वह किसी के सम्मान या अपमान में किस तरह क्षुब्ध हो सकता है? भावुक लोग शास्त्रों के आज्ञानुसार उसकी अनन्तानन्त प्रतिमाओं का निर्माण कर मन्त्रों से आवाहन, प्रतिष्ठापनादि द्वारा उसकी आराधना करते हैं और अपने कर्म के अनुसार ही यथाकाल फल पाते हैं। शास्त्र के अनुसार मन्त्रों एवं आराधनाओं के अनुसार पूजा-ग्रहण करने और फल देने के लिये ही भगवान का उन मूर्तियों में प्राकट्य होता है। कोई उन मूर्तियों का अपमान करके भगवान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।

जिस तरह सूर्य पर निष्ठीवन करने से वह सूर्य पर न जाकर अपने ही ऊपर पड़ेगा, आकाश पर मुष्टिप्रहार या तलवार का चलाना बेकार है, वैसे ही भगवान पर प्रहार या उनकी मूर्तियों का तोड़ना बेकार है। अनन्त मूर्तियों में रहने वाले भगवान विश्वमूर्ति एवं अमूर्ति भगवान इतने उदार और क्षमाशील तो हैं कि मूर्ति तोड़ने वालों के कर्म ही उन्हें फल देते हैं। साधारण व्यक्ति जैसे असहिष्णु कोई भी शासक नहीं होते, फिर परमेश्वर की तो बात ही दूसरी है। किन्हीं कर्मों के फल अवसर के अनुसार ही होते हैं। ‘ओडायर’ की हत्या करने वाला व्यकक्ति तत्काल ही पकड़ लिया गया था, परनतु तत्क्षण ही उसे फाँसी नहीं दी गयी, न गोली से उड़ा दिया गया। बाकायदे न्यायालय में न्याय हुआ। फिर दण्ड निश्चित हुआ। यथाकाल दण्ड दिया गया। जब प्राकृत शासकों में इतनी सहिष्णुता और काल-प्रतीक्षा होती है, तब फिर परमेश्वर ही सहिष्णु और काल प्रतीक्षक क्यों न हों?

सम्राट, स्वराट, विराट या गवर्नर, कमिश्नर आदि कोई भी अपने अपमान करने वाले व्यक्ति को, स्वयं पकड़ने या तत्क्षण दण्ड देने में नहीं प्रवृत्त होते, किन्तु उनके कर्मचारी लोग ही उसे पकड़ने में प्रवृत्त होते हैं। वे ही न्यायाध्यक्ष का न्याय पाकर यथाकाल दण्ड देते हैं। इसी तरह ईश्वर की मूर्तियों का अपमान करने वालों को तत्क्षण ही परमेश्वर दण्ड नहीं देता, किन्तु उसके कर्मचारी ही यथाकाल दण्ड देते हैं।
कितने ही अज्ञ कहा करते हैं कि ‘यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान हो, तो मैं उसे गाली देता हूँ, उसकी मूर्ति को तोड़ता हूँ, मेरे सामने आये या मेरा मुँह बन्द कर दे।’ परन्तु सोचना यह चाहिये कि यदि बड़े-बड़े तपस्वी युगयुगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरों की तपस्या के पश्चात उसका दर्शन पाते हैं, अनन्त तपस्याओं से उसका अस्तित्व निर्णय कर पाते हैं फिर वह इन अज्ञों के कहने मात्र से कैसे प्रकट हो या उनके कथनानुसार उनका मुँह कैसे बन्द करे? क्या किसी सम्राट को ऐसा कहने पर वह प्रवृत्त होगा?

वस्तुतः जैसे सावधान पुरुष उन्मादी या बालक की बातों पर ध्यान न देकर उस पर कृपा ही करता है, वैसे परमेश्वर भी कृपा ही करते हैं, ‘जो करनी समुझें प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कल्प सतकोरी।’ द्वित, त्रित आदि महर्षियों ने किसी यज्ञ में भगवान को प्रकट करने की प्रतिज्ञा कर ली, परन्तु जब भगवान प्रकट हुए तब वे शाप देने को प्रस्तुत हुए, इस पर ऋषियों ने समझाया कि वे प्रभु भक्ति से ही प्रकट हो सकते हैं, अहंकार से नहीं। अतः ऐसा करना साहस है। हिरण्यकशिपु आदि को भी मारने के लिये भगवान का प्रह्लाद की भावना से प्राकट्य हुआ।

