Thursday, 2 February 2017

भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य* गर्ग संहिता

*भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य*
गर्ग संहिता

वज्रनाभ ने पूछा- ब्रह्मन ! नारायण स्‍वरूप भगवान श्रीकृष्‍ण तो प्रकृति से परे हैं, फिर उनका रूप श्‍याम कैसे हुआ ? यह मुझे विस्‍तारपूर्वक बताइये। विप्रवर ! आप जैसे मुनि श्रीकृष्‍णदेव श्रीहरि के चरित्र को जैसा मानते हैं, वैसा हम-जैसे लोग कर्म से मोहित होने के कारण नहीं जान पाते।

सूतजी कहते हैं- मुने ! वज्रनाभ का यह वचन सुनकर उनसे प्रशंसित हो, उन तत्‍वज्ञ तथा कृपालु मुनि ने तत्‍वज्ञान कराने के लिये इस प्रकार कहा।

गर्गजी बोले- राजन् ! ‘श्रृगार रस’ का रूप भरतादि मुनीश्‍वरों ने ‘श्‍याम’ बताया है। उसके देवता श्रीकृष्‍ण हैं। लावण्‍य की राशि तथा उज्‍ज्‍वल होने के कारण श्रीहरि का सुन्‍दर रूप उस तरह श्‍याम है, जैसे मेघों की घटा का रूप दूर से श्‍याम दिखाई देता है, जैसे नदी का जल कुण्‍ड विशेष में श्‍याम दृष्‍टिगोचर होता है तथा जैसे महान आकाश का रूप श्‍यामल प्रतीत होता है; परन्‍तु जल या आकाश उज्‍ज्‍वल ही है, कृष्‍णवर्ण कदापि नहीं है। इसी प्रकार उज्‍ज्‍वल लावण्‍यसिन्‍धु श्रीकृष्‍ण श्‍याम सुन्‍दर दिखायी देते हैं। जैसे उत्‍कृष्‍ट श्‍वेत वस्‍त्र में दूसरे को भावनानुसार श्‍याम आभा दृष्‍टिगोचर होती है, उसी प्रकार करोड़ों कामदेवों की लीला का आधार होने के कारण संतजन श्रीहरि का श्‍यामरूप बताते हैं ।

असत का ज्ञान और सत का संग सम्भव

असत का ज्ञान और सत का संग सम्भव

हमारी जिज्ञासा ही विपरीत होती है ... राम क्या है ? कृष्ण क्या है ?
आदि ...