“सहे सुरन्ह बड़ काल विषादू। नरहरि प्रकट कीन्ह प्रह्लादू।।”

इसके अतिरिक्त वे भगवान के नित्यपार्षद हैं, भगवान की लीला के अंग होकर ही उनका जन्म था। इसलिये उनके लिये भगवान का प्राकट्य ठीक है, परन्तु साधारण जन्तुओं के लिये तो वैसा ही होगा, जैसे मच्छर को मारने के लिये तोप का दागना। जिन कीटों को भगवान की कोई भी शक्ति पूर्ण दण्ड दे सकती है, उनके कहने से भगवान का प्रकट होना अत्यन्त ही अनुपयुक्त है। इसलिये मूर्तितोड़कों को दण्ड देने के लिये भगवान का प्राकट्य नहीं हुआ और न कोई चमत्कारपूर्ण तात्कालिक घटना घटी।

चींटी, मूषिका आदि की प्रवृत्ति अज्ञानपूर्विका होती है, चौरादि में भी अज्ञान की ही बहुलता है। अतः उनकी स्थिति क्षम्य ही है; किन्तु विद्वेषाभिनिविष्टचेताओं को यथाकाल दण्ड भोगना पड़ा ही। सुना जाता है, औरंगजेब ने मरते समय अपने पुत्र को पत्र लिखकर अपना दुःख बड़े दैन्यपूर्ण शब्दों में निवेदन किया और सोमनाथ के मन्दिर को तोड़ने वाला महमूद गजनवी मरने के समय अपने सामने सोने-चाँदी का ढेर लगवाकर (जिसे वह लूट लाया था) खूब रोया।
कहीं-कहीं लोगों को बहुत सन्देह हो जाता है, जब वे देखते हैं कि अत्याचारी प्रसन्न है और सदाचारी धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं। परन्तु यह निश्चय रखना चाहिये कि जैसे विषवृक्ष में विष का ही फल लगता है, अमृत फल नहीं; वैसे ही पाप से दुःख ही होगा, सुख नहीं; पुण्य से सुख ही होगा, दुःख नहीं। हाँ, विलम्ब हो सकता है। कोई बीज अपना फल देने में कुछ काल ले सकता है, परन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि विषवृक्ष में अमृत का फल लगे।

कोई प्राणी चैत्र में भले ही मटर या चना बोता हो, परन्तु यदि उसने कार्तिक में गेहूँ बोया है, तो उसे चैत्र में काटने को तो गेहूँ ही मिलेगा। इसी तरह कोई प्राणी भले ही अधर्म-अत्याचार कर रहा हो, मूर्ति तोड़कर, शास्त्र-धर्म तोड़कर ताप करता हो, परन्तु इस समय फल तो वही भोगने को मिलेगा जैसा कर्म पहले कर चुका है। हाँ, उग्र पापों और पुण्यों का फल जल्दी मिलता है, परन्तु वह भी कुछ तो अवसर की प्रतीक्षा करता ही है।

“त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिःपक्षैस्त्रिभिर्दिनैः।
अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते।।”
इसीलिये नल, राम, युधिष्ठिरादि धर्मनिष्ट होते हुए भी दुःखी थे। रावण, दुर्योधनादि विपरीतगामी होने पर भी सुखी थे। परन्तु अन्त में उन्हें अपने पापों का भी फल भोगना पड़ा ही। राम, युधिष्ठिरादि सुखी हुए, रावणादि का सर्वनाश हो गया।

“सौ लख पूत सवा लख नाती। तेहि रावन के दिया न बाती।।”

ऐसे ही औरंगजेब आदि की भी पूर्वजन्म की तपस्या थी, उसी के प्रभाव से उन लोगों का उतना तेज और वैभव था। जब तक उसकी समाप्ति नहीं हुई, तब तक उनका पराभव असम्भव था। सामान्यतः यही होता है कि तपस्या से राज्य और राज्य से नरक होता है। जब प्राणी पीड़ित, पददलित, उच्छोषित, विताडित होता है, तब उसे न्याय, धर्म और ईश्वर सूझता है। ऐसा होते ही कुछ उन्नति और प्रभुता होती है; बस, उसी समय अपने आपको सम्हालना बुद्धिमानी है। अधिकार की कुर्सी मिलते ही न्याय, धर्म और ईश्वर को भूल जाते हैं।
“नहिं कोउ अस जन्मेउ जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।”