सन्त वाक्य है ज्ञान असत का ही होता है ... अहा ! हम समझते है ज्ञान प्रभु जी का हो सकता है । हम समझते है हम श्यामसुंदर को जान सकते है ... नहीँ ! असत अर्थात जड़ को जान सकते है ... इस संसार और देह को जान सकते है । देखिये शारीरिक विज्ञान कितना आगे और आत्म विज्ञान के रूप में सब भृमित । आध्यात्मिक ताप पर सब की अलग धारा का उपचार । शारीरिक उपचार की धारा मिल जाती है क्योंकि शरीर और संसार असत है , जड़ है । चेतन को जान नहीँ सकते ... राम का ज्ञान असम्भव है ... और राम का संग सम्भव है । असत का ज्ञान होते ही असत से सम्बन्ध छूट जाता है , झूठ क्या यह जानते ही झूठे से सम्बन्ध टूट जाता है । या सत के आवरण में यह इच्छाओं का जगत विस्मृति बन गया इसका बोध होते ही सत से सम्बन्ध हो जाता है । सत का संग ही सत्संग है यानी राम का संग । प्रभु का संग ।
आज हम राम का ज्ञान प्राप्त करना चाहते है ... और असत् का संग नही छोड़ सकते । सत्संग शब्द जिस भगवत कथा उत्सव हेतु अगर हम प्रयुक्त करते तो विचार कीजिये वही सत्संग है तो कितना सत्य का संग हम करते और कितना असत्य का करते है । वास्तव में आज भगवत उत्सव भी असत का संग नहीँ छोड़ पा रहे । हम राम कथा कर रहे थे ... विद्वान् कहते है आप अन्तः कथा या गुप्त कथा अधिक कहें ... जैसे कौशल्या जी को रावण ले गया , मंदोदरी का पुत्र अंगद , राम की बहन भी ... हनुमान जी का अहंकार ... ऐसे विचित्र गुप्त कथा हम कहें ...
यानि कुछ नया ... जबकि हमारा भाव था वह कहे जिससे उनके संग की प्राप्ति हो । उनसे प्रेम हो । उनके प्रेम के और वितर्क कहने से क्या लाभ ???
भगवता नही कही जा सकती सो करूणता का प्रयास हो ।
फिर लोग कहते नृत्य के सरल नये या क्षेत्रीय भजन भी गवाएं ... मेरे राम वन में गये ... भरत विलाप हो रहा । और हम अब नाचे ... नाच न हुआ तो कथा नीरस ।
अतः आज उत्सव में भी हम राम का संग नहीँ कर पाते ...  राम का संग हो सकता है , असत को जानकर । उसके त्याग होते ही आप राममय है । वर्तमान हम भौतिकी जीव असुर रूप है ... रावण की तरह हमें राम के स्वरूप पर सन्देह ।
देखिये सत (ईश्वर) इतना गहन और विशाल सार सिंधु तत्व है जिसका पार पाया नहीँ जा सकता । ऐसा कोई नहीँ जो कहे मैं सम्पूर्ण राम - कृष्ण या शिव को जान गया हूँ । सम्पूर्ण ज्ञान असत का हो सकता है जिसके परिणाम में हम यह जाने की देह और संसार सत्य नहीँ है .. देह मैं नहीँ हूँ । वात्सव में देह का जीवन रहते सम्बन्ध न टूटे या छुटे तो सत का संग सम्भव ही नहीँ ।
अब देखिये कई भगवत प्रेमियों को हम समझा ही नहीँ पाते कि वह देह नहीँ है ... वह तो जिद्द कर लेते है धरती पर नर रूप आकर गले लगो ... जिस मिलन के परिणाम में आप यह शरीर छोड़ दिव्य लोक जाना चाहते वह क्यों यह तन लेकर आएं और प्राकृत रूप से मिलें क्या यह दैहिक मिलन आपका मिलन है । देह ईश्वर नहीँ ... ईश्वर जो दिव्य सच्चिदानन्द तत्व है वह यह देह स्पर्श कर भी दे तो यह भी दिव्य हो जाती फिर लौकिक सम्भव नहीँ ।
जैसे मीरा बाईं साँ अप्राकृत तनु हो गई थी । वह जड़ देह नहीँ थी । अर्थात जीवन रहते उनकी देह का भगवत स्पर्श हुआ । जिससे यह असत देह का त्याग हो गया और सत का संग ।
देह की धारणा की सिद्धि जब तक हो रही है ... तब तक असत की ही आसक्ति और लालसा बढ़ रही है ।
असत है ... जो नित्य नहीँ है ... जिसका विनाश होता ... जिसका संहार सम्भव ... जिसका कोई एक स्वरूप नहीँ ... जो बदलता रहें ... देह और संसार । यह संसार जिसकी सत्ता से प्रकाशित है और यह देह जिसके संग से जीवनमय है वह सत है । सत ही असत में प्रकाशित है ... विचित्र बात है कि सत असत का प्रकाशक है जैसे देह में आत्मतत्व रूप । और असत का ज्ञान असत का नाशक । यह जगत , यह देह किससे प्रकाशित है ... कारण तत्व क्या है वह कैसे मिलेगा जब हम यह जान जायेंगे जिसकी शक्ति बिना यह देह का कोई संगी न होगा । अर्थात उपकरण में सामर्थ्य और शक्ति किसकी है यह जब पता चलेगा जब हम उपकरण को शक्ति के बिना देख सकेंगे , जिससे उसके प्रति नहीँ उस शक्ति के पीछे आस्था हो जायेगी ।
हम असत के संगी वास्तविक नित्य ईश्वर का चिंतन मनन और गुण गान करें प्रति काल , हर समय उन्हें ही अनुभूत करें तब होगा सत्संग । सत्य यानि राम , राम का संग । ईश्वर का संग । सत्संग । उसके हुए बिना शान्ति सम्भव नहीँ ... बेचारी यह आत्मा अपने प्यारे प्रियतम से ही वार्ता कर सकती है । उसके पहले इसे शांति होगी ही नहीँ । क्योंकि आज लोक में आपके संगी क्या पता किसी जीवन उनसे ही युद्ध हुआ हो । वास्तविक नित्य संग तो एक है ... प्यारे प्रभु । तो ...
असत का ज्ञान असत का नाशक है और असत के गुप्त प्रकाशक सत रूपी ईश्वर से संग में सामर्थ्य रखता है । "तृषित"
कागज की दुनिया में पुतलों में जलती चिंगारी कहती थी राम
सपने बेचती दुनिया में
सदा तड़पती आत्मा पुकारती थी
कहां गए तुम राम ।

फसानें को सजाने हक़ीक़त उसमें उतर गई
फसानें की परत उतारी तो सिर्फ हक़ीक़त रह गई
वरना यहाँ ख़्वाब अधूरे रुख्सत होते है 
और रूह की तलब बुझती नहीँ ...
जो जोड़ा रूह को रूह-आफ़ज (ईश्वर) से
एक मुलाक़ात में खोई सच्ची सुबहाँ मिल गई ।
!!तृषित!!

सेवा , तृषित

सेवा

"सेवा"
प्रथम तो सेवा एक सौभाग्य है । कोई कर्म नहीं , जै जै की ही कृपा है । कर्म कहने में लालच है , लोभ है । और सौभाग्य -कृपा मान लेने में रस और नित्य सेवा का नित्य नव आनन्द।
कर्म क्यों नही , और सौभाग्य क्यों ? शायद शंका उठे । अपने द्वारा प्रारब्ध आदि से अर्जित कर्म नहीँ , सहज मिला ईश्वर का प्रसाद ही सेवा है । सेवा परीक्षा नही , अपितु परम् लक्ष्य ही है ।
अग़र खच्चर घोड़े की दौड़ में दौड़े , तो खच्चर के लिए उन लम्हों को भरपूर जी लेने का समय है । खच्चर अपने प्रयास से घोड़ो के संग नहीँ दौड़ सकता ।
सेवा में सबसे अधिक प्रबलता सच्ची दीनता से है । आज हर शब्द के संग सच लिखना कहना पड़ता है । क्योंकि अभिनय देखते देखते अभिनय सिर चढ़ चूका है । सेवा चाकर होना कहती है , चाकर के अभिनय को नहीँ । वस्तुतः सच्चा चाकर ।
सेवा पर बहुत सवाल आये , तरह-तरह के , परन्तु कुछ कहते न हुआ । क्योंकि पहले भी कहा जब याद के लिए कहा कि कथित नहीँ , स्वभाविक स्थितियां हो । अभिनय नहीँ  , जो हृदय से तत्क्षण स्फुरित हो । सेवा भी इस तरह है , सेवा के पथ को रट लिया जाएं , आदेश ही मान लिया जावें तो भाव न्यून और क्रिया मुख्य होगी । अतः जिसने भी पूछा यें ही कहा - गुरु पथ आदेश और भगवतभाव अनुरूप करिये बस ।
सेवा पर प्रश्न नहीँ , भाव हो । क्रिया की नहीं भावना की प्रधानतायें हो ।
भगवान की सेवा के लिए सम्बन्ध हो , जैसे स्वामी-दास , पिता-पुत्र , गुरु-शिष्य , माँ-पुत्र या पुत्री । मित्र , भाई-बहन और प्रेमी - प्रियतम् , पति - पत्नि । जैसा भाव सहज उनके लिए होवें , वैसी सेवा । यहाँ क्रिया एक भी हो तो भीतरी भाव स्थितियां भिन्न होगी , पत्नी की सेवा और दास की सेवा में फ़र्क है ।
माँ के परोसने , चाकर के परोसने , मित्र के परोसने और प्रियतम् को पवाने में भाव से भेद है । क्रिया एक है कि भोग पवाया गया , परन्तु भाव भिन्न है । अतः सम्बन्ध हो । गहन सम्बन्ध । और उस सम्बन्ध को कहा या माना ही ना जाये , जिया जाएं । जैसे मित्र है तो जैसे हर बात पर मित्र से परामर्श लिया जाता है , वैसा ही हो । और जैसे वात्सल्य भाव से आप माँ या पिता और ईश्वर आपके लाडले लाल है तो वैसा ही जिया जाएं । हर बात नन्हें बालकों को नहीं कही जाती , अपनी समस्याओं को बालकों से ना कह केवल उन संग लाड लड़ाया जाता है तो वैसा ही माने । अर्थात् सम्बन्ध में फिर ऐसा नही कि भाव कच्चा हो । भाव पूर्ण हो , बस । सम्बन्ध ऐसा हो कि समीपता और आवश्यकता अधिक हो । अग़र आप को मित्रों की इतनी आवश्यकता ही नहीँ , उन बिन आप रह सकते है तो मित्र ना बनाये । ऐसा सम्बन्ध हो जिसमें पल भर संग ना होना भीतर से व्याकुल कर दे । सेवा में केवल श्री विग्रह को धातु का मान केवल बनावटी ना रह । हृदय से साक्षात् संगी मान जिया जाएं ।