बस, उसी समय रावण, औरंगजेब जैसी प्रवृत्ति होने लगती है। परमेश्वरीय दण्ड उन्हें मिलता है, परन्तु न्यायकारी को परमेश्वर काल की प्रतीक्षा करके ही उन्हें शुभ कर्मों का फल भोग लेने पर ही अशुभ कर्मों का फल प्रदान करते हैं। श्रीहनुमान ने रावण के विचित्र वैभव को देखकर यही निश्चय किया कि ‘अहो! यदि इसमें अधर्म बलवान न होता तो यह शक्र सहित समस्त लोकपालों का स्वामी ही होने योग्य था।’

“यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः।
स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता।।”
लोकपाल भयभीत होकर इसके भ्रुकुटी का ही विलोकन करते रहते हैं।

“कर जोरे सुर दिसिप बिनीता। भ्रुकुटि बिलोकहिं परम सभीता।।”

हनुमान जी ने समझाया कि रावण! तुमने बहुत कुछ सत्कर्म किया है, उसका फल तुम्हें प्राप्त है-

“उत्तम कुल पुलस्त्य कर नाती। सिव बिरञ्चि पूजेउ बहुभाँती।।
बर पायहु कीन्हेंउ सब काजा। जीतेहु लोकपाल सुर राजा।।”
परन्तु अब अधर्म के फलभोग का समय आ रहा है, सावधान हो जाओ। तात्पर्य यही कि अत्याचारी को भी अपने सत्कर्मों का फलभोग मिलता है, अवसर पाकर सत्कर्मों का भी फल मिलता है। ऐसे ही धर्मात्मा को भी पिछले प्रारब्ध तीव्रतम अधर्म का भी फल भोगना पड़ता है।

जो कहा जाता है कि भारत  ‘धर्म-धर्म’ चिल्लाता है, तो भी उसका पतन ही पतन ही दृष्टिगोचर होता है। दूसरे देश धर्म का नाम भी नहीं लेते, फिर भी हम पर शासन कर रहे हैं। परन्तु यह भी अविचारित-रमणीय बात है। ‘दूर के ढोल सुहावने लगते हैं।’ यह हम कह चुके हैं कि जहाँ भी कहीं उन्नति देखो वहाँ उसके मूलभूत धर्म की कल्पना कर लेनी चाहिये। विषवृक्ष में अमृतफल कदापि नहीं लगता।
जहाँ धर्म की चर्चा नहीं वहाँ ऐसी-ऐसी भयानक विपत्तियाँ आती हैं कि नगर के नगर ज्वालामुखियों में जल जाते हैं। कभी-कभी बड़े-बड़े देश के देश अकस्मात् धरातल में विलीन हो जाते हैं। कभी समुद्र की गोद में दिखाई देते हैं। कभी भयानक संग्रामों से आपस में ही कट मरते हैं। शान्ति की दृष्टि से आज भी भारत में और देशों की अपेक्षा गनीमत है। आध्यात्मिकता और धार्मिकता का ही फल है कि आज भी यहाँ लूट-खसूट कर दूसरों की सम्पत्तियों को आत्मसात्‌ करने में संकोच है। यहाँ की सभ्यता-संस्कृति आज भी बची है।

संसार में हजारों संस्कृतियाँ उत्पन्न होकर मिट गयीं, परन्तु प्राचीनतम भारतीय संस्कृति आज भी सुरक्षित है। आज भी भौतिक दृष्टि में कितने ही बढ़े चढ़े देशों के समझदार विद्वान भारत से बहुत कुछ आशा कर रहे हैं। कितने ही पाश्चात्य विद्वान शान्ति-सुख के लिये बराबर भारत की शरण आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त आज तो ऐसा कोई भी राष्ट्र और समूह नहीं है, जो धर्म या ईश्वर को किसी न किसी रूप में न स्वीकार करता हो। धर्मवादिनी, ईश्वरवादिनी संस्थाओं को गैरकानूनी करार देनेवालों, ईश्वर और धर्म को साम्य विरोधी समझकर अपने देश से निकल जाने का आदेश देने वालों ने भी आज परमेश्वर को पुकारना प्रारम्भ किया है। लाखों वैज्ञानिक, हजारों विज्ञानशालाएँ जिनकी आज्ञानुसार सफल प्रयोगों में तत्पर हैं, उन लोगों ने भी अस्त्र-शस्त्र संगठन-बल, बाहु-बल, बौद्ध-बल से सम्पन्न होकर भी, आज परमेश्वर को पुकारने में अपना और अपने राष्ट्र का कल्याण समझना आरम्भ कर दिया है। ऐसी स्थिति में भारत को आज धर्म और माला-जय की आवश्यकता न प्रतीत हो, यह आश्चर्य है।