सेवा के सम्बन्ध में अभी जिस सवाल से लिखने का भाव हुआ वो सवाल है - जहाँ सेवा मिल गई वहाँ कृपा है , तो अगर किन्हीं प्रेमियों को सेवा ना मिली , या ना मिल सकती हो , और वहाँ प्रेम भी हो , तो क्या वहाँ कृपा नहीँ ?
सेवा के कई स्तर है , कितने .... यहाँ संख्या ना कही जाएं ? एक सेवा है जो हमनें लिखित की । और एक सेवा वो है , जो उनके प्रेम में वें ही आदेशित करें । किसी भी रूप में , या भाव में , अतः प्रेमास्पद का रस की दृष्टि और स्वरूप से सब प्रेमी जन को पृथक सेवा दी गई है । किसी को लौकिक , किसी को पारलौकिक भी ।
उनके स्वरूप की सेवा रस और आनन्दमयि है । और इस व्यवस्था में कैसी भी सेवा , सेवा ही है । परन्तु स्मरण रहें , चुनाव है तो निकट सम्बन्ध हो । या समता और क्षमताएं हो तो ऐसी भी सेवा भाव वर्धक है जहाँ उन्हीं की सेवा में उन्ही को अज्ञात रखा जाएं । जैसे किसी i.a.s. के भवन का वो माली जो जब आता है तब साहब सोयें होते है । बाग़ की सुन्दरता तो दिखती हो पर बागवान कौन है ? यें ना पता हो । यहाँ सेवा होगी और प्यास भी , बेताबी भी । वरन् सेवा में रस वर्धन के लिए अद्वैत का जो द्वेत हुआ वहाँ सेवा भी कर्म और अहंकार हो सकती है । सेवा में सेवक और स्वामी दो है , जो कि है एक ही । परन्तु रस वर्धन के लिए दो का आभास जरूरी है । सेवा में जीव का भी रस वर्धन है और ईश्वर का भी । एक से दो हुआ ही रसवर्धन हेतु है । जीव ईश्वर का अंश और तद्रुप ही है । यें जान कर प्रति क्रिया , भाव को सेवा मान ही अर्पण करना भी सेवा है । कि मैं जो हूँ तुम ही तो हूँ , तुमसे ही हूँ । और तुम्हारे लिए ही हूँ अतः किसी कार्य को सेवा किसी को कर्म कह मुझे और स्व को पृथक ना करें । जो बन पड़े वहीँ सेवा । काया , वाणी, मन और इंद्रियों की प्रत्येक क्रिया-भाव आदि सेवा हो जाएं । तब कुछ ऐसा होगा ही नहीं जो सेवा ना हो । प्रेम की गहन स्थितियों में स्व शरीर की निद्रा भी सेवा हो जाती है । जब आपकी किसी क्रिया , किसी भावना से स्व की नहीँ प्रियतम् के ही सुख की आस हो । तब सर्व जीवन और कामना आदि भी सेवा है । भाव अग़र स्व ना हो कर तत् (जै जै) ही है तो । प्राप्त वस्तुएं शरीर आदि  अपने उपभोग में ना लग सदुपयोग में होने लगे । उन्ही की चाहना से क्रियमान होने लगे तो सेवा ही है । तब सेवा को सौंपा नहीं जाता , सर्व अर्पण हो पुनः पुनः अर्पण कैसा ?  तब पुष्प ही नहीं, बगिया ही ईश्वर हेतु हो जाती है । कुँज और निकुँज का अध्यात्म भी यें ही भाव रखता है। सर्व प्रकारेण प्रियतम् की भोग्य वस्तु हो जाना ।
अतः अग़र किन्हीं प्रेमियों को स्वरूप की सेवा ना मिली ऐसा दिखाई देता है तो भी वहाँ उनके हेतु जो भी सम्पादन और भावना होगी वह सेवा है । बहुत बार किन्हीं को विरहानन्द मिलता है , स्वरूप सेवा से मिलने वाली तृप्ति ना होने पर व्याकुलता प्रबल होती है और चारों और एक आवरण हो जाता है और इस तरह के व्याकुल चातर पंछियो से प्रेमियों का स्मरण , सम्बन्ध या स्पर्श सहज रूप से रस की वृष्टि करने लगता है । उनके सच्चे प्रेमियों में एक भावना सुलभ होती है , तत्सुख । यें भावना उन्ही के प्रेम की कृपा है वरन् स्व की भावना रह ही जाती है । ऐसी स्थिति में अपनी किस क्रिया से प्रियतम् के किस सेवा कार्य की सिद्धि हो रही है , यें भी अज्ञात रहता है । और नित्य क्षण अज्ञात सेवा में रह कर सेवक होने की लालसा जीवित रहती है ।
सेवा , से ऊपर कोई प्राप्ति नहीँ , सम्बन्ध होने पर कर्म सेवा और सम्बन्ध ना होने पर सेवा कर्म हो जाती है । आज हम मांग बनी नहीँ रहते , सो सेवा में भी लोभ है । सेवा में अमुक वस्तु या पदार्थ से अमुक प्राप्तियाँ होती है यें जान कर की सेवा कर्म है । और ऐसी सेवा राजसिक सेवा है जहाँ सेवा के विपरीत कामनाये है । उन कामनाओं की पूर्ति में सेवा शून्य हो जाती है । यहाँ वैसा ही सम्बन्ध है जैसा संसार में सेवक से होता है । और अपने हित और अन्य के अहित में की सेवा तामसिक सेवा है । जहाँ अपना मनोरथ सिद्ध हो और अन्य किसी का वहाँ अहित हो अथवा स्वयं की विजय अन्य की पराजय की भावना हो , यें तामसिक सेवा है । व्यक्ति अपनी अमानवीय भावनाओं को ईश्वर के लिए भी प्रयोग करने लगता है । जैसे कोई प्रतियोगिता में अन्य की असफलता और स्वयं की सफलता की भावना से की गई सेवा और ऐसी ही सेवाएं ।
अतः सेवा परम् स्थिती है । सच ही है , उनका वही होता है जिसे वें चाहे और वहीँ उनका स्पर्श कर सकता है । पग दबा सकता है जिसे वें चाहे ।
आप अग़र श्री विग्रह सेवा करते है तो नित्य उनसे वार्ता भी करें सम्बन्ध को गहरा करें। और श्री विग्रह से दुरी होने पर मानसिक सेवा करें । अग़र श्री विग्रह सेवा नही और है भी तो मानसिक सेवा भी अवश्य करें । भाव से सम्पूर्ण विस्तार से भव्य और भावमय मानस सेवा सर्वोत्तम है । मानसिक सेवाओँ में सरकार के श्री अंगों की पृथक - पृथक सेवा करें , जैसे पग दबाना । और शरीर में सुगन्धित द्रव्य आदि की मालिस आदि । अपने द्वारा की सेवा में दीनता बनी रहे , और अपने द्वारा की सेवा में अभाव ही अनुभूत् होवें । वरन् तृप्ति अहम् की ओर घूम जायेगी । अभाव  की भावना में भाव रस दृढ होगा । अपनी ही मानस फुलवारी के पुष्पो को अयोग्य मान कर व्याकुल होने में और इस भाव के विस्तार में ही रस वर्धन होने लगेगा ।और दीनता सजीव होने लगेगी , नयन झरने लगेगें । विशेष सेवा की भावनाओ में बहने में प्रत्यक्ष छुवन भी अनुभूत् होगी और बाद में आभास होगा कि कितनी विशाल कृपा घटी तब और हमें बोध भी ना रहा । सत्यजीत तृषित । जय जय श्यामाश्याम । शंका हो , कोई भावना हो तो मन में ना रखे क्योंकि मन ही तो वो परम् वस्तु है जिससे सेवा होनी है ।