जो कहा जाता है कि यहाँ आज भी धर्म के नाम पर सब देशों से अधिक धन और समय का व्यय होता है, सो अवश्य ठीक है। परन्तु सदुपयोग, दुरुपयोग नाम की भी तो कोई वस्तु है। यह स्पष्ट ही है कि अधिकतर धन और समय का धर्म के नाम पर अपव्यय होता है। अपरिगणित धर्मादे की सम्पत्तियों का दुरुपयोग हो ही रहा है। यदि धर्म के यथार्थ स्वरूप का प्राकट्य या सच्छास्त्रों के प्रचार से अविद्यानिरसन में उनका उपयोग हो तो सचमुच लाभ हो सकता है। इसी तरह छप्पन लाख साधुओं की गणना की भी बात है। तात्पर्य यह है कि शास्त्र के अनुसार शुद्ध भावना से ही किया गया जप, तप, धर्मानुष्ठान लाभदायक होता है। अन्यथा देखते ही हैं कि धुन्धु ने बहुत काल तक अनन्त तप किया था, परन्तु भावना वेदादि शास्त्रों और धर्म के विरोध की थी, इसीलिये उस तप का भी अन्तिम पर्यवसान उत्तम नहीं हुआ। सदुपयोग से एक पैसे का भी दान लाभदायक होता है, दुरुपयोग से हानिकारक होता है। क्रमशः ...
(धर्मसम्राट श्री करपात्री जी महाराज श्री)

क्या ईश्वर और धर्म बिना काम चलेगा? - 1

दशकों पूर्व का एक लेख
*धर्म सम्राट श्री करपात्री जी*

क्या ईश्वर और धर्म बिना काम चलेगा?


मथुरा ‘धर्म संघ’ के विशेषाधिवेशन में ‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादक ने अपने कुछ मित्रों की राय और अपने सन् 1942 के 20 सितम्बर के अंगवाले लेख की ओर ध्यान दिलाया और यह बतलाया कि “आज चार मुख के ब्रह्मा, छः मुख के षडानन, हजार मुख के शेष भी यदि कहें कि माला जपने से सुख-शान्ति होगी, तो भी दुनिया इस बात को नहीं मान सकती, जबकि पूजा-पाठ और माला जप होते हुए भी सोमनाथ का मन्दिर टूट ही गया, काशी विश्वनाथ को पलायन करना ही पड़ा। आज भी सब देशों की अपेक्षा यहाँ अधिक धर्म होता है, यहाँ छप्पन लाख साधु अपना समय निरन्तर भजन में ही लगाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों गृहस्थ भी भजन करते हैं। बड़े-बड़े मठ-मन्दिर करोड़ों की सम्पत्तियों से भरपूर हैं। गणितज्ञों ने गम्भीर विवेचन करके यह निश्चय कर लिया है, कि हर एक व्यक्ति के पीछे पौने तीन घण्टे का भजन पड़ता है। इस तरह प्रति व्यक्ति के पीछे दो आने की आय और उसमें से डेढ़ पैसे का दान पड़ता है। इस तरह सम्पूर्ण देशों की अपेक्षा यहाँ का धर्म, दान और भजन अधिक है। यदि इनका सदुपयोग हो (धर्मादि की सम्पत्तियों का सदुपयोग हो) तो कितनी ही यूनिवर्सिटियाँ चल सकती हैं। आज की दुनिया धर्म से ऊब गयी है, अतः आज ‘टन-टन’, ‘पों-पों’ से काम नहीं चलेगा। लोगों को धार्मिक बनने का उपदेश करने के पहले वर्तमान स्वरूप और उसके परिष्कार की ओर ध्यान देना होगा।”

वस्तुतः ऐसी अनेकों शंकाओं का मूल कारण है, अपने धर्म, कर्म, सभ्यता एवं संस्कृति से सम्बन्ध रखने वाले शास्त्रों का अध्ययन न करना, उसके विपरीत इतिहासों, साहित्यों का अभ्यास और विपरीत वातावरण में पलना।

जब धर्म के स्वरूप पर हम विचार करते हैं तो मालूम होता है कि धर्म केवल माला जपना ही नहीे बतलाता, किन्तु वह तो अधिकारानुसार सामाजिक, राष्ट्रीय सब प्रकार के कर्त्तव्यों को सोच-समझकर यथायोग्य काम करने को कहता है। अतः इस प्रश्न का अवकाश ही नहीं रहता कि जब घर में आग लगी हो तो पानी ढूँढकर बुझाने का प्रयत्न करना चाहिये, केवल ‘राम-राम’ कहने से काम नहीं चल सकता। परन्तु यहाँ भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि घर में आग लगने पर ‘राम-राम’ कहते बैठे रहना सबसे हो भी नहीं सकता।
विपरीत भावना से, प्रचण्ड वायु से आग अधिक उत्तेजित भी हो सकती है, परन्तु जिसे पूर्ण विश्वास है वह ‘राम-राम’ के सहारे भोजन-पानादि की भी परवाह नहीं करता। जिसके मन में घर में आग लगने पर भी नाम का भाव दिखाई देता है, उसकी आग भगवत्कृपा से अवश्य बुझ जायेगी। परन्तु वैसी धारणा और योग्यता न होने पर भी जो भोजनपान-व्यवहारादि कार्यों में तत्पर, रहते हुए भी, समाज तथा राष्ट्र के हित में नहीं प्रवृत्त होते हैं; किसी भी धार्मिक, सामाजिक कार्यों के अवसर पर केवल राम-नाम का सहारा पकड़ते हैं, वे तो योग्यता और अवसर को न सोचकर एक सत्सिद्धान्त को केवल कलंकित ही करने का प्रयत्न करते हैं।

वैराग्य के स्थान में राग, राग के स्थान में वैराग्य प्रवृत्ति के स्थान में निवृत्ति और निवृत्ति के स्थान में प्रवृत्ति-अनुचित है, हानिकर है।

“नीकीहू फीकी लगत, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में, रस सिंगार न सुहात।।”
परन्तु यदि दूसरा उपाय ही दृष्टिगोचर न हो, तब तो सिवा भगवान के सहारा के और चारा ही क्या है? इसीलिये तो जहाँ एक परमविश्वासी उच्चकोटि के भगवद्भक्त के लिये भगवद्भजन ही सर्वाभीष्टपूरक है, वैसे ही एक अत्यन्त आर्त्त या अर्थार्थी एवंच सर्वसाधनविहीन का एक मात्र भगवान ही सहारा है। तत्त्वनिष्ट कृतकृत्य ज्ञानी भक्त स्वभाव से ही भगवान को भजते हैं। जिज्ञासु ज्ञान-प्राप्त्यर्थ भगवान को भजते हैं। अर्थार्थी, आर्त्त अपनी अर्थ-प्राप्ति और आर्तिनिवृत्ति के लिये परमेश्वर को भजते हैं। किसी भी कामना वाला व्यक्ति अपनी अभीष्ट पूर्ति के लिये तत्तत्‌ उपायों का अनुष्ठान करता हुआ भी, उनकी सफलता के लिये परमेश्वर की आराधना करता है। जिज्ञासु भगवच्चरण-पंकज-समर्पण-बुद्ध्या धर्मों का अनुष्ठान करता है।