*श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः , करपात्री जी

*श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीराधाचन्द्रः-*

श्यामसुन्दर मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन अपनी प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी, राजराजेश्वरी श्रीराधारानी वृषभानुनन्दिनी के अनन्त माधुर्यामृत, सौगन्ध्यामृत, सौरस्या मृत का रसास्वादन करते-करते उस समुद्र में निगग्न है- परन्तु उसका पारावार नहीं- अन्त नहीं- ठिकाना नहीं। इसी तरह राधारानी वृषभानुनन्दिनी अपने प्राणनाथ प्रियतम के अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य-सुधाजलनिधि में अवगाहन करते-करते विभोर हैं। पर उसका भी पारावार नहीं, अन्त नहीं- ठिकाना नही। असल में अनन्त ब्रह्माण्ड के प्रेमियों को आनन्दित करने वाले रसों के उद्गम-स्थान निखिल रसामृत सिन्धु से श्रीकृष्ण के अंगों का निर्माण हुआ है। इनके एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त सौन्दर्य जलनिधि, एक-एक रोम में अनन्त-अनन्त माधुर्यामृत सौरस्यामृत महासमुद्र है। अनन्त रोम हैं। एक-एक रेाम में अनन्त माधुर्यामृत, सौन्दर्यामृत-लवण्यामृत समुद्र हैं, उनमें गोता लगाते-लगाते पार ही नहीं। इसलिये यह स्थिति विचित्र है। इन परिस्थितियों का रसास्वाद करते-करते क्षण दो क्षण,कल्प-दो कल्प की कौन कहे, अनन्त काल तक पता नहीं लगता कि कितने क्षण बीते हैं। इसलिये हम कहा करते हैं कि दोनों एक दूसरे को पहचानते ही नहीं, प्रत्यभिज्ञा ही नहीं। प्रत्यभिज्ञा का अर्थ पूर्वानुभूत का अनुभव है। ‘सोअयंदेवदत्तः’ पटना में अनुभूत देवदत्त को काशी में देखते है तो पूर्वानुभूत का अनुभव होता है, इसी को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। यहाँ पूर्वानुभूत से का अनुभव कभी होता ही नहीं- ‘प्रिया प्रियतम में भइ न चिह्नारी’, पूर्वानुभूत से कोटि-कोटि गुणित उत्कृष्ट अद्भुत स्वरूप का अनुभव होता है। इसलिये पूर्वानुभूत का अनुभव कभी न श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द को हुआ, न राधारानी वृषभानुनन्दिनी को कभी हुआ।
श्री ध्रुवदास के शब्दों में-