वेदान्तों का श्रवण, मनन, निदिध्यासन करता है। आर्त्त, अर्थार्थी शास्त्र के अनुसार नैतिक, आर्थिक उपायों का प्रयोग करता है, फिर भी ‘मामनुस्मर युद्ध्य च’ के अनुसार अपने अस्त्र-शस्त्र बल का गर्व, बौद्ध और बाहुबल के घमण्ड को छोड़कर, ईश्वर का आश्रयण करना पड़ता है। क्योंकि ईश्वर अनुकूल होने पर ही सम्पूर्ण लौकिक उपायों की सफलता होती है। भगवदुपेक्षित प्राणी के लिये सम्पूर्ण उपाय भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसीलिये माता-पिता के द्वारा अनेक उपचारों से लालन-पालन करते रहने पर भी, बालकों की मृत्यु देखी जाती है।
चिकित्सकों के अनेक उपचारा करने पर भी रोगी मरते दिखते हैं। अत:-
“बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह
नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौः।[1]
“मातु मृत्यु पितु शमन समाना। सुधा होहिं विष सुन हरियाना।।
मित्र करहिं सत रिपु की करनी। ताकहँ बिबुध नदी बैतरनी।।
सब जग ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।”
“राम विमुख सम्पति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरसि गये पुनि तबहिं सुखाहीं।।”
अतः साधन-सम्पन्नों को भी श्रीभगवान का आश्रयण आवश्यक है। फिर तो जो साधन-विहीन हैं, उनके लिये तो सिवा भगवान के और सहारा ही क्या है? जैसे एक वीतराग तत्त्वनिष्ठ कृतकृत्य केवल भगवान के ही सहारे रहता है, उसके सम्पूर्ण योगक्षेम का भगवान ही निर्वाह करते हैं।

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।”
अनन्य भावना से भगवान की आराधना में तत्पर प्राणियों को अप्राप्त अभीष्ट-प्राप्तिरूप योग और प्राप्त रक्षणरूप क्षेम श्रीभगवान ही पूरा करते हैं। वैसे ही साधनविहीन विश्वासी आर्त्त-अर्थार्थी की भी एकमात्र भगवान ही सहारा है। अतः उसके भी योगक्षेम को भगवान ही वहन करते हैं। परन्तु भारत  की स्थिति तो आज उससे भी अधिक चिन्तनीय है। वह तो आज आत्माराम कृतकृत्य नहीं, निष्काम मुमुक्षु नहीं, साधन-सम्पन्न आर्त्त एवं अर्थार्थी नहीं, इतने पर भी भगवद्विश्वासी नहीं अर्थात आर्त्त-अर्थार्थी होने पर भी आर्त्ति निवृत्ति और अर्थ प्राप्ति के लिये अपेक्षित साधनों से भी रहित है।
ऐसी स्थिति में भी निराश्रय निष्कपट भाव से भगवान को पुकारने से काम चल सकता था, परन्तु इस समय भगवान से विश्वास उठ गया है। गिरते समय प्राणी के हाथ-पाँव यद्यपि स्वभाव से ही किसी सहारे को टटोलने लगते हैं और दुनिया के सम्पूर्ण सहारों के कमजोर होने पर, एकमात्र भगवान का ही बल रह जाता है।

अतः स्वाभाविक रूप से भगवान का आश्रयण ही शेष रह जाता है। फिर भी जब ब्रह्मा, शेष आदि के कहने पर भी भगवान के पुकारने में विश्वास न हो, तो इसे राष्ट्र का दुर्भाग्य ही समझना चाहिये। रहा यह कि जप, पाठ, पूजा करते हुए भी सोमनाथ का मन्दिर टूट गया, विश्वनाथ भाग गये, हिन्दू जाति का सर्वस्व लुट गया; फिर ईश्वर या धर्म को पुकारने से क्या लाभ? परन्तु यदि ठण्डे दिल से विचार करें, तो इस शंका का कुछ भी महत्त्व नहीं है। पहले तो यह सोचना चाहिये कि क्या किसी उपाय के कभी असफल हो जाने मात्र से, सर्वदा के लिये उसे व्यर्थ और बेकाम समझ लेना उचित है?

क्या कभी वायुयान के फेल हो जाने या किसी यन्त्र के कलपुर्जों के बेकार हो जाने पर सर्वदा के लिये उनको बेकार समझ लिया जाता है? देखते तो यह हैं कि बार-बार वायुयानों, मोटरों, रेलों तथा अन्यान्य यन्त्रों के बेकार या हानिकारक होने पर भी उनका निर्माण और संचालन बन्द नहीं हुआ। बडे़-बड़े आविष्कारक वैज्ञानिक बार-बार विफल होने पर भी प्रयत्न का पीछा नहीं छोड़ते, फिर लाखों सफलता के भी तो उदाहरण विद्यमान हैं, फिर उनके आधार पर विश्वास ही क्यों न किया जाय?

असफलता का कारण कोई त्रुटि ही समझी जाती है। किसी यन्त्र के एक छिद्र या कीलों की गड़बड़ी या कमी-वेशी से वह व्यर्थ या हानिकारक हो सकता है। इसी तरह जो कार्यकारण-भाव अपैरुषेय अत: भ्रम-प्रमादादि स्पर्श से शून्य प्रामाणिक शास्त्र से सिद्ध है, कतिपयस्थलीय व्यभिचार दर्शन मात्र से उसका विघटन नहीं समझा जा सकता। जैसे वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धति से विपरीत किंचित भी उलट-फेर होने पर यन्त्र-संचालन और निर्माण व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक समझे जाते हैं, वैसे ही शास्त्र-निर्दिष्ट पद्धति में किंचित भी गड़बड़ी होने पर जप, पाठ, पूजा आदि धर्म बेकार या हानिकारक हो सकते हैं, परन्तु इससे मात्र से ही उन शास्त्रों का अप्रामाण्य या उन जप, पाठ, पूजाओं में सर्वदा के लये अश्रद्धा कदापि उचित नहीं।
जब अनेकों स्थलों में वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धति से काम करने पर सफलता देखी जा चुकी है, तब तो स्पष्ट ही है कि जहाँ कहीं यन्त्रों की की विफलता या हानिकारकता देखी जाय, वहाँ संचालन, निर्माण में ही कर्तृ-क्रियादि की विगुणता या अन्यान्य किसी प्रकार की त्रुटि का ही फल-बल से कल्पना करना उचित है। इसी तरह जप, पाठ, पूजा आदि किन्हीं भी प्रामाणिक शास्त्रोक्त उपायों को जब अनेकों स्थलों में सफल होते देख रहे हैं, तो कतिपय स्थलों में व्यर्थता देखकर फल-बल से ही उनके अनुष्ठान में या साधनों में या कर्ताओं में अवश्य ही किसी प्रकार की त्रुटि समझ लेनी चाहिये। चिकित्सकों के शास्त्रोक्त अनेक उपाय कहीं व्यर्थ हो जाते हैं, साथ ही कहीं हानिकारक भी साबित होते हैं, तो भी वे उपाय सर्वदा व्यर्थ और सर्वदा हानिकारक हैं, यह समझना भारी भूल है। किन्तु यही समझना उचित है कि जब यह अनेकों स्थलों में सफल होते हैं, तो प्रयोक्ता या प्रयोग को ही कोई त्रुटि होने से कहीं विफल होते हैं।

इस तरह सहज ही में समझा जा सकता है, कि जब अनेक जगह पूजा, पाठ, जप आदि की सफलता प्रत्यक्ष ही देखी जाती है, फिर भी कहीं सोमनाथ आदि स्थलों में यदि पूजादि की व्यर्थता हुई, तो इससे प्रयोक्ताओं या प्रयोगों में ही त्रुटि की कल्पना कर लेनी चाहिये, न कि पूजादि उपायों को ही सर्वदा के लिये व्यर्थ और हानिकारक मान लेना चाहिये। अध्यक्षों और पूजकों के अत्याचारों, अनाचारों और मन्दिरों के अपचारों से मूर्ति में से देवतत्त्व हट जाता है।

अनुष्ठानों में, मन्त्रोच्चारण में किसी तरह की गड़बड़ी या अनुष्ठाताओं के आचार-विचारों में गड़बड़ी से अनुष्ठान व्यर्थ और हानिकारक हो सकते हैं, परन्तु इतने से ही सब अनुष्ठान वैसे ही नहीं समझे जा सकते। इसके सिवा जैसे दो मल्लों के युद्ध में प्रबल मल्ल की विजय, दुर्बल का पराभव होता है वैसे ही किसी अनर्थ को दूर करने के लिये किये गये पुरुषार्थ से, अनर्थ के जनकभूत प्रारब्ध कर्म से संघर्ष होता है। यदि पिछले अनर्थारम्भक कर्मों की प्रबलता रही और अनर्थ निवारक वर्तमान पुरुषार्थ कमजोर रहा तो पुरुषार्थ की व्यर्थता हो जाती है, परन्तु यदि अनर्थारम्भक प्रारब्ध कर्मों से पुरुषार्थ प्रबल हुआ तो अवश्य ही सफलता मिलती है। भेद यही है कि प्रारब्ध कर्म अब घटाये-बढ़ाये नहीं जा सकते, पुरुषार्थ बढ़ाया जा सकता है। अतः पुरुषार्थ से कभी भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
क्रमशः ...