न आदि न अन्त विलास करैं दोउ लाल प्रिया में भइ न चिह्नारी।
नई नई भाँति नई छबि कान्ति नई नवल नव नेह बिहारी।।
रहे मुख चाहि दिये चित चाहि परे रसरीति सुसर्व सुहारी।
रहें इक पास करें मृदु हास सुनौ धु्रव पे्रम अकत्थ प्रेम अकत्थ कहारी।।

सारस पत्नी लक्ष्मणा केवल सम्प्रयोग-जन्य रस का ही अनुभव करती है और चक्रवाकी विप्रयोग-जन्य तीव्रताप के अनन्तर सहृदय-हृदय -वेद्य सम्प्रयोग-जन्य अनुपम रस का आस्वादन करती है, परन्तु वह भी वियोग काल में सम्प्रयोगजन्य रसास्वादन से वंच्चित रहती है। किन्तु नित्य-निकुंज मं श्री निकुज्जेश्वरी को अपने प्रियतम परम पे्रमास्पद श्रीव्रजराज किशोर के साथ सारस पत्नी लक्ष्मणा की अपेक्षा शत-कोटि गुणित दिव्य सम्प्रयोग-जन्य रस की अनुभूति होती है, साथ ही चक्रवाकी की अपेक्षा शतकोटिगुणित अधिक विप्रयोग जन्य तीव्र ताप के अनुभव के अनन्तर पुनः दिव्य रस की भी अनुभूति होती है। अन्यत्र सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक दोनों ही श्रृगार एक कालावच्छेदेन उद्बुद्ध एवं उद्वेलित नहीं होते। यहाँ परस्पर विरुद्ध धर्माश्रय है ‘अणोरणीयान् महतोमहीयान्’ , प्रभु श्यामसुन्दर में तो दोनों ही प्रकार के श्रृंगार रस एक कालावच्छेदेन व्यक्त होते हैं। कह सकते हैं कि एक में ज्वार होगा और दूसरे में भाटा। नहीं-नहीं दोनां में ज्वार है। दोनों सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र से निकले हुए निर्मल निष्कलंक पूर्णचन्द्र हैं। इस तरह, ‘श्रीकृष्ण कौन है?’ चन्द्र। ‘कहाँ के चन्द्र?’ श्रीराधारानी में जो श्रीकृष्ण विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है उससे अभिव्यक्त निर्मल-निष्ककलंक पूर्णचन्द्र। इसी तरह राधारानी भी चन्द्र हैं? कहाँ के चन्द्र हैं? श्रीकृष्ण चन्द्र में जो राधारानी विषयक सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उद्वेलित उभयविध श्रृंगाररस महासमुद्र है, उसी से जो आविर्भूत जो निर्मल-निष्कलंक पूर्णचन्द्र, वे ही हैं श्री राधारानी।
श्रीराधारकृष्ण क्या हैं? ‘उभय-उभय भावात्मा, उभय-उभय रसात्मा’ हैं, श्रीवल्लभाचार्य के शब्दों में। अर्थात् दोनों-दोनों के भाव स्वरूप और दोनों-दोनों के रस स्वरूप हैं। श्रीराधारानी के भाव स्वरूप और रस स्वरूप हैं श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णचन्द्र के भावस्वरूप-रसस्वरूप हैं श्री राधारानी। इस प्रकार दोनों लोकोत्तर वस्तु हैं। महावाणी और अन्य ग्रन्थों में कहा गया कि श्री राधा-कृष्ण का सम्बन्ध अकाट्य है, सर्वथा अभेद्य है। मरकतमणि में जैसे कंचन की तादात्म्यापत्ति हो अर्थात् मरकत मणि में कंचनखचित हो जाय और कंचन में मरकतमणि खचित हो जाय। लेकिन इस सम्बन्ध से भी ऊँचा सम्बन्ध है तरंग और जल का। तरंग से जल का विप्रलम्भ (विच्छेद या वियोग) नहीं होता।
रसिक लोक प्रियतम के सम्मिलन में हार व्यवधायक न हो इसलिये कण्ठ में हार भी नहीं धारण करते-‘हारो नारोपितः कण्ठे मया विश्लेषभीरुणा’ (हनुमन्नाटक) इतना ही नहीं, कंचुकी का व्यवधान ही उन्हें असह्य हो, रसोदे्रक में जो रोमांच होता है वहाँ कंचुकी का व्यवधान भला कैसे सह्य होगा? लेकिन जला और तरंग का जो संश्लेष है, उसमें तो हार, कंचुकि और रोमांच का भी व्यवधान नहीं। माना जाता है कि ‘क्लीं’ में क का अर्थ है श्रीकृष्णचन्द्रपरमानन्दकन्द मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन; ‘ई’ दीर्घ चतुर्थस्वर का अर्थ तन्त्रों में काम कला है। काम कला का अभिप्राय है उत्कृष्ट प्रीति और बिन्दु का अर्थ है रसोदे्रक। इस तरह क= अचिन्त्य अनन्त परमानन्द सुधासिन्धु श्रीकृष्ण; ल्= सुधासिन्धु के माधुर्यसार सर्वस्व की अधिष्ठात्री राधारानी; ई=आनन्दसार सर्वस्व श्रीकृष्ण और माधुर्यसार सर्वस्व श्री राधारानी दोनों का परस्पर पे्रम; श्रीराधाकृष्ण के परस्पर सम्मिलन से प्रादुर्भूत रसोद्रेक ‘क्लीं’ का अर्थ है। इस तरह काम बीज ‘क्लीं’ का अर्थ है श्री राधाकृष्ण के परस्पर पे्रमपूर्ण सम्मिलन से प्रादुर्भूत लोकोत्तर रसोदे्रक। महावाणीकार कहते हैं-‘सुधि हू सुधि बिसर गई’, इसी प्रकार कहावत है-‘करुणा भी करुणा से आकान्त हो गई’, ‘वीर रस में वीर रस का उद्रेक हो गया, इसी तरह साक्षात् जो पूर्णानुराग रससार सर्वस्व वस्तु है उसमें रसोदे्रक-यह तो जल और तरंग से भी अत्यन्त अन्तरंग वस्तु है। इस तहर श्रीराधा और कृष्ण का सम्मिलन जल और तरंग से भी अत्यधिक अन्तरंग है, सर्वागीण और सर्वाधिक अन्तरंग वस्तु है। उसी रसोद्रेक की अभिव्यक्ति के लिये कहा गया है-

चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज-
मालानुपक्तपरिधानविचिचवेषौ
मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठयां
रंगे यथा नटवरौं क्व च गायमानौ।।

(जब राम-श्याम आम की नयी कोपलें, मोरों के पंख, फूलों के गुच्छे, रगंविरंगे कमल और कुमुद की माला धारण कर लेत हैं, श्रीकृष्ण के सांवरे शरीर पर पीताम्बर और बलराम के गोरे शरीर पर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा विचित्र बन जाता है। ग्वाल बालों की गोष्ठी में वे दोनों बीचोंबीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता है मानो दो चतुर नट रंगमंच पर अभिनय कर रहे हों। मैं क्या बताऊं उस समय उनकी कितनी शोभा होता है?)
कुछ महानुभावों के मत में उत्पलाब्जमाला पे्रमनिरोध को सूचित करती है। नवल, कोमल, तरुण, अरुण आम्रपल्लव आसक्ति निरोध को सूचित करता है। मयूर पिच्छ व्यसन निरोध के आविर्भाव को सूचित करता है। माने परमानन्द रससार सर्वस्व में भी प्रेम का उद्रेक है, आसक्ति का उद्रेक है और व्यसन का निरोध है। एवं भूत जो पूर्णतम पुरुषोत्तम तत्व वह इस रूप मं प्रकट है।
मधु ऋतू विशेष ।
जयजय श्यामाश्याम ।